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🌿 अहंकार से संतोष तक — दुख का वास्तविक कारण 🌿
ज्ञान, लालच और आत्मबोध की कथा
बहुत वर्षों तक एक पंडित जी पवित्र नगरी काशी में रहे।
उन्होंने वेद, उपनिषद, स्मृति, पुराण—सभी शास्त्रों का गहन अध्ययन किया।
दिन–रात श्लोक, व्याख्या और तर्क—यही उनका संसार था।
समय बीतने के साथ उनका ज्ञान तो बढ़ा,
पर उस ज्ञान के साथ उनके भीतर अहंकार का बीज भी अंकुरित होने लगा।
अब उन्हें लगने लगा था—
“मैं गाँव का सबसे बड़ा विद्वान हूँ।
मेरे समान ज्ञानी कोई नहीं।”
इस आत्मविश्वास के साथ वे अपने गाँव लौटे।
🌾 किसान का प्रश्न
गाँव पहुँचते ही एक साधारण किसान ने उन्हें प्रणाम किया और पूछा—
“पंडित जी, आप इतने बड़े विद्वान हैं।
क्या आप बता सकते हैं कि हमारे समाज में लोग दुखी क्यों रहते हैं?”
पंडित जी ने बिना सोचे उत्तर दिया—
“धन की कमी के कारण।
जिसके पास साधन नहीं होते, वही दुखी होता है।”
किसान ने विनम्र स्वर में कहा—
“लेकिन पंडित जी, जिनके पास धन है, वे भी तो दुखी रहते हैं।
मेरे पास भी भूमि, घर और संपत्ति है,
फिर भी मेरे मन में शांति नहीं है। क्यों?”
यह प्रश्न पंडित जी को चुप करा गया।
शास्त्रों के अनेक श्लोक स्मरण में आए,
पर कोई उत्तर उनके मुख से नहीं निकला।
कुछ क्षण मौन के बाद किसान बोला—
“यदि आप मेरे दुख का कारण बता दें,
तो मैं अपनी सारी संपत्ति आपको दान कर दूँगा।”
🕉️ लालच की शुरुआत
संपत्ति का नाम सुनते ही
पंडित जी का मन डगमगा गया।
उन्होंने कहा—
“मैं शीघ्र ही इसका उत्तर खोजकर लाऊँगा।”
और वे पुनः काशी लौट गए।
📚 शास्त्रों में उलझा उत्तर
काशी में उन्होंने फिर से ग्रंथों को खंगाला—
धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र, मोक्षशास्त्र…
पर दुख के मूल कारण पर कोई उत्तर उन्हें संतुष्ट न कर सका।
दिन बीतते गए।
अब उनके भीतर चिंता जन्म लेने लगी—
“यदि उत्तर न मिला, तो मैं उस संपत्ति से वंचित हो जाऊँगा।”
🧕 भिखारिन से भेंट
एक दिन मार्ग में उनकी भेंट एक भिखारिन स्त्री से हुई।
उसने उनकी व्याकुलता देखकर पूछा—
“बाबा, आप इतने चिंतित क्यों हैं?”
पंडित जी ने अपनी पूरी कथा उसे सुना दी।
स्त्री ने शांत भाव से कहा—
“मैं आपके प्रश्न का उत्तर दे सकती हूँ,
लेकिन आपको कुछ दिन मेरे साथ रहना होगा।”
⚖️ अहंकार बनाम लालच
पंडित जी दुविधा में पड़ गए।
एक ब्राह्मण होकर किसी भिखारिन के साथ रहना
उन्हें अधर्म प्रतीत हो रहा था।
पर अगले ही क्षण मन बोला—
“कुछ दिनों की बात है।
उत्तर मिलते ही मैं धनी बन जाऊँगा।”
लालच ने विवेक को ढक लिया।
उन्होंने उसकी शर्त स्वीकार कर ली।
🍽️ पतन की सीढ़ियाँ
पहले उन्होंने उसके साथ रहना स्वीकार किया।
फिर उसके हाथ का भोजन।
फिर उसके साथ सड़क पर खड़े होकर भीख माँगना।
जो कभी किसी के हाथ का पानी भी नहीं पीते थे,
आज सब कुछ स्वीकार कर रहे थे।
फिर भी उत्तर नहीं मिला।
🍛 अंतिम परीक्षा
एक दिन स्त्री ने कहा—
“आज आपको मेरा जूठा भोजन खाना होगा।”
यह सुनते ही पंडित जी क्रोधित हो उठे—
“अब बस!
यदि तुम्हें उत्तर पता है, तो अभी बता दो!”
स्त्री मुस्कुराई।
🌸 सत्य का उद्घाटन
उसने शांत स्वर में कहा—
“पंडित जी, यही तो आपके प्रश्न का उत्तर है।
आप दुखी क्यों हैं—
क्योंकि आपकी इच्छाएँ बढ़ती चली गईं।
संपत्ति के लालच में आपने
अपना मान, मर्यादा और सिद्धांत तक त्याग दिए।
यही इच्छाएँ मनुष्य को दुखी करती हैं।”
🌿 आत्मबोध
पंडित जी की आँखें खुल गईं।
उनका अहंकार और लालच चूर–चूर हो गया।
उन्होंने समझ लिया—
ज्ञान तभी पूर्ण है, जब उसमें संतोष हो।
🪔 व्याख्या (Explanation)
यह कथा बताती है कि
दुख का कारण बाहरी अभाव नहीं,
आंतरिक असंतोष और लालच है।
मनुष्य जितना अधिक चाहता है,
उतना ही खोता चला जाता है—
शांति, सम्मान और स्वयं को।
🌼 नीति / Moral
✨ असीमित इच्छाएँ ही मनुष्य के दुख का मूल कारण हैं।
✨ ज्ञान अहंकार बन जाए, तो वह अज्ञान से भी खतरनाक है।
✨ संतोष और संयम में ही सच्चा सुख निहित है।