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🌼शीर्षक: गुरु-भक्ति की चरम सीमा — आरुणि की अमर कथा🌼

 

प्राचीन काल में महर्षि धौम्य ऋषि का आश्रम शांति, तप और अनुशासन का केंद्र था। उसी आश्रम में एक तेजस्वी किंतु अत्यंत विनम्र शिष्य निवास करता था—आरुणि।

आरुणि प्रतिदिन गुरु-आज्ञा को ही अपना धर्म मानता। सेवा, श्रम और समर्पण उसके जीवन की साँसें थीं।

 

एक दिन गुरु धौम्य ऋषि ने आरुणि को आदेश दिया—

“वत्स, आश्रम के लिए वन से इंधन (लकड़ी) ले आओ।”

आज्ञा पाते ही आरुणि तुरंत निकल पड़ा।

 

इंधन एकत्र कर लौटते समय उसकी दृष्टि गुरु के खेत की ओर गई।

वहाँ उसने देखा—खेत का बाँध टूट चुका था और जल वेग से बहकर पूरी फसल को नष्ट करने को आतुर था।

क्षण भर वह रुका।

 

उसके मन में द्वंद्व उठा—

“यदि अभी बाँध ठीक करूँ तो आश्रम में लकड़ी नहीं पहुँचेगी, गुरु और शिष्य ठंड में कष्ट पाएँगे।

और यदि पहले आश्रम जाऊँ तो फसल नष्ट हो जाएगी।”

 

कर्तव्यबोध ने उसे गुरु के चरणों तक पहले पहुँचने को प्रेरित किया।

वह आश्रम पहुँचा और गुरु को संकट से अवगत कराया।

आज्ञा मिलते ही वह पुनः दौड़ पड़ा—उसी टूटे बाँध की ओर।

 

आरुणि ने जो कुछ पास था—लकड़ियाँ, मिट्टी, कीचड़—सब बाँध में लगा दिया।

परंतु जलधारा अत्यंत प्रचंड थी।

सारे प्रयास निष्फल हो गए।

 

थका हुआ, काँपता हुआ, पर संकल्प में अडिग आरुणि एक क्षण रुका और फिर निश्चय किया—

“यदि कोई उपाय नहीं, तो मेरा शरीर ही बाँध बनेगा।”

 

उसने स्वयं को बाँध की दरार में लिटा दिया।

ठंडा जल उसके शरीर को भेदता रहा, साँसें जड़ होने लगीं, पर उसका संकल्प नहीं टूटा।

 

साँझ हो गई…

आरुणि आश्रम नहीं लौटा।

 

गुरु धौम्य ऋषि शिष्यों के साथ उसे खोजते हुए खेत तक पहुँचे।

जब उन्होंने पुकारा—

“वत्स आरुणि!”

तो जलधारा के बीच से क्षीण स्वर आया—

“गुरुजी… मैं यहाँ हूँ…”

 

दृश्य देखकर गुरु का हृदय भर आया।

शिष्यों ने तुरंत आरुणि को बाहर निकाला, बाँध की मरम्मत की।

 

धौम्य ऋषि ने आरुणि को कंबल ओढ़ाया, उसका उपचार किया और भावुक स्वर में कहा—

“वत्स! फसल नष्ट भी हो जाती, तो दुःख न होता।

पर यदि तुझे कुछ हो जाता, तो यह आश्रम सूना हो जाता।”

 

गुरु ने उसे आशीर्वाद दिया—

“तेरी गुरु-भक्ति, त्याग और निष्ठा युगों-युगों तक स्मरणीय रहेगी।”

 

और तभी से आरुणि की कथा गुरु-भक्ति की अमर मिसाल बन गई।

 

🔍 भावार्थ / व्याख्या (Explanation)

आरुणि की कथा केवल एक घटना नहीं, बल्कि यह सिखाती है कि—

  • सच्चा शिष्य परिणाम नहीं, कर्तव्य देखता है
  • गुरु के कार्य को अपना जीवन मानता है
  • सेवा में सुविधा नहीं, समर्पण खोजता है
  • जब उपाय समाप्त हो जाएँ, तब भी संकल्प जीवित रहता है

आरुणि ने न तो पुरस्कार की इच्छा की, न प्रशंसा की।

उसका धर्म था—गुरु का हित।

 

🌿 नैतिक शिक्षा (Moral / सीख)

🌼 जो शिष्य गुरु के प्रति पूर्ण समर्पित होता है,

वही सच्चे अर्थों में ज्ञान का अधिकारी बनता है।

 

🌼 कर्तव्य जब तप बन जाए,

तो साधारण व्यक्ति भी अमर हो जाता है।

 

🌼 गुरु-भक्ति में किया गया त्याग कभी व्यर्थ नहीं जाता।