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🌼 शीर्षक: “भाव के बंधन में बंधे भगवान” 🌼
घने वन के मध्य एक छोटी-सी कुटिया थी। वहाँ एक महान संत निवास करते थे। उनका जीवन तप, संयम और निरंतर भक्ति से ओत-प्रोत था। दिन-रात वे अपने आराध्य भगवान श्रीकृष्ण के स्मरण में लीन रहते, नेत्रों से अश्रु बहते रहते।
उसी वन में एक किरात (शिकारी) भी रहता था। उसका जीवन शिकार पर निर्भर था। वह वन-वन भटकता, किंतु उसके भीतर एक सहज संस्कार था—जब भी वह संत की कुटिया के पास से गुजरता, श्रद्धा से उन्हें नमन अवश्य करता।
🟢 जिज्ञासा का प्रश्न
एक दिन किरात के मन में कौतूहल जागा। उसने संत से सरलता से पूछ लिया—
“बाबा, मैं तो जंगल में मृग का शिकार करता हूँ, पर आप यहाँ बैठकर किसका शिकार कर रहे हैं?”
यह सुनते ही संत की आँखें भर आईं। करुण स्वर में उन्होंने कहा—
“बेटा, मैं उस श्रीकृष्ण का शिकार करना चाहता हूँ, जो चितचोर हैं, जो मन को हर लेते हैं।”
🟢 भोलेपन की प्रतिज्ञा
किरात ने इसे साधारण बात समझा। उसने कहा—
“बाबा, रोते क्यों हो? बस मुझे उसका हुलिया बता दो। मैं उसे पकड़कर आपके चरणों में ला दूँगा।”
संत ने अपने आराध्य का सजीव वर्णन किया—
सांवला स्वरूप, सिर पर मोरपंख, अधरों पर बंसी, कमल-नयन।
यह सुनकर किरात ने दृढ़ निश्चय कर लिया—
“जब तक उस शिकार को पकड़ नहीं लाऊँगा, अन्न-जल कुछ भी ग्रहण नहीं करूँगा।”
🟢 अडिग विश्वास की परीक्षा
किरात ने जंगल में जाल बिछाया और बैठ गया।
एक दिन बीता…
दूसरा दिन बीता…
तीसरा दिन भी बीत गया।
भूख-प्यास से उसका शरीर कमजोर हो गया, पर उसका विश्वास अडिग रहा। उसके मन में केवल वही सांवला-सलोना रूप बसा था।
🟢 भाव से बंधे भगवान
उस निष्कपट विश्वास ने भगवान श्रीकृष्ण के हृदय को द्रवित कर दिया।
वे तो ज्ञान या तपस्या के नहीं, भाव के भूखे हैं।
बंसी बजाते हुए प्रभु स्वयं आए और जानबूझकर किरात के जाल में फँस गए।
किरात जब उस दिव्य सौंदर्य को देखता है, तो स्तब्ध रह जाता है। आँखों से आँसू बहने लगते हैं। उसे संत की बात याद आती है और वह आनंद से चिल्ला उठता है—
“शिकार मिल गया!”
🟢 निष्कपट व्यवहार
वह प्रभु को साधारण शिकार समझकर अपने कंधे पर उठा लेता है और संत की कुटिया की ओर चल पड़ता है।
“बाबा! बाहर आइए, मैं आपका शिकार पकड़ लाया हूँ!”
संत बाहर आते हैं और दृश्य देखकर काँप उठते हैं। उनके कंधों पर साक्षात् भगवान श्रीकृष्ण विराजमान थे।
वे किरात के चरणों में गिरकर रो पड़ते हैं और प्रभु से पूछते हैं—
“हे नाथ! मैंने जीवन भर तप किया, फिर भी आपके दर्शन दुर्लभ रहे। और इस शिकारी को मात्र तीन दिनों में आप मिल गए?”
🟢 भगवान का संदेश (व्याख्या)
भगवान श्रीकृष्ण प्रेम से मुस्कुराकर कहते हैं—
“महात्मन्! इसने मुझे पहचाना नहीं, पर तुम्हारे वचनों पर इसे पूर्ण विश्वास था।
इसका प्रेम निष्कपट था, इसमें कोई स्वार्थ नहीं था।
मैं ज्ञान, तप या विद्वत्ता से नहीं, बल्कि भाव और विश्वास से बंधता हूँ।”
🌸 कथा की शिक्षा (Explanation / Moral)🌸
यह कथा हमें सिखाती है कि—
भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं—
“मैं भाव का भूखा हूँ।”
✨ सच्ची भक्ति वही है, जिसमें विश्वास हो, सरलता हो और कोई दिखावा न हो। ✨