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टेढ़ी देह, सीधा विवेक — ऋषि अष्टावक्र की अमर शिक्षा

 

ऋषि अष्टावक्र का शरीर जन्म से ही सामान्य नहीं था। उनके अंग-प्रत्यंग आठ स्थानों से मुड़े हुए थे, इसी कारण उनका नाम अष्टावक्र पड़ा। बाहरी दृष्टि से वे आकर्षक नहीं दिखते थे, परंतु उसी देह में वेदांत का अपार ज्ञान, तीक्ष्ण बुद्धि और अद्भुत विवेक निवास करता था।

 

एक दिन वे विदेह देश के प्रसिद्ध धर्मात्मा राजा जनक की राजसभा में पहुँचे। जैसे ही उन्होंने सभा में प्रवेश किया, वहाँ बैठे दरबारी उनकी असामान्य आकृति देखकर आपस में हँसने लगे।

कोई मंद मुस्कान छिपा न सका, कोई ठहाका लगाकर हँसा, तो किसी ने उपहास से सिर हिला दिया।

 

ऋषि अष्टावक्र सब समझ गए। उन्होंने न कोई क्रोध दिखाया, न कोई कटु वचन कहा। शांत चित्त से वे सभा से बाहर लौटने लगे।

 

तभी राजा जनक ने उन्हें रोक लिया और आदरपूर्वक पूछा—

“महर्षि! आप तो अभी आए ही थे, फिर बिना बैठे लौट क्यों रहे हैं?”

 

ऋषि अष्टावक्र शांत और गंभीर स्वर में बोले—

“राजन, जहाँ विवेक के स्थान पर उपहास हो,

जहाँ दृष्टि आत्मा को नहीं, केवल शरीर को देखती हो—

ऐसी सभा में बैठना मुझे स्वीकार नहीं।”

 

उनके शब्द सुनते ही सभा में सन्नाटा छा गया।

तभी एक दरबारी आवेश में बोला—

“इसमें हमारा दोष क्या है? आपका शरीर ही ऐसा है, हँसी आ गई तो आ गई।”

 

ऋषि अष्टावक्र ने करुणा से भरी दृष्टि से सबकी ओर देखा और बोले—

“तुम यह नहीं समझ पा रहे कि तुम किस पर हँस रहे हो।

तुम मेरी देह पर नहीं, उस शक्ति पर हँस रहे हो जिसने इस देह को रचा है।”

 

फिर उन्होंने एक गहन उदाहरण दिया—

“मनुष्य का शरीर मिट्टी की हांडी के समान है और ईश्वर उस कुम्हार की तरह है जिसने उसे अपने हाथों से बनाया है।

यदि हांडी टेढ़ी हो, तो दोष हांडी का है या कुम्हार का?

और यदि तुम हांडी का मज़ाक उड़ाते हो, तो क्या वास्तव में तुम कुम्हार का अपमान नहीं कर रहे?”

 

ऋषि अष्टावक्र के वचन सभा में वज्रपात की तरह गूंजे।

दरबारियों के चेहरे झुक गए, आँखों में लज्जा भर आई और अहंकार मौन हो गया।

 

सभी सदस्य खड़े होकर एक स्वर में बोले—

“महर्षि! हमने अज्ञानवश अपराध किया है। कृपया हमें क्षमा करें।”

 

राजा जनक ने श्रद्धा से ऋषि को प्रणाम किया और उन्हें उचित सम्मान के साथ सभा में विराजमान किया।

 

🪔 व्याख्या (Explanation)

यह कथा केवल ऋषि अष्टावक्र के जीवन की घटना नहीं है, बल्कि मानव मानसिकता का दर्पण है।

अक्सर मनुष्य बाहरी रूप को ही मूल्यांकन का आधार बना लेता है और भीतर छिपे गुणों, ज्ञान और चरित्र को देखने में असफल हो जाता है।

 

ऋषि अष्टावक्र ने यह स्पष्ट किया कि—

  • शरीर ईश्वर की रचना है
  • किसी की देह का उपहास करना, सृष्टिकर्ता की रचना का उपहास है
  • विवेकहीन दृष्टि व्यक्ति को अज्ञान की ओर ले जाती है

सच्चा ज्ञान वहीं है जहाँ दृष्टि शरीर से ऊपर उठकर आत्मा और विचारों को देख सके।

 

🌼 नीति / संदेश (Moral)

  • मनुष्य का मूल्य उसके रूप से नहीं, उसके चरित्र से आँका जाता है।
  • देह अस्थायी है, पर विचार और विवेक शाश्वत हैं।
  • किसी की बाहरी बनावट का मज़ाक उड़ाना, अज्ञान और अहंकार का प्रतीक है।
  • जो दूसरों में दोष खोजता है, वह स्वयं अपने विवेक को खो देता है।
  •  

याद रखिए—

व्यक्तित्व शरीर से नहीं, संस्कारों से बनता है।

और सच्ची सुंदरता आत्मा की होती है।

 

🌸 जय श्री राधे कृष्णा 🙏🌸