+91 8005792734
Contact Us
Contact Us
amita2903.aa@gmail.com
Support Email
Jhunjhunu, Rajasthan
Address
🌿 सरलता की विजय — प्रभु का साक्षात् दर्शन 🌿
एक छोटे-से गाँव में एक साधारण-सा परिवार रहता था। उसी परिवार में एक बालक का जन्म हुआ। समय बीतता गया… बालक शैशव से किशोर हुआ, किशोर से युवा। आज वह पूरे बीस वर्ष का हो चुका था।
उसके स्वभाव में कोई कुटिलता नहीं थी, कोई छल नहीं था, कोई दुर्गुण नहीं था। वह जितना सरल था, उतना ही भोला।
बस… एक ही “कमी” थी — वह बहुत खाता था।
🍚 भोजन और उसका जीवन
जब वह खाने बैठता, तो मानो समय ठहर जाता।
थाली पर थाली बदल जाती, पर उसका हाथ रुकता नहीं।
कोई कहता —
“अरे! बीच-बीच में पानी तो पी लो!”
तो वह मुस्कुरा कर कहता —
“अरे! बीच तो आए!”
परिवार के पाँच लोग जब तक भोजन समाप्त करें, तब तक वह अब भी खाता ही रहता।
वह कहते हुए नहीं थकता था —
“दाने-दाने पर लिखा खाने वाले का नाम।”
लोग हँसते, व्यंग करते —
“अरे! तुम तो यह कहो —
बोरे-बोरे पर लिखा खानहार का नाम!”
वह चुपचाप सुन लेता। न बुरा मानता, न जवाब देता।
सरलता उसकी ढाल थी।
👥 परिवार की चिंता और महात्मा का वचन
परिवार के लोगों को चिंता होने लगी।
वे एक महात्मा के पास पहुँचे और बोले —
“महाराज! यह लड़का बहुत खाता है।”
महात्मा ने शांत स्वर में कहा —
“यह उतना ही खाता है… जितना इसका खाता है।”
यह उत्तर परिवार को समझ में नहीं आया।
क्रोध और विवशता में उन्होंने युवक से कह दिया —
“अब यहाँ से चले जाओ। काम कुछ करते नहीं, बस खाते रहते हो।”
युवक ने कोई प्रतिवाद नहीं किया।
न आँखों में आँसू, न मन में शिकायत।
वह बस चल दिया… बिना जाने कि प्रभु स्वयं उसका पथ लिख चुके हैं।
🌾 आश्रम की ओर यात्रा
मार्ग में एक आश्रम आया।
वहाँ के शिष्य हष्ट-पुष्ट थे, तेजस्वी थे।
युवक ने मन ही मन सोचा —
“यहाँ तो भोजन भरपूर मिलता होगा, और काम भी कम होगा।”
वह गुरुजी के पास पहुँचा और बोला —
“गुरुजी! मुझे अपना शिष्य बना लीजिए।”
गुरुजी ने देखा — सीधा, भोला चेहरा।
कह दिया —
“ठीक है।”
युवक ने झिझकते हुए पूछा —
“गुरुजी… भोजन का क्या प्रबंध रहता है?”
गुरुजी बोले —
“दिन में चार-पाँच बार पंगत बैठती है।”
युवक की आँखें चमक उठीं।
फिर बोला —
“अगर बुरा न मानें… तो हम सभी पंगतों में बैठ जाएँ?”
गुरुजी मन ही मन समझ गए —
“यह तो बहुत खाता है…”
फिर भी बोले —
“ठीक है, बैठ जाया करो।”
🕉️ दीक्षा और आश्रम जीवन
गुरुजी ने उसके गले में कंठी डाली,
मस्तक पर तिलक लगाया,
राम-नाम दिया।
अब उसके दिन सुख से बीतने लगे।
🌙 एकादशी की परीक्षा
एक दिन उसने देखा —
न चूल्हा जला है,
न बर्तन हिले हैं,
न रसोई में हलचल है।
वह गुरुजी के पास गया —
“गुरुजी, आज भोजन नहीं बनेगा?”
गुरुजी बोले —
“आज एकादशी है। आज उपवास है, भजन होगा।”
युवक व्याकुल हो गया —
“गुरुजी! आज भोजन नहीं मिला तो हम कल द्वादशी देख ही नहीं पाएँगे।”
गुरुजी का हृदय पसीज गया।
उन्होंने कहा —
“भंडार गृह से थोड़ा सामान ले जाओ, नदी किनारे भोजन बना लो।
पर याद रखना — बिना भगवान को भोग लगाए मत खाना।”
इतना सुनते ही वह शिष्य मानो उड़ने लगा।
मन में न कोई संशय, न कोई भय — बस भोजन की आशा और गुरु की आज्ञा।
वह खुशी-खुशी आश्रम से दाल, तेल, सब्ज़ी, चूल्हा, लकड़ियाँ — जो मिला, सब समेट लाया।
नदी के किनारे पहुँचा।
कल-कल बहती धारा,
शाम की हल्की हवा,
आकाश में ढलता सूरज —
मानो प्रकृति स्वयं उसकी साक्षी बन गई हो।
उसने चूल्हा जलाया।
लकड़ियाँ चटकने लगीं।
दाल उबलने लगी।
सब्ज़ी की खुशबू हवा में घुल गई।
पर जैसे ही भोजन तैयार हुआ और वह खाने बैठने ही वाला था,
अचानक उसे गुरुजी के शब्द याद आ गए —
“बिना भगवान को भोग लगाए मत खाना।”
वह ठिठक गया।
थाली हाथ में थी…
पर मन रुक गया।
🤲 भोग की उलझन
वह अत्यंत सीधा-सादा व्यक्ति था।
उसे शास्त्र नहीं आते थे,
विधि-विधान नहीं आते थे।
उसने मन ही मन सोचा —
“भगवान भी तो हमारे जैसे ही होंगे।
जैसे हम खाते हैं, वैसे ही वे भी खाते होंगे।”
और बस…
यहीं से शुरू हुआ वह अद्भुत संवाद,
जो केवल सरल हृदय से ही संभव था।
उसने आकाश की ओर देखकर पुकारा —
“हे प्रभु! भोजन बन गया है।
आओ, पधारो…
पहले आप भोजन करो,
फिर हम भी भोजन करेंगे।”
वह रुका…
देखा…
सुना…
पर कोई नहीं आया।
🎶 भजन की पुकार
अब उसने सोचा —
“शायद प्रभु भजन से आते हों।”
वह पूरी श्रद्धा से गाने लगा —
✨
राजा राम आइए, प्रभु राम आइए,
मेरे भोजन का भोग लगाइए।
✨
भजन समाप्त हुआ।
नदी बहती रही।
हवा चलती रही।
पर भगवान फिर भी नहीं आए।
😢 सरल शिकायत
अब उसकी सरलता बोल पड़ी।
न तर्क, न दर्शन —
सीधा हृदय, सीधी बात।
वह बोला —
“हे भगवान!
मुझे लगता है आप सोच रहे होंगे
कि यहाँ तो रूखा-सूखा बना है।
पर प्रभु, मंदिर में भी तो कुछ नहीं मिलेगा…
जान बचाकर तो हम ही यहाँ आ गए हैं।”
यह सुनकर
स्वर्ग में विराजमान प्रभु मुस्कुरा उठे।
🌸 प्रभु का प्राकट्य
उसकी इसी निष्कपट बात पर
प्रभु श्रीराम माँ सीता के साथ प्रकट हो गए।
वह शिष्य चौंक गया।
आँखें फटी की फटी रह गईं।
उसने हाथ जोड़कर पूछा —
“प्रभु! आपके साथ यह कौन हैं?”
श्रीराम बोले —
“यह मेरी धर्मपत्नी, सीता हैं।”
शिष्य मन ही मन बुदबुदाया —
“गुरुजी ने तो कहा था एक भगवान आएंगे…
यहाँ तो दो-दो आ गए!”
अब वह भगवान को देखता,
फिर भोजन को देखता।
उसने तो बस दो लोगों के लिए बनाया था —
एक अपने लिए,
एक भगवान के लिए।
फिर भी बोला —
“आप पधार ही गए हैं तो भोजन ग्रहण कीजिए।”
भगवान ने प्रेमपूर्वक भोजन किया
और फिर…
अंतरध्यान हो गए।
🍽️ हर एकादशी, बढ़ता हुआ परिवार
अगली एकादशी आई।
शिष्य गुरुजी के पास पहुँचा —
“गुरुजी! वहाँ दो भगवान आते हैं।”
गुरुजी ने सोचा —
“भूख से भ्रम हो गया होगा।”
शिष्य फिर भोजन लेकर गया।
इस बार तीन लोगों के लिए बनाया।
भजन किया —
राम आए…
सीता आईं…
और इस बार लक्ष्मण भी साथ आए।
लक्ष्मण को देखकर वह सिर पकड़कर बैठ गया —
“अरे! अब तो तीन हो गए!”
उसने पूछा —
“प्रभु, यह कौन हैं?”
राम बोले —
“मेरे छोटे भाई।”
शिष्य बोला —
“प्रभु! एक बात बताओ —
हमने ठाकुरजी का ठेका लिया है
या पूरे ठाकुरजी खानदान का?”
प्रभु मंद-मंद मुस्कुराए।
लक्ष्मण जी भी मन ही मन सोचने लगे —
“कैसा स्वागत है!”
फिर सबने भोजन किया
और शिष्य फिर भूखा ही रह गया।
🐒 हनुमान जी का आगमन
पुनः वह शिष्य आश्रम लौटा।
एकादशी का दिन था।
वह सीधे गुरुजी के पास पहुँचा।
चेहरे पर वही सरल भाव, आँखों में वही सच्चाई।
विनम्र स्वर में बोला—
“गुरुजी, वहाँ अब तीन भगवान आने लगे हैं।
कृपा करके इस बार भोजन सामग्री कुछ और बढ़ा दीजिए।”
गुरुजी ने शिष्य की ओर देखा।
न संदेह, न प्रश्न—
बस इतना कहा—
“ठीक है, ले जाओ।”
शिष्य चल पड़ा।
इस बार उसने चार लोगों के लिए भोजन बनाया।
नदी किनारे वही चूल्हा, वही लकड़ियाँ, वही शांति।
पर मन में अब आदर और भी बढ़ गया था।
भोजन बनाकर उसने हाथ जोड़कर, पूरी श्रद्धा से पुकारा—
✨
राजा राम आइए,
सीता राम आइए,
मेरे प्रेम भरे भोजन का
भोग लगाइए।
✨
क्षण भर में प्रभु प्रकट हुए—
माँ सीता साथ थीं,
लक्ष्मण जी साथ थे,
और इस बार हनुमान जी भी साथ थे।
जैसे ही शिष्य की दृष्टि हनुमान जी पर पड़ी,
वह चकित हो उठा और भोलेपन से बोल पड़ा—
“हे प्रभु!
इस बार तो आप एक बंदर भी साथ लाए हो!”
प्रभु श्रीराम मंद-मंद मुस्कुराए।
उस मुस्कान में न कोई आहत भाव था,
न कोई अहं—
बस करुणा और अपनापन।
शिष्य ने सबको प्रेमपूर्वक भोजन परोसा।
सीता जी का वात्सल्य,
लक्ष्मण जी की मर्यादा,
हनुमान जी की सेवा-भावना—
सब उस क्षण में जीवंत थे।
सबने भोजन किया…
और फिर,
धीरे-धीरे
सब अंतरध्यान हो गए।
उस दिन भी शिष्य की एकादशी पूरी हुई—
और वह फिर स्वयं भूखा ही रह गया।
पर उसके मन में कोई पीड़ा नहीं थी।
केवल संतोष था—
कि प्रभु आए थे।
🌙 संदेह की रेखा
अगली एकादशी फिर आई।
शिष्य आश्रम पहुँचा और बोला—
“गुरुजी, अब तो वहाँ बहुत सारे भगवान आने लगे हैं।
पहले एक आए, फिर दो, फिर तीन…
कृपा कर भोजन सामग्री और बढ़ा दीजिए।”
इस बार गुरुजी के मन में हलचल हुई।
उन्होंने सोचा—
“इतना भोजन यह खा नहीं सकता…
कहीं बेच तो नहीं देता?”
निश्चय किया—
आज पीछे-पीछे चलकर देखेंगे।
🌳 जहाँ भोजन नहीं, केवल भक्ति थी
शिष्य इस बार सजग था।
उसने भोजन बनाया ही नहीं।
न दाल, न सब्ज़ी, न चूल्हा।
वह बस नदी किनारे बैठ गया
और पूरे भाव से पुकारने लगा—
✨
राजा राम आइए, प्रभु राम आइए,
मेरे हृदय के भाव का भोग लगाइए।
✨
और तभी—
पूरा राम दरबार उपस्थित हो गया।
श्रीराम,
माँ सीता,
लक्ष्मण जी,
हनुमान जी,
और साथ में अयोध्या की दिव्य छवि—
मानो धरती स्वर्ग बन गई हो।
इतने सारे भगवान देखकर
शिष्य अवाक रह गया।
वह पास के एक पेड़ के नीचे बैठ गया।
प्रभु ने स्नेह से पूछा—
“आज भोजन क्यों नहीं बनाया?”
शिष्य ने वही सरल उत्तर दिया—
“बनाकर क्या करेंगे प्रभु?
जब हमें तो मिलना ही नहीं है।
आप ही बना लो…
आप ही खा लो।”
प्रभु श्रीराम फिर मुस्कुराए।
वह मुस्कान
संसार के सारे तर्कों पर भारी थी।
🌼 भगवान सेवा में उतर आए
प्रभु ने सबको कार्य सौंप दिए।
माँ सीता स्वयं चूल्हा जलाने लगीं।
लक्ष्मण जी लकड़ियाँ बीनने चले गए।
हनुमान जी दौड़-दौड़कर सेवा करने लगे।
भगवान स्वयं रसोई में उतर आए।
🌺 गुरु का आगमन और रहस्य का उद्घाटन
तभी गुरुजी वहाँ पहुँचे।
उन्होंने देखा—
भोजन सामग्री ज्यों की त्यों रखी है।
न चूल्हा जला है,
न बर्तन हिले हैं।
शिष्य आँखें मूँदे बैठा था।
गुरुजी बोले—
“यहाँ तो कुछ नहीं है।”
शिष्य ने आँखें खोलीं और उत्साह से बोला—
“गुरुजी! देखो, कितने भगवान हैं!”
गुरुजी बोले—
“मुझे तो कोई नहीं दिख रहा।”
शिष्य घबरा गया—
“अब तो और परेशानी बढ़ गई।
हमें सब दिख रहे हैं,
आपको कुछ भी नहीं!”
वह प्रभु से बोला—
“प्रभुजी, मेरे गुरुदेव को दर्शन दीजिए।
आप उन्हें क्यों नहीं दिख रहे?”
प्रभु श्रीराम का स्वर करुण हो उठा—
“तुम सरल हो,
इसलिए मैं तुम्हें दिखता हूँ।”
शिष्य बोला—
“पर वे मेरे गुरु हैं,
मुझसे कहीं अधिक ज्ञानवान हैं।”
प्रभु बोले—
“ज्ञान बड़ा हो सकता है,
पर सरलता सबसे बड़ी होती है।
मैं सरल के लिए सदा सुलभ हूँ।”
शिष्य के आग्रह पर
प्रभु श्रीराम परिवार सहित गुरुजी को दर्शन दिए।
गुरुजी के नेत्रों से अश्रुधारा बह चली।
उनका अहं पिघल गया।
हृदय भर आया।
🌸 कथा का अमृत सार
न धन का बल, न विद्या का भार—
सरल हृदय में बसता है राम दरबार।
जहाँ गणना नहीं, केवल प्रेम हो,
वहीं प्रभु साक्षात् विराजमान हों।
तो दोस्तों,
आप कितने ही ज्ञानवान क्यों न हों,
कितने ही धनवान क्यों न हों—
यदि आपके भीतर सरलता और सहजता नहीं,
तो भगवान दूर ही रह जाते हैं।
🌼 जीवन में सरल बनिए,
क्योंकि प्रभु वहीं उतरते हैं
जहाँ हृदय निष्कपट होता है।