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🌸 जब भक्त की पुकार पर भगवान को भी रोना पड़ा🌸
माता कुंती की भक्ति — सुख नहीं, स्मरण की याचना
महाभारत का महायुद्ध समाप्त हो चुका था।
कुरुक्षेत्र की भूमि, जो कुछ समय पहले तक रणघोष, शंखनाद और रथों की गर्जना से काँप रही थी, अब मौन थी।
धर्म की विजय हुई थी। अधर्म पराजित हो चुका था। पांडव विजयी थे, और युधिष्ठिर का राज्याभिषेक संपन्न हो चुका था।
द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण ने मन ही मन सोचा—
“अब मेरा कार्य यहाँ पूर्ण हुआ।
धर्म की स्थापना हो चुकी है।
मेरे प्रिय सखा अर्जुन का युद्ध समाप्त हो गया।
युधिष्ठिर धर्मपूर्वक सिंहासन पर विराजमान हो चुके हैं।
अब मुझे अपनी नगरी द्वारिका लौटना चाहिए।”
यह विचार करते हुए प्रभु अपने रथ की ओर बढ़े।
वे रथ पर विराजमान हुए।
घोड़ों की लगाम उनके हाथों में थी—
बस प्रस्थान का क्षण ही था।
तभी उनकी दृष्टि सामने पड़ी।
वहाँ माता कुंती खड़ी थीं—
भगवान की बुआ, पांडवों की माता,
असंख्य दुःखों को सह चुकी एक तपस्विनी नारी।
श्रीकृष्ण का नियम था—
वे जब भी कुंती बुआ से मिलते,
तो त्रिलोकनाथ होकर भी
एक साधारण भतीजे की तरह
रथ से उतरकर पहले उनके चरण स्पर्श करते।
कुंती को देखते ही
कृष्ण तुरंत रथ से उतरे और उनकी ओर बढ़े।
लेकिन आज…
आज कुछ विलक्षण घटित हुआ।
कृष्ण झुकते,
उससे पहले ही
वृद्धा कुंती आगे बढ़ीं
और त्रिभुवन के स्वामी श्रीकृष्ण के चरणों में अपना मस्तक रख दिया।
यह दृश्य देखकर
श्रीकृष्ण स्तब्ध रह गए।
उनका हृदय भर आया।
नेत्र सजल हो उठे।
उन्होंने तुरंत कुंती के हाथ थाम लिए और भावविभोर होकर बोले—
“अरे बुआ! यह आप क्या कर रही हैं?”
“यह क्या अनर्थ है?”
“मैं आपका भतीजा हूँ… छोटा हूँ…”
“नित्य तो मैं आपको प्रणाम करता हूँ…”
“आज आप मुझे इस प्रकार लज्जित क्यों कर रही हैं?”
तभी माता कुंती ने आँसुओं से भरी आँखों से कृष्ण की ओर देखा।
उनका कंठ भर आया था,
स्वर काँप रहा था,
पर उसमें अपार दृढ़ता थी।
उन्होंने कहा—
“बस कृष्ण… बस!”
“अब और छल नहीं।”
“यह बुआ और भतीजे का नाटक बहुत हो चुका, केशव!”
कृष्ण मौन हो गए।
कुंती आगे बोलीं—
“मैं तुझे आज से नहीं जानती।”
“मैं तुझे तब से जानती हूँ, जब तू गोकुल की गलियों में गोबर से सने नन्हे-नन्हे पैरों से ‘थप-थप’ चलता था।”
“मैंने सुना है कि तू वृन्दावन में कैसे मटकियाँ फोड़ा करता था।”
“मैं जानती हूँ कि तूने मेरे पुत्रों की रक्षा के लिए अपनी प्रतिज्ञा तोड़ी।”
“हे गोविंद! तूने सुदर्शन चक्र उठाया।”
“तूने अर्जुन के लिए सारथी बनकर घोड़े हाँके।”
“तूने उनके पसीने पोंछे।”
“तू जगदाधार होकर भी सेवक बना रहा।”
कुंती के नेत्रों से अश्रुधारा बह चली।
वे पुनः बोलीं—
“मैं जानती हूँ… और यह सारा संसार जानता है…”
“तू साक्षात् परब्रह्म है।”
“अब तक तू मेरे लिए भतीजा बना रहा…”
“मेरे पुत्रों के लिए मामा और सखा बना रहा…”
“पर अब, हे कान्हा…”
“अब जब मैं जीवन की सांध्य बेला में हूँ…”
“आज तू एक बार भगवान बन जा…”
“और मुझे अपना भक्त बनने दे।”
“आज यहाँ बुआ नहीं खड़ी है…”
“आज एक भक्त हाथ जोड़कर तेरे सामने खड़ी है।”
यह सुनकर
श्रीकृष्ण की मुस्कान भीग गई।
उन्होंने प्रेम से कहा—
“ठीक है देवी!”
“यदि आपकी यही इच्छा है…”
“तो आज से मैं भगवान…”
“और आप मेरी भक्त।”
“माँगिए…”
“आज आप मुझसे जो माँगेंगी…”
“मैं आपको अवश्य दूँगा।”
“तीनों लोकों का ऐश्वर्य भी आपके चरणों में अर्पित है।”
अब वह क्षण आया,
जो भक्ति के इतिहास में अमर हो गया।
कुंती ने हाथ जोड़कर कहा—
“हे जगद्गुरु!”
“यदि मुझे कुछ देना ही चाहते हो…”
“तो मुझे दुःख दो।”
“मुझे इतनी विपत्तियाँ दो…”
“इतने संकट दो…”
“कि एक पल के लिए भी मेरा मन तुमसे दूर न हो।”
यह सुनकर
भगवान श्रीकृष्ण भी स्तब्ध रह गए।
उन्होंने व्यथित स्वर में पूछा—
“बुआ!”
“यह आप क्या कह रही हैं?”
“आपका जीवन तो स्वयं दुःखों की प्रयोगशाला रहा है।”
“विवाह के बाद पति का वियोग…”
“फिर वनवास…”
“फिर लाक्षागृह का षड्यंत्र…”
“फिर यह भयंकर महायुद्ध…”
“अब जब सुख का समय आया है…”
“आपके पुत्र राजा बने हैं…”
“तब आप मुझसे फिर दुःख क्यों माँग रही हैं?”
तब कुंती ने वह उत्तर दिया,
जो भक्ति का शिखर है—
“हाँ केशव! मुझे दुःख ही चाहिए।”
“क्योंकि जब-जब मेरे जीवन में सुख आया…”
“मैं संसार में उलझ गई।”
“और जब-जब मुझ पर विपत्ति पड़ी…”
“तब-तब केवल तुम ही स्मरण में आए।”
“सुख में मैं शायद तुम्हें भूल जाऊँ…”
“पर दुःख में तुम हर क्षण मेरे साथ रहते हो।”
“मुझे वह सुख नहीं चाहिए…”
“जो मुझे तुमसे दूर कर दे।”
“मुझे वह दुःख प्रिय है…”
“जो मुझे हर पल तुम्हारी स्मृति में रखे।”
उस क्षण
भगवान श्रीकृष्ण की आँखों से भी
अश्रु बह चले।
🌼 व्याख्या (Explanation)
यह कथा बताती है कि
सच्ची भक्ति सुख की कामना नहीं करती, स्मरण की कामना करती है।
माता कुंती जानती थीं—
सुख मनुष्य को संसार में बाँध देता है,
और दुःख भगवान से जोड़ देता है।
उनकी भक्ति न स्वार्थपूर्ण थी,
न मांगों से भरी।
वह केवल एक ही चाह रखती थी—
“मेरा मन तुमसे कभी अलग न हो।”
🌺 नीति / Moral
✨ जो सुख हमें भगवान से दूर कर दे, वह सुख भी बंधन है।
✨ जो दुःख हमें भगवान के समीप ले जाए, वही सच्चा वरदान है।
✨ भक्ति का शिखर वह है, जहाँ भक्त अपने लिए कुछ नहीं चाहता—सिवाय प्रभु के स्मरण के।
🌸 अंतिम भाव 🌸
“दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे को होय।”
🌸 जय श्री कृष्ण! 🌸