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🌸 दीनबंधु का मित्र
बंधु मोहंती और श्रीजगन्नाथ की अपूर्व लीला
🌿 1. संकल्प का जन्म
🕉️ काव्य
उड़ीसा की धरती, धूल भी धन्य,
जहाँ नाम बिना सब शून्य और व्यर्थ।
एक दीन गृहस्थ, भिक्षुक तन,
पर हृदय में हरि का अर्थ।
📖 विवरणात्मक अनुच्छेद
उड़ीसा के एक छोटे से गाँव में बंधु मोहंती नाम का एक अत्यंत निर्धन व्यक्ति रहता था। उसका जीवन बाह्य रूप से अभावों से भरा था—न घर की स्थिर आय, न अन्न का निश्चय। वह अपने परिवार का पालन-पोषण केवल भिक्षा से करता था। परंतु बंधु की विशेषता उसकी निर्धनता नहीं, बल्कि उसकी नित्य सत्संग में उपस्थिति थी। प्रतिदिन संतों की वाणी सुनते-सुनते उसके मन में एक दृढ़ संकल्प उत्पन्न हो गया कि मनुष्य जीवन का एकमात्र लक्ष्य भगवद् प्राप्ति है। उसी क्षण से उसके लिए संसार के सारे प्रयोजन गौण हो गए।
🌿 2. भिक्षा, उपवास और नाम
🕉️ काव्य
दो कौर मिले तो देह चली,
न मिले तो नाम सहारा।
भूख भी उसकी साधना बनी,
उपवास हुआ उजियारा।
📖 विवरणात्मक अनुच्छेद
बंधु भिक्षा माँगता अवश्य था, पर उसने भिक्षा को कभी जीवन का आधार नहीं बनाया। वह केवल दो-चार घरों से ही अन्न माँगता—मिला तो ठीक, न मिला तो वह बिना किसी खेद के उपवास कर लेता। उस उपवास को वह कष्ट नहीं, साधना मानता था। खाली पेट, एकांत में बैठकर वह घंटों नाम-कीर्तन करता। उसके लिए भूख देह की अवस्था थी, आत्मा की नहीं। इस प्रकार उसका जीवन तप, संयम और नाम में ढलता चला गया।
🌿 3. पत्नी के साथ संयुक्त भक्ति
🕉️ काव्य
पति ने कहा—यह देह नश्वर,
पत्नी बोली—आप ही पथ।
दो तन, एक स्वर बन गए,
नाम हुआ जीवन-रत्न।
📖 विवरणात्मक अनुच्छेद
बंधु मोहंती ने अपनी पत्नी को भी यही समझाया कि इस संसार का परम लाभ केवल भगवान के स्मरण में है। पत्नी पतिव्रता और सरल हृदय की थीं। उन्होंने पति की वाणी को शिरोधार्य किया और उसके साथ बैठकर नाम-कीर्तन करने लगीं। अब वह घर केवल निर्धन गृहस्थ का निवास नहीं रहा, बल्कि एक छोटा-सा आश्रम बन गया। पति-पत्नी दोनों का जीवन अब बाह्य संसार से कटकर प्रभु-स्मरण में एकाग्र हो गया।
🌿 4. दारिद्र्य की पराकाष्ठा
🕉️ काव्य
फटे वस्त्र, सूखे हाथ,
पर विश्वास अडिग, महान।
जब अन्न भी रूठ गया,
तब नाम बना पहचान।
📖 विवरणात्मक अनुच्छेद
समय बीतता गया। घर में धन बिल्कुल समाप्त हो गया। भिक्षा भी कई-कई दिनों तक नहीं मिलती थी। शरीर पर केवल फटे, गाँठ लगे पुराने कपड़े रह गए थे। कई दिन ऐसे बीते जब पूरे परिवार को एक दाना भी नसीब नहीं हुआ। उस समय बंधु ने पत्नी से कहा कि उसका एक मित्र है—बहुत धनी और कृपालु—जो उससे अत्यंत प्रेम करता है। यदि वे उसके पास जाएँ, तो कभी भूखे नहीं रहेंगे। पाँच दिन का पैदल मार्ग था, पर पत्नी ने बिना किसी संकोच के साथ चलने की स्वीकृति दे दी।
🌿 5. बच्चों के साथ यात्रा
🕉️ काव्य
नन्हे पाँव, सूखे कंठ,
पिता आगे, प्रभु संग।
पत्ते बने भोजन वहाँ,
जहाँ नाम था जीवन-रंग।
📖 विवरणात्मक अनुच्छेद
बंधु अपने दो छोटे बच्चों और पत्नी के साथ उस गाँव से निकल पड़े। कई दिनों से भूखे होने के कारण चलना अत्यंत कठिन था। रास्ते में जब बच्चे या पत्नी भूख के कारण लड़खड़ा जाते, तब बंधु जंगल से कोमल-कोमल पत्ते चुनकर लाता और उन्हें खिलाता। कई बार केवल पानी पीकर ही सबको संतोष करना पड़ता। फिर भी वे निरंतर आगे बढ़ते रहे। बंधु के हृदय में प्रभु-मिलन की चाह इतनी तीव्र थी कि उसे स्वयं की भूख का कोई भान नहीं रहता था।
🌿 6. अंतःकरण की पुकार
🕉️ काव्य
“मैं सह लूँ प्रभु, सब पीड़ा,
पर बच्चों का दुःख निहारूँ कैसे?”
आँसू बने प्रार्थना,
पथ बना विश्वास।
📖 विवरणात्मक अनुच्छेद
यात्रा के दौरान बंधु भीतर ही भीतर भगवान से रोते हुए प्रार्थना करता रहता था। वह कहता—“हे प्रभु! मैं तो भूख सह सकता हूँ, पर मेरे बच्चे कैसे इतना कष्ट सह पाएँगे? मुझे इतना सामर्थ्य देना कि मैं शीघ्र आप तक पहुँच जाऊँ।” यह प्रार्थना किसी मांग से नहीं, बल्कि पूर्ण समर्पण से निकली थी।
🌿 7. जगन्नाथ पुरी में प्रवेश
🕉️ काव्य
दूर दिखा नीलाचल शिखर,
देह गिरी, मन उड़ गया।
मित्र मिला—दीनबंधु,
संदेह वहीं टूट गया।
📖 विवरणात्मक अनुच्छेद
किसी प्रकार लड़खड़ाते हुए पूरा परिवार पाँच दिन में जगन्नाथ पुरी पहुँचा। मंदिर के दूर से दर्शन होते ही बंधु मोहंती भूमि पर साष्टांग गिर पड़ा। वह अपनी पत्नी से कहने लगा कि यही उसका मित्र है—दीनबंधु श्रीजगन्नाथ। उनकी कृपा से ही वे यहाँ तक पहुँच पाए हैं। पत्नी के हृदय में भी संतोष था कि अब शायद भूख का अंत होगा।
🌿 8. सिंह द्वार, प्रसाद-धोवन जल और रात्रि
🕉️ काव्य
कपाट बंद, भीड़ अपार,
पर भरोसा अचल रहा।
धोवन जल भी प्रसाद बना,
जहाँ नाम ही पल रहा।
📖 विवरणात्मक अनुच्छेद
सिंह द्वार पर अत्यधिक भीड़ थी और कुछ ही समय में मंदिर के कपाट बंद हो गए। भूख से व्याकुल बच्चे और पत्नी एक ओर खड़े रहे, पर कोई उन्हें पूछने वाला नहीं था। बंधु उन्हें मंदिर की दक्षिण दिशा में ले गया, जहाँ प्रसाद के पात्र धोने का जल निकलता था। उसने कहा कि इस जल में प्रभु के पात्र धोए जाते हैं, यह भी प्रसाद है। पूरे परिवार ने वही जल पीकर पेट भरा। रात में बंधु वहीं बैठकर नाम-कीर्तन करता रहा और प्रभु से प्रार्थना करता रहा कि उसकी पत्नी का विश्वास कभी न टूटे।
🌿 9. रात्रि की लीला और परीक्षा
🕉️ काव्य
रात स्वयं बन आई साक्षी,
ब्राह्मण रूप धर आए नाथ।
भोग भी दिया, दंड भी दिया,
यही भक्ति की बात।
📖 विवरणात्मक अनुच्छेद
रात्रि में भगवान स्वयं ब्राह्मण के वेश में भंडार गृह से रत्नजड़ित थाल में भोग सजाकर बाहर आए और बंधु मोहंती को पुकारा। पूरे परिवार ने कई दिनों बाद भरपेट भोजन किया। किंतु सुबह वही थाल ग़ायब पाया गया और बंधु पर चोरी का आरोप लगा। उसे पीटा गया, अपमानित किया गया, पर वह हर प्रहार पर “जय जगन्नाथ” का जप करता रहा।
🌿 10. सत्य की विजय
🕉️ काव्य
जो सह गया, वही चुन लिया गया,
जो टूटा नहीं, वही बना आधार।
भक्त की पीड़ा से काँपा सिंहासन,
उतर आया स्वयं सरकार।
📖 विवरणात्मक अनुच्छेद
राजा प्रताप रुद्र को स्वप्न में भगवान ने दर्शन देकर सत्य प्रकट किया। राजा तत्काल आए, बंधु मोहंती से क्षमा माँगी और सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि अब से मंदिर का संपूर्ण हिसाब-किताब बंधु मोहंती के हस्ताक्षर से चलेगा। बंधु वहीँ फटे वस्त्रों में, दैन्य भाव से खड़ा रहा। आज भी उसके वंशज जगन्नाथ पुरी में सेवा करते हैं।