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सुलोचना : प्रेम, पीड़ा और पतिव्रत की अमर गाथा

लंका की स्वर्णमयी नगरी में सुलोचना नाम की एक कोमल, शीलवती और पतिव्रता नारी रहती थी। वह नागराज वासुकी की पुत्री और लंका के महापराक्रमी वीर मेघनाद की पत्नी थी। सुलोचना का संसार उसके पति से ही आरंभ होता था और उन्हीं पर समाप्त। उसके लिए मेघनाद केवल पति नहीं, बल्कि आराध्य देवता थे।

युद्ध की अग्नि लंका और राम-दल के बीच भड़क रही थी। रणभूमि में मेघनाद अपने अद्भुत पराक्रम से आकाश और पृथ्वी को कंपा रहा था। परंतु विधि का विधान अटल था। लक्ष्मण के साथ हुए भयंकर युद्ध में अंततः मेघनाद वीरगति को प्राप्त हुए। लक्ष्मण ने राम की आज्ञा का पालन करते हुए उनका मस्तक पृथ्वी पर गिरने नहीं दिया। हनुमान वह मस्तक श्रीराम के शिविर में ले आए।

उसी क्षण, जैसे किसी अदृश्य शक्ति ने सुलोचना के हृदय पर वज्रपात कर दिया हो—मेघनाद की कटी हुई दाहिनी भुजा आकाश चीरती हुई उसके सामने आ गिरी। सुलोचना का शरीर कांप उठा। उसकी आँखों में भय, शंका और अपार वेदना एक साथ उमड़ पड़ी। पर उसने उस भुजा को छुआ नहीं। आँसुओं से भरी आँखों से उसने कहा—
“यदि यह मेरे स्वामी की भुजा है, तो मेरे पतिव्रत की शक्ति से सत्य स्वयं बोल उठे।”

दासी ने भुजा के हाथ में लेखनी रख दी। चमत्कार हुआ। निर्जीव भुजा ने लिख दिया—
“प्राणप्रिये सुलोचना, यह मेरी ही भुजा है। लक्ष्मण से युद्ध में मैं पराजित हुआ। अब मेरा मस्तक श्रीराम के पास है।”

ये शब्द पढ़ते ही सुलोचना का हृदय फट पड़ा। उसने एक चीख भी नहीं निकाली, बस मौन होकर बैठ गई। आँसू उसकी आँखों से नहीं, आत्मा से बह रहे थे। उसके लिए संसार उसी क्षण सूना हो गया। उसने निश्चय कर लिया—जिस जीवन का आधार छिन गया, वह जीवन अब व्यर्थ है। वह अपने पति के साथ सती होना चाहती थी।

पर उसका पति तो शत्रु-शिविर में था। वह रावण के पास गई। पिता-समान ससुर से बोली—
“पिताजी, मुझे मेरे स्वामी के पास जाने दीजिए। बिना उनके यह देह बोझ है।”

रावण की आँखें भी भर आईं। उसने कहा—
“जाओ पुत्री। जहाँ श्रीराम, लक्ष्मण और हनुमान जैसे धर्मात्मा हैं, वहाँ कोई तुम्हारा अपमान नहीं करेगा।”

जब सुलोचना राम के शिविर में पहुँची, तो उसके चेहरे पर न भय था, न क्रोध—केवल अथाह शोक और अपार प्रेम। श्रीराम स्वयं खड़े होकर उसके पास आए। करुण स्वर में बोले—
“देवी, तुम्हारे दुःख ने मेरे हृदय को भी घायल कर दिया है। कहो, मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूँ?”

सुलोचना काँपती आवाज़ में बोली—
“प्रभु, मैं अपने स्वामी के साथ अंतिम यात्रा पर जाना चाहती हूँ। मुझे उनका मस्तक दीजिए।”

श्रीराम ने आदरपूर्वक मेघनाद का शीश मँगवाया। जैसे ही सुलोचना की दृष्टि उस पर पड़ी, वह टूट गई। उसने मस्तक को अपनी गोद में रख लिया। आँसुओं से उसे भिगोते हुए बोली—
“स्वामी… आपने कहा था, युद्ध से लौट आओगे… मुझे अकेला क्यों छोड़ दिया?”

उसने लक्ष्मण की ओर देखा और अत्यंत करुण स्वर में कहा—
“हे लक्ष्मण, इस विजय पर गर्व मत करना। मेरे स्वामी को पराजित करने की शक्ति किसी एक में नहीं थी। यह दो पतिव्रताओं के भाग्य का परिणाम था—एक आपकी पत्नी और दूसरी मैं।पर मेरे स्वामी उसी पिता का अन्न ग्रहण करते थे, जिसने एक पतिव्रता नारी का अपहरण किया था। उसी के पक्ष में उन्होंने शस्त्र उठाए और उसी कारण मेरे जीवन का एकमात्र सहारा आज मुझे छोड़कर परलोक सिधार गया।”

कुछ लोगों ने संदेह किया कि सुलोचना को यह सब कैसे ज्ञात हुआ। तब उसने भुजा वाली घटना बताई। किसी ने व्यंग्य किया, पर श्रीराम ने गंभीर स्वर में कहा—
“पतिव्रता की शक्ति का अपमान मत करो। उसके लिए असंभव कुछ भी नहीं।”

सुलोचना ने आँखें मूँद लीं और कहा—
“यदि मैं सच्ची सती हूँ, तो मेरे स्वामी का यह निर्जीव मस्तक हँस उठे।”

क्षण भर में वह मस्तक हँस पड़ा। पूरा शिविर सन्न रह गया। सभी की आँखों से अश्रु बहने लगे। सबने सुलोचना के चरणों में शीश झुका दिया।

अंत में सुलोचना ने श्रीराम से विनती की—
“आज मेरे स्वामी की अंतिम क्रिया है। आज युद्ध न हो।”

राम ने तुरंत युद्ध स्थगित कर दिया।

सुलोचना मेघनाद का मस्तक लेकर लंका लौटी। समुद्र तट पर चंदन की चिता सजी। उसने पति का शीश हृदय से लगाया, अंतिम बार निहारा और शांत स्वर में बोली—
“स्वामी, आपकी सुलोचना आ रही है।”

और अग्नि में प्रवेश कर वह अपने पति के साथ अमर हो गई।

यह केवल एक कथा नहीं—यह प्रेम, त्याग और पतिव्रत की अमर गाथा है।