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🌸जब मैया मौन हो गई और भगवान भूखे रह गए🌸
भक्ति, त्याग और प्रेम की परम कथा
भूमिका (प्रसंग का भावार्थ)
श्रीधाम वृंदावन केवल एक तीर्थ नहीं, वह प्रेम की जीवित भाषा है। वहाँ की रज में भक्ति बसती है, वायु में नाम-स्मरण बहता है और यमुना की लहरों में करुणा गूँजती है। उसी वृंदावन की एक छोटी-सी कुटिया में रहती थीं एक वृद्धा—जिन्हें सब “मैया” कहकर पुकारते थे।
संसार की दृष्टि में वे निर्धन थीं, पर भक्ति के लोक में वे अत्यंत समृद्ध थीं, क्योंकि उनके पास था—ठाकुर जी से निष्कलंक, मातृत्व-भरा प्रेम।
कथा
मैया का समस्त जीवन उनके लड्डू गोपाल के चारों ओर घूमता था। वे उन्हें पत्थर की मूर्ति नहीं मानती थीं, बल्कि अपने नन्हे लल्ला की तरह पालती थीं।
हर दिन ब्रह्ममुहूर्त में मैया का दिन आरंभ होता। कांपते हाथों से वे अपने लल्ला को जगातीं—
“जागिए ब्रजराज कुंवर…”
यमुना जल से स्नान, चंदन का लेप, मौसम के अनुसार वस्त्र—सब कुछ ऐसे, मानो सचमुच का बालक हो।
भोग में जो भी घर में होता, वही प्रेम से परोसतीं और कहतीं—
“पहले मेरा लल्ला खाएगा, फिर मैं पानी भी पीऊँगी।”
दिन-रात, काम करते हुए, चलते-फिरते—उनकी जुबान पर एक ही नाम रहता—
“कान्हा… मेरे लल्ला…”
हिचकी और भ्रम की शुरुआत
एक दिन पूजा के बाद मैया को तेज़ हिचकी आने लगी। उपाय किए, पर हिचकी नहीं रुकी।
दोपहर को उनकी बेटी मायके आई। जैसे ही उसने “माँ” कहा—हिचकी तुरंत बंद हो गई।
बेटी ने हँसते हुए कहा—
“माँ, कहते हैं जब कोई बहुत प्रेम से याद करता है, तो हिचकी आती है। मैं सुबह से तुझे बहुत याद कर रही थी।”
यह सुनते ही मैया का हृदय काँप उठा।
उनके मन में तूफ़ान आ गया—
“अगर बेटी के याद करने से मुझे हिचकी आती है…
तो मैं जो दिन-रात कान्हा को याद करती हूँ…
क्या मेरा लल्ला दिन-रात कष्ट पाता होगा?”
प्रेम का त्याग
माँ का हृदय अपराधबोध से भर गया। आँसू बह निकले।
वे ठाकुर जी के सामने गईं, कान पकड़े और रोते हुए प्रतिज्ञा कर ली—
“लल्ला! आज के बाद मैं तुझे याद नहीं करूँगी।
मैं मर जाऊँगी, पर तुझे कष्ट नहीं दूँगी।”
उस दिन के बाद कुटिया में मौन छा गया।
सेवा होती रही, भोग लगता रहा—पर नाम नहीं।
होंठ सिले रहे, मन में विचार आते तो सिर झटक देतीं।
यह था भक्ति का सर्वोच्च त्याग—
भगवान को सुख देने के लिए, उसी की याद का त्याग।
वियोग की अग्नि
दिन बीतते गए।
नाम-स्मरण के बिना मैया का शरीर गलने लगा।
वे बीमार रहने लगीं, सूखकर काँटा हो गईं।
उधर ठाकुर जी बेचैन हो उठे।
भोग तो मिल रहा था, पर उसमें प्रेम की पुकार नहीं थी।
और भगवान भोग से नहीं, भाव से तृप्त होते हैं।
भगवान का प्रकट होना
एक रात तेज़ बुखार में तपती मैया को लगा—कोई उनके सिर पर हाथ फेर रहा है।
दिव्य सुगंध फैल गई।
एक कोमल, मीठी आवाज़ गूँजी—
“मैया… तूने मुझे याद करना क्यों छोड़ दिया?”
मैया फूट-फूटकर रो पड़ीं—
“लल्ला! मैं तुझे याद करूँगी तो तुझे कष्ट होगा…”
तब बाँके बिहारी मुस्कुराए—
“पगली मैया!
दुनिया के रिश्तों में याद से हिचकी आती है,
पर मेरे लिए तेरा स्मरण मेरी शक्ति है।
तेरा ‘कान्हा-कान्हा’ ही तो मेरा भोजन है।
तू याद नहीं करेगी, तो मैं कैसे रहूँगा?”
मैया ने देखा—साक्षात् त्रिभुवन के स्वामी उनके सामने खड़े हैं।
वे चरणों में गिर पड़ीं।
उस रात उस कुटिया में प्रेम और करुणा की गंगा बह चली।
व्याख्या (Explanation)
यह कथा बताती है कि
भगवान सर्वशक्तिमान होते हुए भी भक्त के प्रेम पर आश्रित हो जाते हैं।
कथा का संदेश / Moral
🌼 1. भगवान भाव के भूखे हैं, भोग के नहीं।
🌼 2. सच्चा स्मरण भगवान को शक्ति देता है, पीड़ा नहीं।
🌼 3. प्रेम में त्याग महान है, पर प्रेम का निषेध नहीं।
🌼 4. भक्ति में तर्क नहीं, केवल निस्वार्थ समर्पण चलता है।
🌼 5. जब भक्त रुकता है, तो भगवान चलकर आते हैं।
समापन भाव
दुनिया जिसे कष्ट समझती है,
भक्ति के मार्ग में वही आनंद बन जाता है।
प्रेम से बोलिए—
हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की!
🙏 राधे–राधे! 🙏