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🍀जहाँ नारायण विराजते हैं, वहाँ लक्ष्मी स्वयं चली आती हैं🍀
यह कथा केवल राजा बलि की नहीं, दान, समर्पण और परोपकार के उस शाश्वत सत्य की है, जहाँ भगवान स्वयं भक्त के द्वारपाल बन जाते हैं और लक्ष्मी को भी चलकर आना पड़ता है।
प्रह्लाद के पौत्र, असुरराज राजा बलि, सत्य, दान और धर्म के प्रतीक थे। उनके यज्ञों की कीर्ति तीनों लोकों में फैल चुकी थी। बलि का जीवन वैभव से भरा था, पर उससे भी अधिक समृद्ध था उनका हृदय—दान देने की प्रवृत्ति से। वे याचक को खाली हाथ नहीं लौटाते थे, चाहे सामने साक्षात् देवता ही क्यों न हों।
एक दिन राजा बलि भव्य यज्ञ कर रहे थे। अग्निकुंड प्रज्वलित था, वेद मंत्र गूँज रहे थे, और उसी समय यज्ञशाला के द्वार पर एक तेजस्वी ब्रह्मचारी प्रकट हुए। छोटे कद, कमंडलु, मृगचर्म, शांत मुख—वह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं थे, वे स्वयं नारायण थे, वामन रूप में।
राजा बलि ने उन्हें देखा और आदर सहित कहा—
“हे ब्राह्मण देव! मेरे द्वार पर आए हो, मनचाहा दान माँगो,
आज यज्ञ की पूर्णाहुति से पहले कोई भी याचक निराश न जाएगा।”
वामन ने अत्यंत विनय से उत्तर दिया—
“राजन! मुझे अधिक कुछ नहीं चाहिए,
बस तीन पग भूमि दान में दे दीजिए।”
गुरु शुक्राचार्य ने संकेत से सावधान किया, पर बलि का संकल्प अडिग था। उन्होंने जल लेकर दान का संकल्प किया। उसी क्षण वामन का रूप विराट हो गया। एक चरण में उन्होंने पाताल से लेकर पृथ्वी तक नाप लिया, दूसरे चरण में स्वर्ग और आकाश सहित समस्त लोक। अब तीसरे चरण के लिए कोई स्थान शेष न रहा।
तब वामन ने कहा—
“राजा बलि! अब मेरे तीसरे चरण के लिए स्थान बताओ।”
राजा बलि ने बिना किसी भय या अहंकार के अपने मस्तक को आगे कर दिया और कहा—
“हे प्रभु! यह सिर आपका है,
दान अधूरा न रहे—यहाँ अपना चरण रखिए।”
वामन ने तीसरा चरण राजा बलि के मस्तक पर रखा। इस क्षण में बलि का अहंकार नहीं टूटा, बल्कि पूर्ण समर्पण प्रकट हुआ। भगवान इस भाव से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा—
“राजा बलि! तुम्हारा दान अमर होगा।
आने वाले समय में दान की इस परंपरा को ‘बलिदान’ के नाम से जाना जाएगा।
तुम अगले मन्वंतर में इंद्र बनोगे,
पर तब तक सुतल लोक में वास करोगे—और मैं स्वयं तुम्हारा द्वारपाल बनूँगा।”
बलि ने विनम्रता से कहा—
“प्रभु! मैंने आपको सब कुछ दान कर दिया है,
अब दान दी हुई वस्तु मैं कैसे माँगूँ?
यदि देना ही है, तो मुझे आप ही चाहिए।”
नारायण मुस्कुराए और बलि को लेकर सुतल लोक चले गए, जहाँ वे सचमुच द्वारपाल बनकर रहने लगे।
उधर, देवर्षि नारद यह लीला माता लक्ष्मी को सुनाने पहुँचे और रहस्यमय स्वर में बोले—
“हे माता! अब आपको वैकुंठ में अकेले रहना होगा,
क्योंकि आपके स्वामी अब राजा बलि के द्वारपाल बन चुके हैं।”
माता लक्ष्मी ने कारण पूछा। नारद ने संकेत दिया—राजा बलि की कोई बहन नहीं है। माता लक्ष्मी संकेत समझ गईं।
उन्होंने एक साधारण स्त्री का रूप धारण किया और सुतल लोक पहुँच गईं। राजा बलि ने उन्हें देखा और कहा—
“माता! मेरे द्वार पर आई हो, निःसंकोच बताओ—तुम्हें क्या चाहिए?”
माता लक्ष्मी ने करुण स्वर में कहा—
“मेरा कोई भाई नहीं है,
त्योहारों में मायके जाने की इच्छा होती है,
पर जाऊँ तो कहाँ?”
राजा बलि का हृदय द्रवित हो गया। उन्होंने कहा—
“आज से तुम मेरी बहन हो।”
माता लक्ष्मी ने बलि की कलाई पर रक्षासूत्र बाँधा। बलि ने बहन को कुछ माँगने को कहा। तब लक्ष्मी बोलीं—
“भैया! मेरे पास किसी बात की कमी नहीं,
बस आपके द्वार पर खड़े इस द्वारपाल को मुक्त कर दीजिए।”
बलि ने आश्चर्य से पूछा—
“बहन! इस द्वारपाल से तुम्हारा क्या संबंध है?”
तभी लक्ष्मी-नारायण अपने चतुर्भुज स्वरूप में प्रकट हो गए। राजा बलि यह देखकर भावविभोर हो उठा और क्षमा माँगने लगा। माता लक्ष्मी ने कहा—
“राजन! इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं,
मैं तो अपने स्वामी को लेने आई थी।”
फिर लक्ष्मी अपने पति नारायण को मुक्त कराकर वैकुंठ ले गईं।
इस लीला से एक गहरा आध्यात्मिक सत्य प्रकट होता है—
जहाँ नारायण होते हैं, वहाँ लक्ष्मी को आना ही पड़ता है।
दान, परोपकार, सत्य और करुणा—ये नारायण के गुण हैं। जहाँ ये गुण निवास करते हैं, वहाँ सुख-समृद्धि स्वयं चलकर आती है।
जहाँ दान का दीप जले, वहाँ अंधकार टिक न पाए,
जहाँ नारायण की सेवा हो, लक्ष्मी बिना बुलाए आए।
🌼 संदेश🌼
दान, परोपकार और निष्कपट सेवा ही जीवन की सच्ची पूँजी हैं। लक्ष्मी केवल धन नहीं, संतोष और सौभाग्य का स्वरूप हैं। वे उसी के पास टिकती हैं, जहाँ नारायण—अर्थात् धर्म, सेवा और करुणा—निवास करते हैं। दान सदैव नेक कमाई से हो, संतोष और सादगी के साथ हो। जो निरंतर सत्कर्म करता है, वही वास्तव में लक्ष्मी-नारायण को प्राप्त करता है।
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