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३) प्रथम पूज्य भगवान गणेश की जन्म कथाएँ

भगवान गणेश के जन्म से जुड़ी रोचक कथाएँ

(१)

 

शीर्षक: पंचतत्वों से प्रकट हुए गणपति

बहुत प्राचीन काल की बात है। एक दिन भगवान शिव के मन में एक दिव्य इच्छा उत्पन्न हुई। उन्होंने सोचा कि वे ऐसा अद्भुत पुत्र उत्पन्न करें जो समस्त लोकों में अद्वितीय हो, जिसकी तुलना किसी से न की जा सके।
भगवान शिव ने सृष्टि के पाँच मूल तत्व—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—को एकत्र किया और गहन ध्यान व तपस्या के साथ एक दिव्य बालक की रचना करने लगे। उनकी तपश्चर्या और कला से वह बालक धीरे-धीरे अत्यंत सुंदर, तेजस्वी और आकर्षक बनता चला गया।
जब देवताओं ने उस बालक को देखा, तो वे आश्चर्यचकित रह गए। उसका सौंदर्य और तेज इतना अधिक था कि देवताओं के मन में भय उत्पन्न हो गया। वे सोचने लगे कि कहीं यह बालक आगे चलकर हम सभी देवताओं के तेज और महिमा को भी पीछे न छोड़ दे।
देवताओं की इस चिंता को भगवान शिव ने तुरंत समझ लिया। उन्होंने विचार किया कि यदि यह बालक अत्यधिक रूपवान रहा, तो सृष्टि में असंतुलन उत्पन्न हो सकता है। इसलिए सृष्टि के संतुलन को बनाए रखने के लिए भगवान शिव ने उस बालक का पेट बड़ा कर दिया और उसका सिर गज, अर्थात हाथी का बना दिया।
इस परिवर्तन से बालक का स्वरूप और भी विलक्षण और अद्भुत हो गया। अब वह न केवल सुंदर था, बल्कि अनोखा भी बन गया। देवताओं का भय भी समाप्त हो गया और सृष्टि का संतुलन बना रहा।
आगे चलकर वही दिव्य बालक भगवान गणेश कहलाए। वे विघ्नों को हरने वाले, बुद्धि और विवेक के प्रतीक तथा संसार के सभी शुभ कार्यों में प्रथम पूज्य बने।

यह कथा बताती है कि भगवान गणेश का स्वरूप केवल सौंदर्य के लिए नहीं, बल्कि सृष्टि के संतुलन के लिए बनाया गया है। पंचतत्वों से उनकी रचना यह दर्शाती है कि वे संपूर्ण सृष्टि का प्रतिनिधित्व करते हैं।
बड़ा पेट धैर्य, स्वीकार्यता और संतोष का प्रतीक है, जबकि हाथी का सिर बुद्धि, स्मरण शक्ति और विवेक को दर्शाता है। यह कहानी सिखाती है कि शक्ति और सौंदर्य के साथ-साथ संतुलन और विनम्रता भी आवश्यक हैं।
इसी कारण भगवान गणेश को बुद्धि-विनायक, विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य कहा जाता है, और हर शुभ कार्य की शुरुआत उनकी पूजा से की जाती है।

 

(२)

शीर्षक: विघ्नहर्ता गणेश का दिव्य प्राकट्य


बहुत प्राचीन समय की बात है। एक बार देवताओं को दैत्यों के कारण बहुत कष्ट सहना पड़ा। दैत्य बार-बार यज्ञों, हवनों और धर्मकर्मों में बाधा डालते थे। इससे संसार में अधर्म बढ़ने लगा और देवता चिंतित हो गए।
सभी देवता मिलकर कैलाश पर्वत पहुँचे और भगवान शिव की आराधना करने लगे। उन्होंने विनम्र स्वर में कहा—
“हे देवों के देव महादेव! हमें ऐसे देवता की आवश्यकता है जो दैत्यों के अधर्मपूर्ण कार्यों में विघ्न डाले और धर्म की रक्षा करे।”
देवताओं की प्रार्थना सुनकर भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले—
“तथास्तु!”
कुछ समय बाद एक अद्भुत चमत्कार हुआ। एक दिव्य और तेजोमय स्वरूप प्रकट हुआ। उनका मुख हाथी के समान था और उनका शरीर दिव्य प्रकाश से चमक रहा था। उनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में पाश था। उनका रूप देखकर सभी देवता विस्मित हो गए।
देवताओं ने हर्ष से पुष्प-वृष्टि की और उस दिव्य पुरुष को नमन किया। तभी भगवान शिव ने कहा—
“हे पुत्र! आज से तुम गणेश कहलाओगे। तुम दैत्यों के दुष्कर्मों में विघ्न डालोगे और देवताओं तथा ब्राह्मणों की रक्षा करोगे। संसार के सभी शुभ कार्यों में तुम सर्वप्रथम पूज्य होगे।”
शिवजी के इस आदेश के साथ ही गणेश जी को एक विशेष स्थान प्राप्त हुआ। उसी दिन से वे विघ्नहर्ता (बाधाएँ दूर करने वाले) और विघ्नकर्ता (अधर्म के मार्ग में बाधा डालने वाले) कहलाने लगे।

यह कहानी बताती है कि भगवान गणेश का प्राकट्य धर्म की रक्षा के लिए हुआ। वे केवल भक्तों के कार्यों से बाधाएँ दूर नहीं करते, बल्कि अधर्म, अन्याय और दुष्कर्मों के मार्ग में विघ्न भी डालते हैं।
गणेश जी का हाथीमुख बुद्धि और विवेक का प्रतीक है। त्रिशूल शक्ति और न्याय को दर्शाता है, जबकि पाश अनुशासन और नियंत्रण का संकेत देता है। इसलिए हर शुभ कार्य से पहले गणेश जी की पूजा की जाती है, ताकि कार्य सफल हो और अधर्म से दूर रहे।
यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची शक्ति वही है जो धर्म की रक्षा करे और अन्याय का नाश करे।

(३)

शीर्षक: गंगा से प्रकट हुए गणेश

 

बहुत समय पहले की बात है। एक दिन माता पार्वती स्नान करने जा रही थीं। स्नान से पहले उन्होंने अपने शरीर पर चंदन और उबटन लगाया। स्नान के बाद जब वह उबटन उनके शरीर से उतर गया, तो माता पार्वती ने उसे व्यर्थ नहीं समझा। उन्होंने प्रेमपूर्वक उस उबटन से एक सुंदर प्रतिमा बना दी।
वह प्रतिमा बहुत ही अद्भुत थी। उसका मुख हाथी के समान था और उसका रूप आकर्षक था। माता पार्वती को वह प्रतिमा बहुत प्रिय लगी। उन्होंने उसे अपने पुत्र के रूप में स्वीकार कर लिया और उस पर ममता लुटाने लगीं।
माता पार्वती ने सोचा कि अपने पुत्र को गंगा स्नान कराना चाहिए। इसलिए उन्होंने उस प्रतिमा को गंगा नदी में प्रवाहित कर दिया। जैसे ही वह आकृति गंगा के पवित्र जल में पहुँची, एक चमत्कार हुआ। वह प्रतिमा तुरंत एक विशाल, तेजस्वी और दिव्य देवपुरुष में बदल गई।
यह देखकर सभी देवता प्रसन्न हो गए। उन्होंने उस देवपुरुष का स्वागत किया और उन्हें “गांगेय” नाम दिया, क्योंकि उनका प्रकट होना गंगा से हुआ था। तभी भगवान ब्रह्मा वहाँ आए। उन्होंने उस देवपुरुष को आशीर्वाद दिया और कहा—
“हे पुत्र! आज से तुम सभी गणों के अधिपति कहलाओगे। तुम्हारा नाम गणेश होगा।”
इस प्रकार पद्म पुराण के अनुसार भगवान गणेश का प्राकट्य हुआ और वे सभी देवताओं में पूज्य बन गए।

यह कहानी हमें बताती है कि भगवान गणेश का जन्म दैवी चमत्कार से हुआ। माता पार्वती की ममता और प्रेम से एक साधारण उबटन भी दिव्य रूप ले लेता है। गंगा का जल शुद्धता और जीवन का प्रतीक है, जिससे गणेश जी का देवस्वरूप प्रकट हुआ।
ब्रह्मा जी द्वारा गणेश जी को “गणों का अधिपति” बनाना यह सिखाता है कि वे बुद्धि, शुभता और मंगल के देवता हैं। इसलिए किसी भी शुभ कार्य से पहले भगवान गणेश की पूजा की जाती है।

(४)

शीर्षक: माता के आदेश का पालन करने वाला पुत्र

 

बहुत समय पहले की बात है। एक दिन माता पार्वती स्नान के लिए जा रही थीं। वे चाहती थीं कि स्नान के समय कोई भी उनके कक्ष में प्रवेश न करे। तब उन्होंने अपने शरीर पर लगाए गए उबटन को इकट्ठा किया और उससे एक सुंदर बालक का पुतला बनाया। अपने योगबल से उन्होंने उसमें प्राण-प्रतिष्ठा कर दी। इस प्रकार एक दिव्य बालक का जन्म हुआ।
माता पार्वती ने उस बालक को अपना पुत्र मान लिया और उसे द्वारपाल बनाकर आदेश दिया—
“पुत्र! जब तक मैं स्नान कर रही हूँ, तब तक किसी को भी भीतर मत आने देना।”
कुछ समय बाद भगवान शिव वहाँ पहुँचे और भीतर जाना चाहा। द्वार पर खड़े बालक ने उन्हें रोक लिया। शिवजी ने पूछा—
“तुम मुझे क्यों रोक रहे हो?”
बालक ने निडर होकर उत्तर दिया—
“मुझे माता का आदेश है कि किसी को भी भीतर न जाने दूँ।”
बालक की दृढ़ता देखकर भगवान शिव क्रोधित हो गए। क्रोध में उन्होंने अपने त्रिशूल से उस बालक का सिर काट दिया। बालक वहीं निःशब्द गिर पड़ा।
जब माता पार्वती स्नान करके बाहर आईं और यह दृश्य देखा, तो वे अत्यंत दुखी और क्रोधित हो उठीं। उन्होंने संकल्प किया कि वे सृष्टि का नाश कर देंगी। समस्त देवता भयभीत हो गए और भगवान शिव से प्रार्थना करने लगे कि माता पार्वती के क्रोध को शांत करें।
तुरंत भगवान शिव ने आदेश दिया—
“जो भी प्राणी सबसे पहले मिले, उसका सिर लेकर आओ।”
देवताओं ने चारों दिशाओं में खोज की और उन्हें सबसे पहले एक हाथी मिला। वे उसका सिर लेकर लौटे। भगवान शिव ने उस हाथी का सिर बालक के धड़ पर स्थापित किया और अपने दिव्य मंत्रों से उसमें प्राण फूँक दिए।
बालक फिर से जीवित हो उठा। माता पार्वती का शोक दूर हो गया और वे प्रसन्न हो गईं। देवताओं ने हर्ष से पुष्पवृष्टि की। भगवान शिव ने बालक को आशीर्वाद देते हुए कहा—
“आज से तुम गणपति कहलाओगे। संसार के सभी शुभ कार्यों में तुम्हारी पूजा सबसे पहले होगी।”
इसी दिन से भगवान गणेश विघ्नहर्ता, प्रथम पूज्य और गणों के अधिपति बन गए।

यह कथा हमें आज्ञापालन, निष्ठा और मातृभक्ति का महत्व सिखाती है। गणेशजी ने माता पार्वती के आदेश का पालन करते हुए किसी भी परिस्थिति में अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटे।
हाथी का सिर बुद्धि, विवेक और धैर्य का प्रतीक है। शिवजी द्वारा गणेशजी को प्रथम पूज्य बनाना यह दर्शाता है कि जो अपने कर्तव्य का पालन सच्चे मन से करता है, वही सबसे अधिक सम्मान का अधिकारी होता है।
इस कथा से यह शिक्षा मिलती है कि आज्ञा पालन, धैर्य और विवेक से ही जीवन में सफलता और सम्मान प्राप्त होता है।

(५)

शीर्षक: गणेश—दिव्य वरदान से प्रथम पूज्य तक

 

बहुत प्राचीन समय की बात है। माता पार्वती के मन में एक पवित्र इच्छा जागी। वे चाहती थीं कि उन्हें ऐसा पुत्र मिले जो अत्यंत बुद्धिमान हो, गुणों से परिपूर्ण हो और सभी गणों का नायक बने। इस संकल्प को पूरा करने के लिए माता पार्वती ने कठोर तपस्या की और एक महान यज्ञ का आयोजन किया।
जब यज्ञ पूर्ण हुआ, तब एक अद्भुत घटना घटी। स्वयं भगवान गणेश ब्राह्मण का वेश धारण कर माता पार्वती के द्वार पर आए। माता पार्वती ने उन्हें अतिथि समझकर आदरपूर्वक स्वागत किया। उनके प्रेम और सेवा से प्रसन्न होकर उस ब्राह्मण ने वरदान दिया—
“माते! आपकी तपस्या के फलस्वरूप आपको गर्भ के बिना ही एक दिव्य पुत्र प्राप्त होगा। वह बालक असाधारण बुद्धि वाला, गुणों का भंडार और समस्त गणों का नायक होगा।”
यह कहकर वह ब्राह्मण अंतर्ध्यान हो गए। उसी क्षण चमत्कार हुआ—एक सुंदर बालक पालने में प्रकट हो गया। माता पार्वती आनंद से भर उठीं और समूचे कैलाश में उत्सव का वातावरण छा गया।

आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी। देवता और ऋषिगण उस विलक्षण बालक के दर्शन के लिए कैलाश आने लगे। तभी शनिदेव भी वहाँ पहुँचे। अपनी कठोर दृष्टि के कारण वे बालक को देखने से संकोच कर रहे थे। माता पार्वती ने उन्हें उत्सव में सम्मिलित होने का आग्रह किया।
संकोचवश शनिदेव ने बालक पर दृष्टि डाली। जैसे ही उनकी दृष्टि पड़ी, एक भयानक घटना घट गई। बालक का सुंदर सिर धड़ से अलग होकर आकाश की ओर उड़ गया। यह दृश्य देखकर माता पार्वती विलाप करने लगीं और कैलाश में शोक छा गया।

माता पार्वती के दुःख को देखकर सभी देवता चिंतित हो उठे। तब भगवान विष्णु ने गरुड़ देव को आदेश दिया—
“तुरंत आकाश मार्ग से जाओ और जो प्राणी सबसे पहले दिखे, उसका सिर लेकर आओ।”
गरुड़ देव चले और मार्ग में उन्हें एक विशाल हाथी दिखाई दिया। वे हाथी का सिर लेकर शीघ्र लौट आए। उस हाथी का सिर बालक के धड़ पर स्थापित किया गया। फिर भगवान शिव ने अपने दिव्य मंत्रों से उसमें प्राण फूँक दिए। उसी क्षण बालक जीवित हो उठा।
समस्त कैलाश आनंद से गूंज उठा। माता पार्वती का शोक समाप्त हो गया और देवताओं ने हर्ष से पुष्प-वृष्टि की।

तब भगवान शिव ने घोषणा की—
“यह बालक अब गणेश कहलाएगा और सभी गणों का नायक होगा। संसार के हर शुभ कार्य में इसकी पूजा सबसे पहले की जाएगी।”
इस प्रकार भगवान गणेश को प्रथम पूज्य का वरदान प्राप्त हुआ।

यह कथा बताती है कि भगवान गणेश का जन्म माता पार्वती की तपस्या, भक्ति और संकल्प का फल है। ब्राह्मण रूप में आए गणेश यह दर्शाते हैं कि ईश्वर साधारण रूप में भी प्रकट हो सकते हैं। शनिदेव की दृष्टि से हुई घटना हमें कर्म और ग्रह प्रभाव का संकेत देती है।
हाथी का सिर बुद्धि, स्मरण शक्ति और विवेक का प्रतीक है। इसलिए गणेश जी को बुद्धि के देवता माना जाता है। भगवान शिव द्वारा उन्हें प्रथम पूज्य बनाना यह सिखाता है कि किसी भी शुभ कार्य की सफलता के लिए बुद्धि, विवेक और विनम्रता आवश्यक है।
इसी कारण आज भी हर पूजा और शुभ कार्य की शुरुआत भगवान गणेश की आराधना से की जाती है।