+91 8005792734
Contact Us
Contact Us
amita2903.aa@gmail.com
Support Email
Jhunjhunu, Rajasthan
Address
🌸 “जब किशोरी जी स्वयं खीर लेकर आईं”
बरसाना धाम…
जहाँ की वायु में राधा नाम बसा है,
जहाँ की धूल में प्रेम लिपटा है,
और जहाँ भक्ति केवल पूजा नहीं, बल्कि सजीव अनुभूति बनकर प्रकट होती है।
इसी बरसाना में एक बार श्री चैतन्य महाप्रभु की परंपरा से जुड़े एक महान वैष्णव भक्त निवास करते थे। उनका नाम था भक्त हरिदास गोस्वामी। वे महाप्रभु के अनन्य सेवक थे और भक्ति के उच्चतम भाव में स्थित थे, किंतु बाह्य जीवन में वे एकदम फक्कड़ साधु थे—जैसा मिल जाए, वही खा लिया; जैसा मिल जाए, वही पहन लिया। उनके लिए देह का सुख कभी प्राथमिक नहीं रहा।
एक दिन उनके गुरु, महान रसिक संत श्री सनातन गोस्वामी, भ्रमण करते हुए बरसाना पहुँचे और अपने प्रिय शिष्य हरिदास गोस्वामी की कुटिया में आकर ठहरे। गुरु के आगमन से शिष्य का हृदय आनंद से भर गया, पर उसी क्षण एक टीस भी उठी।
हरिदास गोस्वामी सोचने लगे—
“मैं तो प्रतिदिन सूखी रोटी पानी में भिगोकर खा लेता हूँ। आज मेरे गुरु आए हैं। मैं उन्हें क्या अर्पित करूँ? मेरे पास तो कुछ भी नहीं है।”
उन्होंने अपनी छोटी-सी कुटिया में देखा। एक कोने में तीन दिन पुरानी सूखी रोटियाँ रखी थीं—इतनी कठोर कि स्वयं वे भी उन्हें पानी में गलाकर खाते थे। मन में विचार आया—
“मैं तो साधु हूँ, जैसे-तैसे खा लूँगा। पर मेरे गुरु… यद्यपि वे भी परम वैरागी हैं, फिर भी मेरा हृदय कैसे संतुष्ट होगा?”
उनके मन में एक भाव उठा—
“काश! समय होता तो किसी ब्रजवासी के घर चला जाता। थोड़ा दूध माँग लाता, चावल माँग लाता… अपने गुरु को खीर बना देता।
गुरु केवल देह-संबंध से नहीं, भाव-साम्राज्य में प्रवेश कराने वाले हैं। उन्हें खीर खिला पाता…”
इसी बीच श्री सनातन गोस्वामी ने कहा—
“हरिदास, कुछ खाने को मिलेगा? भूख लगी है।”
यह सुनते ही हरिदास गोस्वामी का हृदय काँप उठा। वे उन सूखी रोटियों को गुरु के सामने रखने लगे, पर उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।
गुरु ने पूछा—
“तू रो क्यों रहा है?”
हरिदास ने भर्राए स्वर में कहा—
“बाबा, हम साधु हैं, आप भी साधु हैं, यह मैं जानता हूँ। पर मेरा मन नहीं मान रहा। यदि पहले से सूचना होती, तो कुछ कर पाता। आज आपको सूखी रोटी दे रहा हूँ—मेरा हृदय विद्रोह कर रहा है।”
उसी समय रात्रि गहराने लगी। अचानक अर्धरात्रि में कुटिया का द्वार खटखटाया गया।
हरिदास गोस्वामी ने उठकर द्वार खोला।
बाहर एक आठ–दस वर्ष की किशोरी खड़ी थी। उसके हाथ में एक कटोरा था। मुख पर अलौकिक शांति थी।
उसने सरल स्वर में कहा—
“बाबा, मेरी माँ ने खीर बनाई है। उन्होंने कहा है—जाओ, बाबा को दे आओ।”
हरिदास गोस्वामी विस्मित रह गए। उन्होंने आदर से वह कटोरा लिया और भीतर ले जाकर अपने गुरु के सामने रख दिया।
“बाबा, कृपा करके पाओ…”
जैसे ही श्री सनातन गोस्वामी ने उस खीर को स्पर्श किया, उनका हाथ काँपने लगा। शरीर में रोमांच दौड़ गया। आँखों से आँसू बहने लगे।
हरिदास घबरा गए—
“बाबा, क्या मुझसे कोई अपराध हो गया?”
गुरु ने गंभीर स्वर में पूछा—
“हरिदास, यह खीर आधी रात को कौन लाया?”
हरिदास ने कहा—
“बाबा, पास में एक कन्या रहती है। वही लाई है। मैं उसे जानता हूँ।”
गुरु ने दृढ़ स्वर में कहा—
“नहीं हरिदास… यह साधारण कन्या नहीं है। इस खीर को स्पर्श करते ही मुझे किशोरी जी की अनुभूति हो रही है। यह वही रस है… यह वही भाव है…”
हरिदास अब भी संशय में थे। दोनों गुरु-शिष्य उस कन्या के घर पहुँचे और द्वार खटखटाया।
द्वार खुला। एक स्त्री बाहर आई।
हरिदास ने विनम्रता से पूछा—
“माता, आपकी कन्या कहाँ है?”
स्त्री आश्चर्य से बोली—
“कौन-सी कन्या बाबा? मेरी बेटी तो पंद्रह दिन से गोवर्धन में अपने ननिहाल गई हुई है।”
यह सुनते ही श्री सनातन गोस्वामी मूर्छित होकर गिर पड़े।
हरिदास गोस्वामी ने उन्हें संभाला और दोनों श्रीजी के मंदिर की ओर दौड़ पड़े। जैसे पाँव धरती को छू ही नहीं रहे थे। लंबी-लंबी सीढ़ियाँ क्षण भर में पार कर लीं।
मंदिर पहुँचकर उन्होंने गोसाईं जी से पूछा—
“बाबा, आज श्री श्यामा प्यारी को क्या भोग लगाया गया था?”
गोसाईं जी ने कहा—
“आज खीर का भोग लगाया गया था।”
श्री सनातन गोस्वामी “श्रीराधे… श्रीराधे…” कहने लगे।
फिर उन्होंने कहा—
“एक विनती है। यद्यपि यह परंपरा के विरुद्ध है, पर कृपा करके देखिए—जिस पात्र में खीर का भोग लगा था, वह वहाँ है या नहीं?”
गोसाईं जी ने मंदिर के पट खोले। देखा—
वह पात्र वहाँ नहीं था।
बाहर आकर बोले—
“बाबा, वह पात्र वहाँ नहीं है।”
तभी श्री सनातन गोस्वामी ने अपना दुपट्टा खोला। उसमें वही चाँदी का पात्र था।
गोसाईं जी ने काँपते स्वर में कहा—
“बाबा… यही तो वही पात्र है।”
तब श्री सनातन गोस्वामी बोले—
“किशोरी जी… श्री राधा रानी… तीन सौ सीढ़ियाँ उतरकर स्वयं मेरे शिष्य के भाव की रक्षा करने आईं।
वे स्वयं खीर लेकर आईं।”
उन्होंने उस खीर को अपने मुख पर लगाया, फिर साधु-संतों में बाँटते हुए “श्रीराधे श्रीराधे” का कीर्तन करने लगे।
इसके बाद कई वर्षों तक श्री सनातन गोस्वामी बरसाना में ही रहे—क्योंकि जहाँ किशोरी स्वयं चली आएँ, वहाँ से जाने का मन किसका होता है?
🌼 व्याख्या (Explanation):
यह कथा बताती है कि ईश्वर भाव के अधीन हैं, साधनों के नहीं। हरिदास गोस्वामी के पास न धन था, न सामग्री—पर उनके हृदय में गुरु के प्रति प्रेम और सेवा का सच्चा भाव था। उसी भाव ने श्री राधा रानी को स्वयं प्रकट होने पर विवश कर दिया। भक्ति में साधन नहीं, भावना प्रधान होती है।
🌺 नैतिक शिक्षा (Moral):
जहाँ भाव शुद्ध होता है, वहाँ भगवान दूरी नहीं देखते।
सच्चे प्रेम और सेवा के लिए ईश्वर स्वयं चलकर आते हैं।