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🌸कान्हा को जिसने लूटा – वही धन्य हुआ🌸

सच्ची पुकार की कथा

 

एक नगर में एक सरल हृदय, निष्काम और विनम्र पंडित जी रहते थे। उनका जीवन यापन किसी बड़े आश्रम या यज्ञों से नहीं, बल्कि रोज़–रोज़ घर–घर जाकर भगवद्गीता का पाठ करने से होता था। जो भी यजमान श्रद्धा से देता, वही उनका संबल था।

 

एक दिन मार्ग में उन्हें एक चोर ने रोक लिया। आँखों में क्रूरता और हाथ में भय—

चोर बोला,

“जो कुछ भी है, निकाल दे! वरना बुरा होगा।”

पंडित जी शांत स्वर में मुस्कुराए और बोले,

“बेटा, मेरे पास कुछ भी नहीं है। लेकिन चाहो तो एक उपाय बताऊँ। पास के घर में मैं गीता पाठ करता हूँ। वे लोग बहुत दानी हैं। तुम वहीं चोरी कर लेना।”

चोर को यह बात जँच गई।

अगले दिन पंडित जी कथा सुना रहे थे। वही चोर भी भीड़ में आकर बैठ गया।

कथा के बीच पंडित जी बोले—

“यहाँ से बहुत दूर वृन्दावन नाम का एक गाँव है। वहाँ रोज़ रात को पीपल के पेड़ के नीचे एक बालक आता है—नाम है कान्हा। वह हीरों–जवाहरातों से लदा रहता है।

अगर किसी को लूटना हो… तो उसी को लूटो।”

चोर का मन प्रसन्न हो गया।

वह तुरंत वहाँ से चला गया।

घर पहुँचकर उसने अपनी पत्नी से कहा,

“आज मैं कान्हा नाम के एक बच्चे को लूटने जा रहा हूँ। रास्ते के लिए कुछ बाँध दे।”

पत्नी ने थोड़े से सत्तू बाँध दिए और बोली,

“बस यही है, हमारे पास इतना ही है।”

टूटी चप्पलों में, पैदल ही पैदल, चोर संकल्प लेकर निकल पड़ा—

“अब तो कान्हा को लूटकर ही लौटूँगा।”

पूरा रास्ता चलते हुए उसके मुँह से बस एक ही नाम निकलता रहा—

“कान्हा… कान्हा…”

अगले दिन संध्या समय वह उसी स्थान पर पहुँचा, जहाँ का वर्णन पंडित जी ने किया था।

सोचा—

“अगर सामने खड़ा रहा, तो बच्चा भाग जाएगा।”

वह पास की झाड़ियों में छुप गया।

झाड़ियों के काँटे उसके शरीर में चुभने लगे।

खून बहने लगा।

पीड़ा असहनीय थी।

पर उसके मुँह से एक ही पुकार निकली—

“कान्हा… आ जाओ… कान्हा…”

उस पुकार में अब लूट की लालसा नहीं थी,

बस एक तड़प थी।

 

🌼 भगवान् का आगमन

अपने भक्त की ऐसी दशा देखकर श्रीकृष्ण चल पड़े।

रुक्मिणी जी ने कहा—

“प्रभु! वह तो आपको लूट लेगा!”

कान्हा मुस्कुराए—

“कोई बात नहीं।

अपने ऐसे भक्तों के लिए तो मैं लुट जाना ही नहीं,

मिट जाना भी स्वीकार कर लूँ।”

आधी रात को वे बालक रूप में पीपल के पेड़ के नीचे आए।

चोर झाड़ियों से निकल पड़ा, चाकू दिखाकर बोला—

“कान्हा! बहुत सताया है तूने।

अब चुपचाप अपने सारे गहने दे दे।”

कान्हा हँसते हुए बोले—

“ले लो, जो चाहिए ले लो।”

और उन्होंने सब कुछ दे दिया।

 

🌼 परिवर्तन

अगली सुबह चोर खुशी–खुशी अपने गाँव लौटा।

सबसे पहले वह पंडित जी के पास पहुँचा और

आधे गहने उनके चरणों में रख दिए।

पंडित जी चकित रह गए—

“यह क्या है?”

चोर बोला—

“आपने ही तो मुझे कान्हा का पता दिया था।

मैं उसे लूटकर आया हूँ।

यह आपका हिस्सा है।”

पंडित जी को विश्वास नहीं हुआ।

वे बोले—

“मैं वर्षों से पूजा–पाठ कर रहा हूँ,

मुझे तो वह आज तक नहीं मिले।

तुझे कैसे मिल गए?”

चोर के आग्रह पर पंडित जी भी उसके साथ चल पड़े।

 

🌼 साक्षात् दर्शन

दोनों झाड़ियों में छुपे।

काँटे फिर चुभे।

शरीर से खून बहने लगा।

और दोनों के मुँह से एक साथ निकला—

“कान्हा… कान्हा… आ जाओ…”

मध्य रात्रि, वही बालक रूप में कान्हा आए।

पंडित जी यह दृश्य देखकर फूट–फूटकर रो पड़े।

उन्होंने चोर के चरणों में गिरकर कहा—

“हम जिसे वर्षों पूजते रहे,

जिसे देखने को तरसते रहे—

तुम जैसे पापी कहलाने वाले ने

उसे लूट लिया!

तुम धन्य हो…

आज तुम्हारी वजह से मुझे

कान्हा के दर्शन हुए।”

 

🌼 व्याख्या (Explanation)

यह कथा सिखाती है कि

भगवान को कर्मकांड नहीं, भावना बाँधती है।

चोर का हृदय पाप से भरा था,

पर उसकी पुकार सच्ची थी।

उसकी वेदना निर्मल थी।

उसका स्मरण अखंड था।

पंडित जी के पास ज्ञान था,

पर अहंकार भी था।

भगवान वहाँ गए जहाँ

आँसू थे, तड़प थी, पूर्ण समर्पण था।

 

🌼 नीति / Moral

✨ भगवान को पाने के लिए पवित्रता नहीं, सच्चाई चाहिए।

✨ नाम स्मरण अगर हृदय से हो, तो भगवान स्वयं दौड़े आते हैं।

✨ जो सच्चे मन से पुकारता है, उसके लिए भगवान सब कुछ लुटा देते हैं।

 

🌸 अंतिम भाव 🌸

“मेरो तो गिरधर गोपाल,

दूसरो न कोई…” 🙏💙