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🌸 जब भगवान भिखारी साधु के संग वन में बस गए

— श्री सनातन गोस्वामी और श्री मदन मोहन जी की अद्भुत लीला

 

वृंदावन-मथुरा की पावन भूमि पर वैष्णव आचार्य श्री सनातन गोस्वामी जी निवास करते थे। वे विरक्ति और वैराग्य की मूर्ति थे। देह की आवश्यकताओं के लिए वे प्रतिदिन मधुकरी पर निकलते—अर्थात् हर घर से थोड़ा-थोड़ा अन्न लेकर जीवन निर्वाह करते।

 

मथुरा में एक चौबे के घर वे नित्य मधुकरी के लिए जाते थे। उस घर की चौबेनी अत्यंत सरल, निष्कपट और श्री मदन मोहन जी की अनन्य भक्त थीं। उनके घर में बाल-भाव से विराजमान मदन मोहन जी स्वयं एक ग्वाल-बाल की तरह रहते थे—चौबे के छोटे पुत्र के साथ खेलते, हँसते और उसी पात्र में भोजन कर लेते।

 

यह दृश्य देखकर सनातन गोस्वामी जी को बड़ा विस्मय होता—

“यह कैसे भगवान हैं, जिन्हें न शुचिता का बंधन, न आचार-विचार की औपचारिकता!”

 

एक दिन उन्होंने प्रेमपूर्वक आग्रह कर मदन मोहन जी का उच्छिष्ट प्रसाद माँग लिया। चौबेनी ने हर्ष से वह प्रसाद दे दिया।

बस, उसी दिन से सनातन जी के जीवन में एक अद्भुत परिवर्तन आ गया।

उस बाल-भगवान के स्पर्शित अन्न का रस ऐसा था कि वे नित्य उसी प्रसाद के लोभ में वहाँ आने लगे। वास्तव में, वे मधुकरी नहीं—दर्शन के लिए आते थे।

 

कुछ समय बाद, एक रात श्री मदन मोहन जी ने स्वप्न में सनातन गोस्वामी जी को दर्शन दिए और बोले—

“बाबा! तुम रोज़ इतनी दूर से आते हो। अब इस नगर में मन नहीं लगता।

मुझे चौबे से माँग लो और अपने साथ जंगल ले चलो—मैं तुम्हारे संग रहना चाहता हूँ।”

उसी रात चौबे को भी स्वप्न हुआ—कि वे ठाकुर जी को सनातन बाबा को दान कर दें।

अगले दिन जब सनातन जी चौबे के घर पहुँचे और अपनी इच्छा प्रकट की, तो चौबेनी की आँखें भर आईं।

प्रेम मिश्रित रोष में उन्होंने कहा—

“इसकी आदत ही ऐसी है! जो अपनी सगी माँ का न हुआ, वह मेरा क्या होगा!”

आँसू भरी आँखों से उन्होंने मदन मोहन जी को सनातन जी को सौंप दिया।

 

सनातन गोस्वामी जी उन्हें लेकर यमुना किनारे सूर्यघाट के पास एक रमणीय टीले पर पहुँचे। वहाँ फूस की एक छोटी-सी झोपड़ी बनाई और ठाकुर जी को विराजमान किया।

उनका भोग अत्यंत सादा था—

घर-घर से चुटकी-चुटकी आटा माँगते, बिना नमक की सूखी बाटी बनाते और वही भोग लगाते।

 

एक दिन मदन मोहन जी ने बाल-हठ करते हुए कहा—

“बाबा! यह रोज़-रोज़ बिना नमक की बाटी गले से नहीं उतरती। थोड़ा नमक भी लाया करो।”

 

सनातन जी झुँझला उठे—

“यह आदत मुझसे मत लगाओ! खाना है तो ऐसे ही खाओ, नहीं तो अपने घर चले जाओ।”

 

मदन मोहन हँस पड़े—

“अरे! एक कंकड़ी नमक के लिए कौन मना करेगा!”

तब से थोड़ा नमक भी आने लगा।

 

कुछ दिन बाद ठाकुर जी ने फिर निवेदन किया—

“बाबा, ये सूखे टिक्कड़ रोज़ नहीं खाए जाते। थोड़ा माखन या घी भी लाया करो।”

 

इस बार सनातन जी गंभीर हो गए—

“मेरे पास बस यही सूखा अन्न है।

तुम्हें माखन-मिश्री चाहिए तो किसी धनी सेठ के घर जाओ।

मैं भिखारी साधु हूँ—घी-बूरा माँगने नहीं जाऊँगा।

चाहो तो यमुना जल के साथ सटक लो—मिट्टी भी तो सटकते थे!”

बाल-भगवान चुप हो गए… पर लीला अभी शेष थी।

 

अगले ही दिन एक धनिक व्यापारी वहाँ आया। उसका जहाज यमुना में अटक गया था। उसने सनातन जी से प्रार्थना की।

सनातन जी बोले—

“मैं कुछ नहीं जानता। इस झोपड़ी में जो बैठे हैं, उन्हीं से कहो।”

व्यापारी ने मदन मोहन जी से प्रार्थना की—और क्षणभर में जहाज मुक्त हो गया।

कृतज्ञ व्यापारी ने वहीं भव्य मंदिर बनवाया, सेवा-व्यवस्था की, रसोइए और भोग की व्यवस्था कर दी।

 

और इस प्रकार—

जो भगवान सूखी बाटी खाते थे, वे आज भी वृंदावन के श्री मदन मोहन मंदिर में भक्तों को दर्शन दे रहे हैं।

 

🌼 भावार्थ / व्याख्या (Explanation)

यह कथा सिखाती है कि

  • भगवान को वैभव नहीं, भाव प्रिय है।
  • वे भक्त की गरीबी में भी उसी आनंद से रहते हैं, जैसे वैकुंठ में।
  • जब भक्त निष्कपट होता है, तब भगवान स्वयं उसके जीवन की व्यवस्था कर देते हैं।

 

सनातन गोस्वामी जी की कठोरता वास्तव में भक्ति की पराकाष्ठा थी—जहाँ भगवान को भी तपस्वी जीवन सिखाया गया।

और मदन मोहन जी की बाल-लीला यह दर्शाती है कि
भगवान अपने भक्त से तर्क नहीं करते—वे उसके प्रेम में बँध जाते हैं।

 

🌺 नीति / Moral

🌿 भगवान साधनों से नहीं, समर्पण से प्रसन्न होते हैं।

🌿 जहाँ सच्चा भाव होता है, वहाँ ईश्वर स्वयं व्यवस्था बन जाते हैं।

🌿 भक्ति में अधिकार नहीं, अपनापन होना चाहिए।