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🌸 “जब प्रभु स्वयं दीप बनकर मार्ग दिखाने आए”

 

उस दिन आकाश मानो धैर्य खो बैठा था। बादल इतने घने थे कि लगता था जैसे आकाश फट पड़ा हो। घनघोर वर्षा बिना रुके बरस रही थी। चारों ओर जल ही जल था। धरती और आकाश के बीच का अंतर मिट चुका था। दिन और रात का भेद समाप्त हो गया था—केवल सूर्य की क्षीण-सी गति से ही समय का अनुमान लगाया जा सकता था।

 

उस प्रलयंकारी वर्षा की रात एक भक्त जाग रहा था। उसका नाम था हरिनाम दास। वह साधारण देह का मनुष्य था, किंतु उसका हृदय अपार प्रेम और सेवा-भाव से भरा हुआ था। उस रात उसका मन अत्यंत अशांत था। आँखों में नींद नहीं थी, हृदय में चैन नहीं था। बार-बार एक ही विचार मन में उठ रहा था—

 

“इस भयानक वर्षा में कहीं मेरे ठाकुर जी की सेवा में कोई बाधा न आ जाए।

यमुना जी का जल कैसे पहुँचेगा?

क्या मेरी सेवा अधूरी रह जाएगी?”

 

यह चिंता इतनी गहरी थी कि पूरी रात वह करवटें बदलता रहा। बाहर मूसलाधार बारिश का शोर था, भीतर भक्ति की पुकार। जैसे ही उसे लगा कि सेवा का समय समीप आ गया होगा, उसने एक क्षण भी विलंब नहीं किया। बिना किसी भय के, बिना किसी सोच-विचार के, उसने कंधे पर घड़ा उठाया और उस अंधेरी, काली रात में यमुना जी की ओर चल पड़ा।

 

चारों ओर अंधकार था। वर्षा इतनी तेज़ थी कि आँखें खोलना कठिन हो रहा था। पैरों के नीचे पानी बह रहा था, रास्ता पहचान में नहीं आ रहा था। पग-पग पर गिरने का भय था, किंतु हरिनाम दास का मन डगमगा नहीं रहा था। उनके हृदय में केवल एक ही नाम गूँज रहा था—

 

“श्याम… मेरे श्याम…”

 

इसी बीच, उस घोर अंधकार में अचानक उन्हें हल्का-सा प्रकाश दिखाई दिया। वह प्रकाश न तो बिजली की चमक जैसा था और न ही किसी दीपक की लौ जैसा। उसमें एक अलौकिक कोमलता थी।

 

उसी प्रकाश में उन्होंने एक बालक को देखा। लगभग सात–आठ वर्ष का, नंगे पाँव, कांचनी पहने, हाथ में जलती हुई मशाल लिए वह उनके सामने खड़ा था। वर्षा उसके शरीर को भिगो रही थी, किंतु उसका मुख शांत और तेजस्वी था। मंद प्रकाश में उसका स्वरूप अत्यंत मनोहारी लग रहा था।

 

बालक ने अत्यंत मधुर स्वर में पूछा—

“बाबा, आप इतनी रात और इस भयंकर वर्षा में कहाँ जा रहे हैं?”

 

हरिनाम दास ने स्नेह से उत्तर दिया—

“बेटा, मैं अपने ठाकुर जी की सेवा के लिए यमुना जी से जल लेने जा रहा हूँ।”

 

बालक के मुख पर हल्की मुस्कान फैल गई। उसने सरलता से कहा—

“मैं भी यमुना पार किसी को निमंत्रण देने जा रहा हूँ। आप मेरे पीछे-पीछे आ जाइए। रास्ता सरल है।”

 

यह कहकर वह बालक आगे बढ़ चला। हरिनाम दास को न तो संदेह हुआ, न भय। उन्हें ऐसा लगा मानो कोई अपना मार्ग दिखा रहा हो। वे निःसंकोच उसके पीछे चल पड़े।

 

आश्चर्यजनक रूप से कुछ ही क्षणों में वे यमुना जी के तट पर पहुँच गए। जहाँ सामान्यतः लंबा और कठिन मार्ग लगता था, वहाँ आज एक भी बाधा नहीं आई। बालक बिना कुछ कहे आगे बढ़ा और धीरे-धीरे वर्षा और अंधकार में ओझल हो गया।

 

हरिनाम दास ने यमुना जी में स्नान किया। आँखें मूँदकर ठाकुर जी का ध्यान किया। मन में कृतज्ञता का भाव था। उन्होंने घड़ा जल से भरा और मंदिर की ओर लौटने लगे।

 

तभी वही बालक पुनः उनके सामने प्रकट हुआ।

 

इस बार उसका स्वरूप और भी दिव्य लग रहा था। उसका मुख किसी दीप की भाँति दमक रहा था। उसके चारों ओर एक अदृश्य आभा-सी थी, जिसे शब्दों में बाँधना कठिन था।

 

बालक ने कहा—

“बाबा, रात बहुत अंधेरी है। मैं आपको मंदिर तक पहुँचा देता हूँ। आप मेरे पीछे आइए।”

 

हरिनाम दास फिर उसके साथ चल पड़े। आज उन्हें और भी अधिक आश्चर्य हो रहा था। जो मार्ग सामान्यतः लंबा, फिसलन भरा और कठिन होता था, वह मानो तीन ही पगों में समाप्त हो गया। पल भर में वे मंदिर के द्वार पर खड़े थे।

 

हरिनाम दास का हृदय स्नेह से भर उठा। उन्होंने बालक से कहा—

“बेटा, तुम यहीं रुको। मैं तुम्हारे लिए भीतर से प्रसाद ले आता हूँ।”

 

यह कहकर वे गर्भगृह में चले गए। ठाकुर जी के चरणों में जल अर्पित किया और सेवा में लीन हो गए।

 

कुछ ही क्षणों बाद जब वे बाहर लौटे, तो उनके चरण वहीं ठिठक गए।

 

बालक वहाँ नहीं था।

 

चारों ओर देखा—कोई नहीं।

बारिश अब भी हो रही थी, पर वह दिव्य प्रकाश कहीं दिखाई नहीं दे रहा था।

 

उसी समय मंगला आरती का समय हो गया। हरिनाम दास पुनः गर्भगृह में गए। जैसे ही उन्होंने ठाकुर जी के श्रीविग्रह की ओर दृष्टि डाली, उनके नेत्र विस्मय से फैल गए।

 

ठाकुर जी की पोशाक पर मशाल का मीठा तेल लगा हुआ था।

उनके श्रीचरणों में मिट्टी जमी हुई थी।

 

उस क्षण हरिनाम दास के हृदय में जैसे वज्र-सा प्रकाश हुआ। सत्य एकदम स्पष्ट हो गया। आँखों से अश्रुधारा बह निकली। उनका शरीर काँप उठा।

 

वे फूट-फूटकर रो पड़े—

 

“हाय!

स्वयं मेरे ठाकुर श्याम बिहारी जी महाराज ही बालक बनकर मुझे मार्ग दिखाने आए थे…

और मैं अभागा उन्हें पहचान न सका…”

 

अब उन्हें सब समझ में आ गया था।

वह बालक कोई साधारण बालक नहीं था।

वह मार्ग कोई सामान्य मार्ग नहीं था।

वह सहायता कोई संयोग नहीं थी।

 

यह तो प्रभु की करुणा थी।

यह तो भगवान का प्रेम था।

 

जब भक्त की सेवा सच्ची होती है,

जब भाव निष्काम होता है,

तब भगवान केवल दूर से रक्षा नहीं करते—

वे स्वयं चल पड़ते हैं, दीप बनकर, पथप्रदर्शक बनकर।

 

🌼 व्याख्या (Explanation):

यह कथा दर्शाती है कि भक्ति केवल नियमों और विधियों का पालन नहीं है। सच्ची भक्ति वह है, जिसमें भक्त अपने कष्टों की चिंता छोड़कर केवल प्रभु की सेवा की चिंता करता है। हरिनाम दास ने वर्षा, भय और अंधकार की परवाह नहीं की—केवल सेवा का भाव रखा। इसी निष्कलुष भाव के कारण भगवान स्वयं उनके मार्गदर्शक बनकर आए। यह लीला यह सिखाती है कि भगवान अपने सच्चे भक्तों से कभी दूर नहीं होते।

 

🌺 नैतिक शिक्षा (Moral):

जहाँ भक्ति में स्वार्थ नहीं, केवल प्रेम और सेवा होती है—वहाँ भगवान स्वयं भक्त के लिए मार्ग बन जाते हैं।