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🌸 जब भक्त की हुंडी स्वयं सांवरिया सेठ ने स्वीकार की

— नरसी मेहता और नानी बाई के मायरे की अमर लीला

 

📖 विस्तृत कथा (Detailed Story)

यह पंद्रहवीं शताब्दी के गुजरात की पावन भूमि की कथा है। जूनागढ़ की गलियों में जब-तब खड़ताल की मधुर झंकार और “राधे-कृष्ण… राधे-कृष्ण…” का दिव्य नाद गूंज उठता था। यह स्वर था नरसी मेहता का—गुजरात के आदि कवि, महान संत और श्रीकृष्ण के ऐसे अनन्य भक्त, जिनके लिए संसार का वैभव तिनके के समान था।

नरसी मेहता के पास धन नहीं था, पर उनके हृदय में गिरधर गोपाल पर अडिग विश्वास था। वे सांसारिक चिंताओं से परे, साधु-संतों की सेवा और प्रभु-कीर्तन में डूबे रहते थे।

उनकी बेटी नानी बाई एक अत्यंत धनी परिवार में ब्याही गई थीं।

 

समय आया नानी बाई के जीवन के एक महत्वपूर्ण संस्कार का—मायरा (भात)। परंपरा के अनुसार, इस अवसर पर बेटी का पिता अपनी हैसियत के अनुसार वस्त्र, आभूषण और उपहार लेकर ससुराल जाता है।

पर नानी बाई के ससुराल वाले धन के मद में चूर और स्वभाव से लालची थे। उन्होंने सोचा—

“यह नरसी तो स्वयं फकीर है, आज इसकी गरीबी का तमाशा बनाया जाए।”

 

उन्होंने जानबूझकर उपहारों की एक असंभव सूची तैयार करवाई—सोने के हार, रेशमी वस्त्र, चांदी के पात्र और अनगिनत मूल्यवान वस्तुएँ।

 

जब यह सूची नानी बाई के हाथ लगी, तो उनका हृदय टूट गया।

आँखों से आँसू बह निकले—दुख अपने लिए नहीं, बल्कि अपने पिता के संभावित अपमान के लिए।

 

जब यह समाचार नरसी मेहता तक पहुँचा, तो वे न विचलित हुए, न भयभीत।

उन्होंने वह सूची उठाकर श्रीकृष्ण की मूर्ति के चरणों में रख दी और बोले—

“प्रभु! मैं तो आपका गुमास्ता हूँ।

यह साख, यह हुंडी, यह इज्जत—अब आपकी है।”

 

भात भरने का दिन आया।

नरसी मेहता एक जर्जर बैलगाड़ी में बैठे, साथ में कुछ साधु-संत और हरि-नाम का कीर्तन।

न सोना, न चांदी—केवल भक्ति का धन।

जब यह टोली नानी बाई के ससुराल अंजार गाँव पहुँची, तो लोग हँसने लगे।

समधियों ने व्यंग्य किया—

“क्या लाए हो नरसी? कीर्तन से ही मायरा भर दोगे क्या?”

 

नानी बाई लज्जा और वेदना से झुक गईं।

पर नरसी मेहता शांत थे। उनके मुख पर अद्भुत तेज था।

उन्होंने सहज भाव से कहा—

“मेरा सेठ पीछे आ रहा है।

सारा हिसाब वही चुकाएगा।”

 

लोग ठहाका मारकर हँस पड़े—

“कौन सेठ? क्या द्वारकाधीश खुद आएंगे?”

 

और तभी…

आकाश में धूल का विशाल गुबार उठा।

घोड़ों की टापों और रथों की गड़गड़ाहट से धरती गूंज उठी।

गाँव के द्वार पर एक भव्य काफिला आकर रुका।

सबसे आगे एक दिव्य व्यापारी उतरे—

  • नाम: सांवल शाह
  • स्वरूप: मोरपंखी पगड़ी, कुंडल, वैजयंती माला
  • साथ में: मुनीम बने माता लक्ष्मी, बही-खाते के साथ

 

यह कोई और नहीं—

अपने भक्त की लाज बचाने आए स्वयं द्वारकाधीश श्रीकृष्ण थे।

सांवल शाह ने नरसी मेहता के पास जाकर हाथ जोड़कर कहा—

“मेहता जी, थोड़ी देर हो गई… क्षमा करना।”

 

नरसी मेहता की आँखों से प्रेम के आँसू बह निकले।

भक्त और भगवान का वह मिलन जिसने देखा, उसका जीवन धन्य हो गया।

फिर जो हुआ, वह इतिहास बन गया।

जिसने जितना माँगा था, उसे उससे सौ गुना अधिक मिला।

नौलखा हार, दिव्य वस्त्र, चाँदी-सोने के ढेर—

हर उपहार पर लिखा था “नरसी मेहता”,

पर देने वाले हाथ थे “सांवल शाह” के।

 

ससुराल वालों का अहंकार चूर हो गया।

नानी बाई का मस्तक गर्व से ऊँचा हो गया।

 

भगवान ने सिद्ध कर दिया—

“जो मेरा होकर सब कुछ छोड़ देता है,

उसके योगक्षेम का भार मैं स्वयं उठाता हूँ।”

 

🌼 भावार्थ / व्याख्या (Explanation)

यह कथा केवल चमत्कार की नहीं, पूर्ण समर्पण की महिमा की कथा है।

नरसी मेहता ने न भगवान से माँगा, न शिकायत की—

उन्होंने केवल जिम्मेदारी सौंप दी।

 

यही सच्ची भक्ति है—

जहाँ भक्त कहता है, “अब सब आप देखिए।”

और जब ऐसा होता है,

तो ईश्वर व्यापारी बनकर भी आ जाते हैं,

पर भक्त की लाज नहीं जाने देते।

 

🌺 नीति / Moral

🌿 सच्ची भक्ति में साधन नहीं, समर्पण काम करता है।

🌿 जो भक्त अपना अहंकार त्याग देता है, भगवान उसकी हुंडी स्वयं स्वीकार करते हैं।

🌿 ईश्वर देर कर सकते हैं, पर अंधेर नहीं।