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🌸 “कर्म की भक्ति और कठौती में प्रकट हुई गंगा”

 

एक समय की बात है। एक साधारण-सा नगर था, जहाँ गलियाँ संकरी थीं, पर उनमें रहने वालों के हृदय विशाल थे। उसी नगर की एक छोटी-सी गली में एक विनम्र संत रहते थे। उनका नाम था संत जनार्दन दास। वे पेशे से मोची थे। उनकी छोटी-सी दुकान थी, जहाँ वे दिनभर जूते बनाते थे। न तो उनका वस्त्र भव्य था, न जीवन में कोई दिखावा—पर उनके हृदय में ईश्वर के प्रति अगाध श्रद्धा और प्रेम का सागर लहराता रहता था।

 

संत जनार्दन दास के लिए जूते बनाना केवल आजीविका नहीं था। वह उनके लिए साधना थी, तपस्या थी। जब वे चमड़ा काटते, सिलते और आकार देते, तब उनके मन में निरंतर प्रभु का स्मरण चलता रहता। उनका विश्वास था कि यदि कर्म ईमानदारी और प्रेम से किया जाए, तो वही सबसे बड़ी पूजा बन जाता है।

 

एक दिन संत जनार्दन दास अपनी दुकान में बैठकर पूरे ध्यान से जूते बना रहे थे। उसी समय वहाँ से एक प्रतिष्ठित पंडित जी गुजरे। वे गंगा स्नान के लिए जा रहे थे। उनके वस्त्र श्वेत थे, माथे पर तिलक था और हाथ में जपमाला।

 

पंडित जी ने संत जनार्दन दास को देखा और ठिठककर बोले—

“अरे भाई! तुम यहीं बैठे हो? आज तो बड़ा शुभ दिन है। चलो मेरे साथ गंगा स्नान करने। गंगा में स्नान करने से जन्म-जन्म के पाप धुल जाते हैं और बड़ा पुण्य मिलता है।”

 

संत जनार्दन दास ने विनम्रता से सिर झुकाया और मधुर स्वर में उत्तर दिया—

“पंडित जी, मन तो मेरा भी बहुत है गंगा मैया के दर्शन और स्नान का। पर आज मैंने एक ग्राहक को वचन दिया है कि उसके जूते आज ही तैयार कर दूँगा। यदि मैं अभी चला गया, तो मेरा वचन टूट जाएगा और उसका काम अधूरा रह जाएगा। मेरे लिए तो वचन निभाना और कर्म करना ही धर्म है।”

 

पंडित जी को यह बात कुछ अजीब लगी। वे मन ही मन सोचने लगे—

“यह कैसा व्यक्ति है! तीर्थ छोड़कर काम को बड़ा मान रहा है।”

 

तभी संत जनार्दन दास ने अपनी छोटी-सी गुल्लक खोली। उसमें से एक सुपारी (कहीं-कहीं इसे सिक्का भी कहा जाता है) निकाली और आदरपूर्वक पंडित जी को देते हुए बोले—

“पंडित जी, आप गंगा मैया के पास जा रहे हैं, यह मेरे हिस्से की भेंट आप ही अर्पित कर दीजिए। लेकिन मेरी एक विनती है—यह भेंट तभी देना, जब गंगा मैया स्वयं अपने हाथ बढ़ाकर इसे स्वीकार करें। यदि ऐसा न हो, तो इसे मुझे लौटा देना।”

 

यह सुनकर पंडित जी हँस पड़े। उन्हें लगा कि यह तो असंभव-सी बात है। गंगा मैया भला साक्षात् हाथ कैसे बढ़ाएँगी? फिर भी उन्होंने सुपारी रख ली और मन में संत को भोला समझते हुए आगे बढ़ गए।

 

जब वे गंगा घाट पहुँचे, तो विधिवत स्नान किया। स्नान के बाद उन्होंने मज़ाक-मज़ाक में गंगा की ओर देखकर कहा—

“हे गंगा मैया! यह भेंट संत जनार्दन दास ने भेजी है। यदि स्वीकार हो, तो हाथ बढ़ाकर ले लीजिए।”

 

और तभी वहाँ उपस्थित सभी लोग स्तब्ध रह गए।

 

गंगा जी की लहरों से सचमुच दो दिव्य हाथ बाहर निकले और उस सुपारी को स्वीकार कर लिया। क्षण भर के लिए पूरा घाट मौन हो गया। फिर उन्हीं हाथों से पंडित जी को एक चमकता हुआ सोने का कंगन दिया गया। एक दिव्य वाणी गूँजी—

“यह मेरे परम भक्त जनार्दन दास के लिए है। इसे उन्हीं को देना।”

 

पंडित जी भय और विस्मय से काँप रहे थे। पर जैसे ही उन्होंने उस सोने के कंगन की चमक देखी, उनके मन में लालच जाग उठा। उन्होंने सोचा—

“यदि यह कंगन राजा को दे दिया जाए, तो मुझे बड़ा इनाम मिल सकता है।”

 

उन्होंने कंगन संत को देने के बजाय राजा के पास पहुँचा दिया। राजा ने जब कंगन देखा, तो बहुत प्रसन्न हुआ। रानी को भी वह अत्यंत प्रिय लगा। पर रानी ने तुरंत कहा—

“एक कंगन से क्या होगा? मुझे तो जोड़ा चाहिए। दूसरा कंगन कहाँ है?”

 

अब पंडित जी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। राजा ने कठोर स्वर में आदेश दिया—

“दूसरा कंगन लाओ, नहीं तो दंड मिलेगा।”

 

डर, लज्जा और पश्चाताप से भरे पंडित जी सीधे संत जनार्दन दास की दुकान पर पहुँचे। उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे। उन्होंने पूरी घटना सच-सच सुना दी और क्षमा माँगते हुए बोले—

“महाराज, मैंने भारी अपराध कर दिया। अब मेरी रक्षा कीजिए।”

 

संत जनार्दन दास ने उन्हें दया से देखा। उनके चेहरे पर न क्रोध था, न अहंकार—केवल करुणा थी। वे मुस्कुराते हुए बोले—

“पंडित जी, घबराइए मत। जो प्रभु ने किया है, वही आगे भी करेंगे।”

 

उन्होंने अपनी चमड़ा भिगोने वाली कठौती (जिसमें पानी भरा रहता था) के पास जाकर आँखें मूँदीं और श्रद्धा से माँ गंगा का स्मरण किया। अगले ही क्षण वह कठौती दिव्य प्रकाश से भर गई।

 

सबके देखते-देखते उसी कठौती से माँ गंगा प्रकट हुईं और संत जनार्दन दास के हाथ में दूसरा सोने का कंगन रख दिया।

 

यह दृश्य देखकर पंडित जी काँपते हुए संत के चरणों में गिर पड़े। उनका अहंकार चूर-चूर हो गया।

 

तभी संत जनार्दन दास ने शांत स्वर में कहा—

 

“मन चंगा तो कठौती में गंगा।”

अर्थात्—यदि मन पवित्र है, नीयत साफ है और कर्म सच्चा है, तो तीर्थ दूर नहीं होते। ईश्वर स्वयं वहीं प्रकट हो जाते हैं, चाहे वह कठौती ही क्यों न हो।

 

🌼 व्याख्या (Explanation):

यह कथा हमें सिखाती है कि ईश्वर बाहरी आडंबर, तीर्थ-यात्रा या ऊँचे पद से नहीं मिलते। सच्ची भक्ति कर्म, निष्ठा और ईमानदारी में बसती है। संत जनार्दन दास ने अपने वचन और कर्म को पूजा माना, और उसी कारण गंगा मैया स्वयं उनके पास प्रकट हुईं। दूसरी ओर, पंडित जी के ज्ञान के बावजूद उनके भीतर का लालच उन्हें संकट में डाल देता है।

 

🌺 नैतिक शिक्षा (Moral):

यदि मन शुद्ध हो और कर्म सच्चा हो, तो ईश्वर दूर नहीं रहते—वे हमारे पास ही प्रकट हो जाते हैं। सच्ची भक्ति कर्म में है, दिखावे में नहीं।