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कलियुग के कड़वे सत्य और श्रीकृष्ण का अमृत संदेश
— पांडवों से कही गई भविष्य की चेतावनी
महाभारत का महायुद्ध समाप्त हो चुका था।
कौरवों का विनाश हुआ, अधर्म पर धर्म की विजय हुई—
परंतु पांडवों के हृदय में उल्लास नहीं, विषाद था।
कुरुक्षेत्र की भूमि पर शांति तो थी,
पर चारों ओर विधवाओं का विलाप, अनाथ बच्चों की चुप्पी
और रक्तरंजित स्मृतियाँ बिखरी पड़ी थीं।
धर्मराज युधिष्ठिर श्रीकृष्ण के चरणों में बैठकर बोले—
“हे माधव!
आपने अधर्म का नाश कर दिया,
पर मेरा हृदय भविष्य को लेकर आशंकित है।
जब आप पृथ्वी से विदा लेंगे,
तब मनुष्य का मार्ग कैसा होगा?
कलियुग में लोग कैसे जीवन जिएँगे?”
श्रीकृष्ण कुछ क्षण मौन रहे।
उनकी दृष्टि दूर भविष्य में टिक गई।
फिर गंभीर, करुण और सत्य से भरे स्वर में
उन्होंने पांडवों को कलियुग के पाँच कड़वे सत्य बताए।
🔱 पहला सत्य – धर्म केवल नाम का रह जाएगा
श्रीकृष्ण बोले—
“कलियुग में लोग धर्म को जीएँगे नहीं,
दिखाएँगे।
मंदिर तो होंगे,
पर मन में अहंकार होगा।
शास्त्र तो होंगे,
पर जीवन में उनका आचरण नहीं।
जो जितना अधर्मी होगा,
वह उतना ही स्वयं को धर्म का ठेकेदार बताएगा।”
पांडवों के मुख गंभीर हो गए।
💰 दूसरा सत्य – धन ही सबसे बड़ा संबंध बनेगा
श्रीकृष्ण ने कहा—
“कलियुग में मनुष्य की पहचान
उसके गुणों से नहीं, धन से होगी।
भाई-भाई से,
मित्र-मित्र से,
और संतान माता-पिता से
स्वार्थ के कारण जुड़ी होगी।
जहाँ लाभ होगा,
वहीं संबंध बचेगा।”
भीम ने गहरी साँस ली,
अर्जुन की आँखें झुक गईं।
🧠 तीसरा सत्य – बुद्धि से अधिक चालाकी पूजी जाएगी
श्रीकृष्ण बोले—
“ज्ञान का सम्मान घटेगा।
और चालाकी को ही बुद्धिमानी कहा जाएगा।
सत्य बोलने वाला मूर्ख समझा जाएगा,
और छल करने वाला चतुर।
ईमानदार अकेला रह जाएगा,
और झूठ बोलने वाला सफल कहलाएगा।”
सहदेव ने कहा—
“हे प्रभु! तब सत्य का मार्ग कितना कठिन होगा!”
❤️ चौथा सत्य – प्रेम घटेगा, वासना बढ़ेगी
श्रीकृष्ण ने करुण स्वर में कहा—
“कलियुग में प्रेम का अर्थ बदल जाएगा।
विवाह धर्म नहीं,
सुविधा बन जाएगा।
माता-पिता बोझ समझे जाएँगे,
और रिश्ते उपयोग तक सीमित रहेंगे।
जहाँ सुख समाप्त,
वहीं संबंध समाप्त।”
द्रौपदी की आँखों में आँसू छलक आए।
🕉️ पाँचवां सत्य – केवल भगवान का नाम ही उद्धार करेगा
तब श्रीकृष्ण के मुख पर मंद मुस्कान आई।
उन्होंने कहा—
“हे पांडवों!
कलियुग कितना भी अंधकारमय क्यों न हो,
पर इसमें सबसे सरल मुक्ति मार्ग होगा।
न यज्ञ चाहिए,
न कठोर तप,
न कठिन साधना—
केवल मेरा नाम।
जो सच्चे मन से मेरा स्मरण करेगा,
वह कलियुग में भी पार उतर जाएगा।”
🌺 पांडवों की प्रतिक्रिया
युधिष्ठिर की आँखों से आँसू बह निकले।
उन्होंने कहा—
“हे प्रभु!
तब तो कलियुग अत्यंत कठोर होगा।”
श्रीकृष्ण ने स्नेह से उत्तर दिया—
“हाँ…
पर जो विश्वास रखेगा,
वही सच्चा विजेता होगा।”
🌼 भावार्थ / व्याख्या (Explanation)
यह कथा भविष्यवाणी से अधिक आत्म-दर्पण है।
श्रीकृष्ण ने कलियुग की निंदा नहीं की—
उन्होंने सावधान किया।
साथ ही यह भी बताया कि
कलियुग में साधन कठिन भले हों,
पर ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग सबसे सरल है।
जहाँ द्वापर में तप था,
वहाँ कलियुग में नाम-स्मरण है।
🌿 आज के युग के लिए संदेश
यह कथा हमें डराने के लिए नहीं,
जगाने के लिए है।
यदि आज भी—
तो समझिए—
✨ आप कलियुग में रहते हुए भी द्वापर के पथ पर चल रहे हैं। ✨
🌸 नीति / Moral
🌺 धर्म दिखावे से नहीं, आचरण से जीवित रहता है।
🌺 धन नहीं, संस्कार संबंधों को टिकाते हैं।
🌺 कलियुग में सबसे बड़ा साधन—भगवान का नाम है।
🙏 ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः 🙏