Best Historical and Knowledgeable Content here... Know More.

  • +91 8005792734

    Contact Us

  • amita2903.aa@gmail.com

    Support Email

  • Jhunjhunu, Rajasthan

    Address

२) विराध का आतंक और श्रीराम–लक्ष्मण का धर्ममय प्रतिकार

(2)
विराध का आतंक और श्रीराम–लक्ष्मण का धर्ममय प्रतिकार

वन में एक और दिन ढल चुका था। रात के समय श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण ने उन महर्षियों के आश्रम में विश्राम किया, जिन्होंने बड़े प्रेम और श्रद्धा से उनका आतिथ्य-सत्कार किया था। शांत वन में ऋषियों के सान्निध्य में बीती वह रात मानो कुछ क्षणों में ही समाप्त हो गई।

प्रातःकाल जब सूर्य की सुनहरी किरणें वृक्षों के बीच से झाँकने लगीं, तब श्रीराम ने सभी मुनियों से विदा ली। ऋषियों ने उन्हें मंगलमय यात्रा का आशीर्वाद दिया। श्रीराम ने भी विनम्रतापूर्वक उनका अभिवादन किया और सीता तथा लक्ष्मण के साथ पुनः वन की ओर चल पड़े।

तीनों जैसे-जैसे आगे बढ़ते गए, वन का स्वरूप बदलता गया। अब चारों ओर घना और भयानक जंगल दिखाई देने लगा था। वहाँ अनेक प्रकार के हिरण और दूसरे जंगली पशु विचरते थे। कहीं रीछ दिखाई देते तो कहीं भयंकर बाघों की गर्जना सुनाई देती। पेड़, लताएँ और झाड़ियाँ इस प्रकार फैली हुई थीं कि रास्ता पहचानना भी कठिन हो जाता था। कई स्थानों पर वनस्पतियाँ कुचली और टूटी हुई थीं, मानो वहाँ से कोई अत्यंत शक्तिशाली प्राणी गुजरा हो।

उस वन में जल का भी कोई सहज स्रोत दिखाई नहीं देता था। चारों ओर एक विचित्र वीरानी थी। फिर भी पक्षी अपने-अपने स्थानों पर चहचहा रहे थे और झींगुरों की लगातार आती झंकार उस गहरे जंगल में गूँज रही थी। प्रकृति सुंदर भी थी और रहस्यमय भी।

इसी दुर्गम वन में अचानक श्रीराम, लक्ष्मण और सीता की दृष्टि एक अत्यंत भयंकर राक्षस पर पड़ी।

वह इतना विशाल था कि उसका शरीर मानो किसी पर्वत की चोटी जैसा ऊँचा दिखाई देता था। उसकी गर्जना इतनी भयानक थी कि आसपास का वन काँप उठता था। उसकी आँखें गहरी और डरावनी थीं, मुँह बहुत बड़ा था और पेट भी असामान्य रूप से विशाल था। उसका पूरा शरीर विकृत और भयानक दिखाई देता था। उसे देखकर किसी भी सामान्य मनुष्य के मन में भय उत्पन्न हो सकता था।

उसने अपने शरीर पर खून से सना हुआ और चरबी से चिपचिपा व्याघ्रचर्म लपेट रखा था। उसका रूप ऐसा था जैसे स्वयं मृत्यु ने कोई भयानक आकार धारण कर लिया हो। वह अपने आसपास के सभी जीवों में भय उत्पन्न करता हुआ खड़ा था।

उसके हाथ में एक विशाल लोहे का शूल था। उस शूल पर उसने कई हिंसक पशुओं को पिरो रखा था—तीन सिंह, चार बाघ, दो भेड़िये, दस चितकबरे हिरण और दाँतों वाला एक विशाल हाथी का सिर। वह भयानक दृश्य देखकर किसी का भी हृदय दहल सकता था। वह राक्षस उन पशुओं को अपनी शक्ति और क्रूरता का प्रदर्शन मानकर जोर-जोर से दहाड़ रहा था।

उसका नाम विराध था।

जैसे ही उसकी दृष्टि श्रीराम, लक्ष्मण और सीता पर पड़ी, उसका क्रोध भड़क उठा। उसने इतनी भयंकर गर्जना की कि मानो पृथ्वी तक काँप उठी हो। फिर वह पूरी शक्ति से उनकी ओर दौड़ा। उसकी चाल ऐसी थी जैसे मृत्यु स्वयं किसी जीव की ओर बढ़ रही हो।

श्रीराम और लक्ष्मण ने धनुष-बाण सँभाल लिए, परंतु इससे पहले कि वे कुछ कर पाते, विराध ने सीता को पकड़ लिया और उन्हें अपनी गोद में उठा लिया। वह कुछ दूर जाकर खड़ा हो गया।

सीता अचानक उस राक्षस के अधिकार में पहुँच गई थीं। उनके लिए वह क्षण अत्यंत भयावह था। फिर विराध ने श्रीराम और लक्ष्मण की ओर देखकर उपहासपूर्ण स्वर में कहा—

“तुम दोनों अपने शरीर पर जटा और वल्कल धारण किए हुए हो। देखने में तो तपस्वी लगते हो, लेकिन तुम्हारे हाथों में धनुष-बाण और तलवार हैं और तुम इस भयंकर दण्डकारण्य में घूम रहे हो। ऊपर से तुम्हारे साथ एक स्त्री भी है। लगता है, अब तुम्हारे जीवन के दिन समाप्त होने वाले हैं।”

वह यहीं नहीं रुका। उसने दोनों भाइयों का अपमान करते हुए कहा—

“यदि तुम तपस्वी हो, तो फिर इस स्त्री के साथ कैसे रह रहे हो? तुम दोनों कौन हो, जो मुनियों के समान वेश धारण करके भी अधर्म का आचरण कर रहे हो? तुम तो मुनियों के समुदाय को कलंकित करने वाले पापी प्रतीत होते हो।”

फिर उसने अपने बारे में घमंड से बताया—

“मैं विराध हूँ। मैं प्रतिदिन ऋषियों का मांस खाता हूँ और इस दुर्गम वन में अस्त्र-शस्त्र लेकर घूमता रहता हूँ। यह स्त्री मुझे बहुत सुंदर लगती है। अब यह मेरी पत्नी बनेगी और तुम दोनों का मैं युद्ध में वध करके तुम्हारा रक्त पी जाऊँगा।”

विराध की ये बातें सुनकर सीता का भय और बढ़ गया। वह उस समय उसके चंगुल में असहाय थीं। उनका शरीर भय के कारण काँपने लगा। जैसे तेज हवा के झोंकों से केले का कोमल पौधा बार-बार हिलता है, वैसे ही सीता भय और चिंता से काँप उठीं।

श्रीराम ने जब अपनी प्रिय सीता को उस राक्षस के कब्जे में देखा तो उनका हृदय भीतर तक व्यथित हो गया। उनके मुख का रंग फीका पड़ गया। एक क्षण के लिए उन्हें अपनी प्रिय पत्नी की वह असहाय अवस्था देखकर इतना गहरा दुःख हुआ कि वे स्वयं को संभाल नहीं सके।

उन्होंने लक्ष्मण की ओर देखकर अत्यंत पीड़ा भरे स्वर में कहा—

“लक्ष्मण! देखो, महाराज जनक की पुत्री, मेरी सती-साध्वी पत्नी सीता उस राक्षस की गोद में विवश बैठी हैं।”

श्रीराम की आँखों के सामने सीता का राजमहल में बीता सुखमय जीवन मानो घूम गया। वे सोचने लगे कि जो सीता कभी राजमहल के सुखों में पली थीं, आज उसी सीता को वन के ऐसे भयानक संकट का सामना करना पड़ रहा है।

उनका दुःख और बढ़ गया। उन्होंने कैकेयी को याद करते हुए कहा—

“लक्ष्मण! अत्यंत सुख और सम्मान में पली हुई राजकुमारी सीता की यह दशा देखकर मेरा हृदय टूट रहा है। कैकेयी जिस दुःख की इच्छा से मुझे वन भेजना चाहती थी, वह दुःख आज मेरे सामने पूर्ण रूप से उपस्थित है। उसने केवल मुझे राज्य से दूर करना ही पर्याप्त नहीं समझा था। वह चाहती थी कि मुझे और भी अधिक कष्ट मिले।”

श्रीराम के मन में उस समय अपने पिता की मृत्यु और अयोध्या का राज्य छिन जाने का दुःख भी था, लेकिन सीता को किसी दूसरे के अधिकार में देखकर उन्हें उससे भी अधिक पीड़ा हो रही थी।

उन्होंने अत्यंत दुखी होकर कहा—

“जिस कैकेयी ने मुझे वन भेजकर अपने मनोरथ को पूरा किया, वह आज निश्चित ही अपने उद्देश्य में सफल हुई होगी। लेकिन मेरे लिए सबसे बड़ा दुःख यह है कि मेरी सीता को कोई दूसरा पुरुष स्पर्श कर रहा है। लक्ष्मण! पिता की मृत्यु और मेरे राज्य के छिन जाने से भी मुझे उतना दुःख नहीं हुआ था, जितना आज सीता को इस राक्षस के हाथों में देखकर हो रहा है।”

श्रीराम की बातें सुनकर लक्ष्मण का हृदय भी दुःख और क्रोध से भर उठा। उनकी आँखों में आँसू आ गए, लेकिन उसी क्षण उनके भीतर अपने बड़े भाई और भाभी की रक्षा का प्रचंड संकल्प जाग उठा।

उनका क्रोध ऐसा था जैसे मंत्र से बाँधा गया कोई सर्प अचानक मुक्त होने के लिए फुफकारने लगे।

लक्ष्मण ने श्रीराम से कहा—

“हे रघुकुल के गौरव! आप समस्त प्राणियों के स्वामी और रक्षक हैं। आप स्वयं इन्द्र के समान शक्तिशाली हैं। फिर मेरे जैसे सेवक और छोटे भाई के रहते हुए आप स्वयं को असहाय क्यों समझ रहे हैं?”

लक्ष्मण का स्वर अब दृढ़ हो चुका था।

उन्होंने कहा—

“मैं अभी इस राक्षस का वध कर दूँगा। मेरे बाणों से इसका अंत होगा और आज यही पृथ्वी इस दुष्ट विराध के रक्त से भर जाएगी।”

लक्ष्मण के मन में भरत को लेकर कभी उत्पन्न हुआ क्रोध भी उस समय स्मरण हो आया। उन्होंने कहा—

“भरत के प्रति मेरे मन में जो क्रोध उत्पन्न हुआ था, आज वही क्रोध मैं इस विराध पर प्रकट करूँगा। जैसे इन्द्र अपने वज्र से पर्वत को चूर कर देते हैं, वैसे ही मैं अपने अस्त्रों से इस राक्षस को समाप्त कर दूँगा।”

अब लक्ष्मण का क्रोध अपने चरम पर था। उन्होंने अपने धनुष पर बाण चढ़ाते हुए मानो संकल्प लिया—

“मेरी शक्तिशाली भुजाओं के बल से छोड़ा गया यह महान बाण आज विराध के विशाल वक्षस्थल को भेदेगा। यह उसके शरीर से प्राणों को अलग कर देगा और यह दुष्ट राक्षस चक्कर खाता हुआ धरती पर गिर पड़ेगा।”

वन का वातावरण उस समय पूरी तरह बदल चुका था। एक ओर सीता भय और चिंता से घिरी थीं, दूसरी ओर श्रीराम अपनी पत्नी की अवस्था से अत्यंत व्यथित थे, और लक्ष्मण का हृदय धर्म, प्रेम और अपने परिवार की रक्षा के संकल्प से प्रज्वलित हो उठा था।

अब उस भयानक वन में विराध का आतंक और रघुकुल के दो वीर भाइयों का धर्ममय प्रतिकार आमने-सामने खड़ा था।

 

प्रश्न–उत्तर

1. श्रीराम, सीता और लक्ष्मण ने रात कहाँ बिताई और प्रातःकाल क्या किया?
उत्तर: उन्होंने महर्षियों के आश्रम में रात बिताई। सूर्योदय होने पर मुनियों से विदा लेकर श्रीराम सीता और लक्ष्मण के साथ आगे बढ़े।

2. वन के मध्यभाग का वातावरण कैसा था?
उत्तर: वन में अनेक हिरण, रीछ और बाघ थे। पेड़-पौधे नष्ट थे, जलाशय दुर्लभ था तथा पक्षियों और झींगुरों की आवाजें गूँजती थीं।

3. श्रीराम ने वन में किस भयंकर राक्षस को देखा?
उत्तर: श्रीराम ने वन में विराध नामक भयंकर नरभक्षी राक्षस को देखा, जो पर्वत के समान ऊँचा और अत्यंत विकृत दिखाई देता था।

4. विराध का रूप कैसा था?
उत्तर: विराध की आँखें गहरी, मुँह विशाल, पेट विकराल और शरीर बेडौल था। वह रक्त से सना व्याघ्रचर्म पहने अत्यंत भयानक लगता था।

5. विराध अपने शूल पर क्या लेकर घूम रहा था?
उत्तर: विराध लोहे के शूल पर तीन सिंह, चार बाघ, दो भेड़िये, दस हिरण और एक विशाल हाथी का सिर लेकर घूम रहा था।

6. श्रीराम, लक्ष्मण और सीता को देखकर विराध ने क्या किया?
उत्तर: विराध क्रोधित होकर भयंकर गर्जना करता हुआ उनकी ओर दौड़ा और सीता को पकड़कर अपनी गोद में लेकर कुछ दूर चला गया।

7. विराध ने श्रीराम और लक्ष्मण से क्या कहा?
उत्तर: विराध ने उनके तपस्वी वेश का उपहास किया और उन्हें पापी कहते हुए धमकी दी कि वह सीता को अपनी पत्नी बनाएगा।

8. विराध ने अपने बारे में क्या बताया?
उत्तर: विराध ने बताया कि वह ऋषियों का मांस खाता है और अस्त्र-शस्त्र लेकर दण्डकवन में विचरता रहता है तथा उसका नाम विराध है।

9. विराध के चंगुल में फँसकर सीता की प्रतिक्रिया क्या थी?
उत्तर: विराध के चंगुल में फँसकर सीता अत्यंत भयभीत हो गईं और तेज हवा में केले के पौधे की तरह काँपने लगीं।

10. सीता को विराध की गोद में देखकर श्रीराम को कैसा लगा?
उत्तर: श्रीराम अत्यंत व्यथित हो गए। सीता की विवश अवस्था देखकर उनका मुख सूख गया और उन्हें गहरा दुःख तथा चिंता हुई।

11. श्रीराम ने कैकेयी को क्यों याद किया?
उत्तर: सीता की दुर्दशा देखकर श्रीराम को लगा कि कैकेयी जिस वनवास और दुःख की इच्छा रखती थी, वह आज पूर्ण हो गया।

12. श्रीराम को सबसे अधिक दुःख किस बात से हुआ?
उत्तर: श्रीराम को सीता को किसी दूसरे पुरुष के स्पर्श में देखकर सबसे अधिक दुःख हुआ। यह पीड़ा उन्हें पिता की मृत्यु से भी बड़ी लगी।

13. श्रीराम की बातें सुनकर लक्ष्मण की क्या प्रतिक्रिया हुई?
उत्तर: लक्ष्मण दुःख और क्रोध से भर गए। उन्होंने श्रीराम को धैर्य दिया और विराध का वध करने का दृढ़ संकल्प व्यक्त किया।

14. लक्ष्मण ने श्रीराम को किस प्रकार सांत्वना दी?
उत्तर: लक्ष्मण ने कहा कि श्रीराम समस्त प्राणियों के रक्षक हैं और उनके रहते उन्हें अनाथ की तरह दुखी होने की आवश्यकता नहीं।

15. लक्ष्मण ने विराध के प्रति क्या संकल्प लिया?
उत्तर: लक्ष्मण ने संकल्प लिया कि वे अपने बाणों से विराध का वध करेंगे और उसके अत्याचार का अंत कर देंगे।

16. लक्ष्मण ने अपने क्रोध की तुलना किससे की?
उत्तर: लक्ष्मण ने अपने क्रोध की तुलना इन्द्र के पर्वत पर छोड़े गए वज्र से की, जो शत्रु का विनाश करने में समर्थ होता है।

17. लक्ष्मण विराध का वध किस प्रकार करना चाहते थे?
उत्तर: लक्ष्मण चाहते थे कि उनका शक्तिशाली बाण विराध के विशाल वक्ष को भेदकर उसके शरीर से प्राण अलग कर दे।

18. इस प्रसंग में लक्ष्मण के कौन-से गुण दिखाई देते हैं?
उत्तर: इस प्रसंग में लक्ष्मण का भ्रातृप्रेम, साहस, निष्ठा, वीरता और संकट के समय अपने प्रियजनों की रक्षा करने का दृढ़ संकल्प दिखाई देता है।