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🌸 भाव की रसोई और भगवान की तृप्ति
काशी की माई यशोदा और श्रीकृष्ण की अनुपम लीला
काशी के समीप एक छोटे से गाँव में एक अत्यंत वृद्ध और निर्धन स्त्री निवास करती थी। लोग उसे माई यशोदा के नाम से जानते थे। उसके पास संसार की दृष्टि से कुछ भी नहीं था—रहने के लिए एक टूटी-फूटी झोपड़ी और पूजा के लिए भगवान श्रीकृष्ण की एक छोटी-सी पत्थर की मूर्ति। वही मूर्ति उसके लिए समस्त संसार थी, वही उसका संबल, वही उसका परिवार।
माई यशोदा की निर्धनता गहरी थी, पर उसकी भक्ति उससे भी गहरी। उसने अपने जीवन में एक नियम बना रखा था, जिसे वह किसी भी परिस्थिति में नहीं तोड़ती थी। प्रतिदिन दोपहर के समय वह भगवान को मालपुए का भोग अर्पित करती थी। यह नियम वर्षों से चला आ रहा था। किंतु बाह्य दृष्टि से देखें तो यह असंभव-सा प्रतीत होता था, क्योंकि उसके पास न घी था, न शक्कर और न ही आटा। उसके घर में ऐसी कोई सामग्री नहीं थी, जिससे वास्तव में मालपुए बनाए जा सकें।
परंतु माई यशोदा की रसोई बाहर की नहीं, भीतर की थी। वह प्रतिदिन दोपहर को अपनी झोपड़ी में चूल्हा जलाती, उस पर एक खाली मिट्टी की कड़ाही रखती और फिर नेत्र मूँद लेती। उसके बाद वह मन ही मन भगवान के लिए मालपुए बनाने की प्रक्रिया में डूब जाती। उसकी कल्पना इतनी सजीव होती कि उसके भीतर प्रेम, श्रद्धा और समर्पण की सुगंध फैल जाती। उसके लिए वह खाली कड़ाही भी दिव्य बन जाती थी। उसी भावावेश में वह भगवान को भोग अर्पित करती और अंत में एक खाली थाली श्रद्धा से उनके सामने रख देती। उस समय उसकी आँखों से अश्रुधारा बहती रहती, जो उसके प्रेम की गवाही देती थी।
इधर गाँव के मुख्य मंदिर में एक भव्य आयोजन किया गया। राजा ने अपनी शक्ति और वैभव का प्रदर्शन करते हुए विशाल भंडारे का आयोजन कराया। असंख्य मालपुए तैयार किए गए, जिनमें शुद्ध घी, केसर और उत्तम सामग्री का प्रयोग हुआ। मंदिर में धन, अन्न और ऐश्वर्य की कोई कमी नहीं थी। फिर भी जब भगवान की मूर्ति की ओर देखा गया, तो उनके मुख पर वह दिव्य प्रसन्नता दिखाई नहीं दे रही थी, जो सामान्यतः अनुभव होती थी। यह दृश्य राजा और मंदिर के पंडितों को असमंजस में डालने लगा।
उसी समय माई यशोदा अपनी दैनिक भक्ति के क्रम में मंदिर पहुँची। उसके वस्त्र पुराने और फटे हुए थे और उसके हाथ में एक साधारण-सी खाली पत्तल थी। मंदिर के सेवकों और पंडितों ने उसे देखकर तिरस्कार किया और उसे मंदिर से बाहर कर दिया। उनके लिए उसका निर्धन स्वरूप अपवित्रता का प्रतीक बन गया था।
जैसे ही माई यशोदा मंदिर से बाहर हुई, वातावरण में एक अद्भुत परिवर्तन हुआ। मंदिर के गर्भगृह से अचानक शुद्ध घी और इलायची की वैसी ही सुगंध फैलने लगी, जैसी ताज़े मालपुए बनने पर आती है। यह सुगंध रहस्यमयी थी, क्योंकि मंदिर की रसोई में उस समय कोई पकवान नहीं बन रहा था। राजा और पंडित इस अलौकिक अनुभूति से स्तब्ध रह गए।
तभी दैवी संकेत के माध्यम से यह रहस्य प्रकट हुआ कि भगवान वैभव से नहीं, भाव से तृप्त होते हैं। यह भी स्पष्ट हुआ कि भगवान उस समय माई यशोदा की झोपड़ी में उसकी भावपूर्ण कल्पना से बने मालपुओं का आस्वादन कर रहे थे। उसकी भक्ति, उसके आँसू और उसका निश्छल प्रेम ही वह घी और शक्कर थे, जिनसे भगवान तृप्त हुए थे।
राजा को अपने अहंकार और भूल का गहरा बोध हुआ। जब वह माई यशोदा के पास पहुँचा, तो उसने देखा कि उसकी उस खाली मिट्टी की कड़ाही में अब भी एक अद्भुत दिव्यता शेष थी। उसमें से एक सूक्ष्म सुगंध और आलोक फैल रहा था, मानो उस स्थान को स्वयं भगवान ने स्पर्श किया हो।
उस दिन यह सत्य सभी के सामने प्रकट हो गया कि ईश्वर बाह्य ऐश्वर्य से नहीं, अंतःकरण की शुद्धता से प्रसन्न होते हैं। श्रद्धा से भरी एक खाली कड़ाही भी अहंकार से भरे स्वर्ण पात्र से कहीं अधिक मूल्यवान होती है। जहाँ प्रेम होता है, वहीं भगवान निवास करते हैं।
🌺 कथा-संदेश
ईश्वर को भोग नहीं, भाव चाहिए।
भक्ति की रसोई में कल्पना भी प्रसाद बन जाती है।
जय श्रीकृष्ण
जय जय श्री राधे 🌸