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🌺अर्पण का कवच — जब प्रसाद ने विष को हराया🌺

 

✦ प्रस्तावना ✦

शास्त्र कहते हैं—

अन्न केवल अन्न नहीं होता।

जिस भाव से वह बनाया जाता है,

जिस उद्देश्य से वह खाया जाता है,

वही उसका वास्तविक स्वरूप बन जाता है।

 

अन्न बने तो भोग बने,

भोग बने तो प्राण बचे।

जो प्रभु को अर्पित न हुआ,

वह पेट भरे—पर भाग्य न सजे।

 

यह कथा उसी अन्न की है,

जो पहले विष था

और अर्पण के बाद अमृत बन गया।

 

✦ प्रारंभ : नास्तिक राजपुरुष ✦

एक समृद्ध राज्य था।

राजमहल ऊँचे थे, कोष भरे थे, सेनाएँ शक्तिशाली थीं।

पर उस वैभव के बीच भक्ति का स्वर बहुत धीमा था।

 

उसी राज्य में रहते थे

राजा के छोटे भाई—राजवीर सिंह।

वीर, बुद्धिमान, रणकुशल।

परंतु संतों से दूर,

और ईश्वर से भी।

 

उनका मानना था—

जो दिखे वही सत्य है,

जो तर्क में न आए, वह भ्रम है।

 

✦ भक्त पत्नी का आगमन ✦

राजवीर सिंह का विवाह हुआ

साध्वी स्वभाव की कमला देवी से।

 

कमला देवी का मायका

संतों की सेवा से सुवासित था।

वहाँ हर दिन

भोग लगता,

प्रसाद बँटता,

और नाम गूँजता।

 

पर जब वे ससुराल आईं,

तो उनका मन सूना रह गया।

 

महल बड़े, पर मंदिर सूना,

थाली भरी, पर भाव अधूरा।

धन बहुत, पर नाम नहीं,

दीप जले, पर राम नहीं।

 

कमला देवी व्याकुल हो उठीं,

पर उन्होंने कभी पति का विरोध नहीं किया।

वे जानती थीं—

भक्ति दबाव से नहीं,

कृपा से जागती है।

 

✦ गुरुदेव का आगमन और अपमान ✦

कई दिनों बाद

कमला देवी ने मायके संदेश भेजा।

गुरुदेव को बुलाया गया।

 

गुरुदेव आए।

कमला देवी ने चरणामृत लिया,

भोग अर्पित किया,

सेवा में लीन हो गईं।

 

उसी समय राजवीर सिंह वहाँ पहुँचे।

पत्नी को संत के चरणों में देखकर

उनका अहं जाग उठा।

 

कटु शब्द बोले गए।

संत का तिरस्कार हुआ।

 

गुरुदेव ने कुछ नहीं कहा।

केवल दृष्टि से कमला देवी को धैर्य दिया

और वहाँ से चले गए।

 

✦ पत्नी का संकल्प ✦

उस दिन कमला देवी ने मौन व्रत लिया।

 

जिस घर में गुरु अपमानित हों,

उस घर का अन्न न लूँगी।

न जल, न अन्न, न सुख-स्पर्श,

जब तक क्षमा न दिलवाऊँगी।

 

दिन बीतते गए।

कमला देवी दुर्बल होने लगीं।

राजवीर सिंह का हृदय काँप उठा।

 

अंततः वे गुरुदेव के पास पहुँचे।

अहंकार टूटा।

चरणों में गिरे।

क्षमा माँगी।

 

गुरुदेव लौटे।

 

✦ भक्ति का उदय ✦

उस दिन से राजवीर सिंह बदल गए।

 

अब बिना भोग

वे जल भी नहीं पीते थे।

संत जहाँ दिखें,

आमंत्रण भेजा जाता।

 

अन्न पहले ठाकुर का होता,

फिर उनका।

 

पहले अर्पण, फिर ग्रहण,

यही जीवन का सच्चा चरण।

 

✦ युद्ध और हीरा ✦

एक युद्ध में

राजवीर सिंह विजयी हुए।

विजय-चिह्न स्वरूप

एक मुकुट मिला—

जिसमें जड़ा था

अत्यंत दुर्लभ हीरा।

 

उन्होंने कहा—

यह हीरा जगन्नाथ जी के मुकुट में जड़ेगा।

 

दरबारियों की आँखें जल उठीं।

राजा का मन डगमगाया।

 

✦ षड्यंत्र ✦

राजा सीधे हाथ नहीं उठा सकता था।

इसलिए षड्यंत्र रचा गया।

 

राजवीर सिंह की बहन

राजमहल की रसोई संभालती थी।

उसे धन का लालच दिया गया।

 

भोजन में विष मिला दिया गया।

 

✦ प्रसाद की परीक्षा ✦

राजवीर सिंह ने

भोजन पहले ठाकुर जी को अर्पित किया।

 

भोजन के समय

उन्होंने भांजी को नहीं देखा।

 

उन्होंने कहा—

जब तक वह नहीं आएगी,

भोजन नहीं होगा।

 

बहन का हृदय फट गया।

सत्य बाहर आ गया।

 

लोभ हारा, ममता जीती,

आँसू बोले, वाणी रीती।

 

✦ अर्पण की विजय ✦

राजवीर सिंह शांत रहे।

उन्होंने कहा—

यह भोजन अब मेरा नहीं,

यह मेरे प्रभु का प्रसाद है।

 

उन्होंने पूरा भोजन ग्रहण किया।

एक कण भी नहीं छोड़ा।

 

✦ चमत्कार ✦

जो अन्न चरणों में चढ़ जाए,

वह विष कहाँ रह पाता है?

जिसे प्रभु ने अपना माना,

उसे मृत्यु छू कहाँ पाती है?

 

विष निष्फल हो गया।

भक्ति विजयी हुई।

 

🌼 नीति (Moral)🌼

• अर्पण अन्न को प्रसाद बनाता है

• प्रसाद बुद्धि को शुद्ध करता है

• शुद्ध बुद्धि संकट से रक्षा करती है

• जहाँ प्रभु हैं, वहाँ विष भी अमृत बन जाता है

 

🙏

पहले अर्पण — फिर ग्रहण

यही इस कथा का सार है।