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🌺 खाली हाथों की सम्पदा
भर्तृहरि और भक्ति की पराकाष्ठा की अमर कथा 🌺
✨ प्रस्तावना
जब संसार सुख-सुविधाओं की गिनती से तृप्ति मापता है, तब कुछ विरले साधक ऐसे होते हैं जो त्याग को ही अपनी सबसे बड़ी पूँजी मानते हैं।
यह कथा है ऐसे ही एक विरक्त, अनन्य भक्त भर्तृहरि की—जिसके पास देने के लिए कुछ नहीं था, फिर भी उसने सब कुछ दे दिया।
जिसके पास कुछ न हो, वही सब दे पाता है,
जो स्वयं भूखा हो, वही भूख का मोल जान पाता है।
🕉️ कथा
श्मशान की निस्तब्धता में रात उतर रही थी।
अधजली लकड़ियों से उठते अंगारों पर एक साधु चुपचाप रोटियाँ सेंक रहा था।
न घर, न परिवार, न संग्रह—
केवल एक कमण्डल, एक लंगोटी और भीतर अग्नि-सी जलती करुणा।
यह साधु थे राजा से योगी बने भर्तृहरि।
इसी दृश्य को देख जगत-जननी माँ पार्वती का हृदय द्रवित हो उठा।
वे व्याकुल होकर ओघड़दानी महादेव के पास पहुँचीं—
“प्रभु! यह कैसा न्याय है?
आपके अनन्य भक्त श्मशान में चिता के अंगारों पर रोटियाँ सेंककर भूख मिटा रहे हैं
और आप मौन साक्षी बने हैं?”
महादेव मंद मुस्कान के साथ बोले—
“देवि! ऐसे भक्तों के लिए मेरा द्वार सदा खुला है,
पर वे स्वयं कुछ माँगना जानते ही नहीं।
उन्हें देने जाओ तो भी स्वीकार नहीं करते।
बताओ, मैं क्या करूँ?”
माँ भवानी को विश्वास न हुआ।
उन्होंने स्वयं परीक्षा लेने का निश्चय किया।
🌾 परीक्षा का क्षण
भिखारिन का वेश धारण कर माँ पार्वती श्मशान पहुँचीं।
काँपती आवाज़ में बोलीं—
“बेटा… कई दिन से भूखी हूँ।
क्या कुछ खाने को मिलेगा?”
भर्तृहरि ने बिना क्षण भर सोचे,
चार में से दो रोटियाँ उनके हाथ में रख दीं।
भिखारिन बोली—
“बेटा, मेरे घर में एक बूढ़ा पति भी है…
उसने भी कई दिनों से कुछ नहीं खाया।”
भर्तृहरि ने शेष दो रोटियाँ भी दे दीं।
न कोई पश्चाताप,
न कोई चिंता—
केवल संतोष।
उन्होंने कमण्डल से जल पिया,
हृदय में शांति भरी और उठकर चल पड़े।
तभी दिव्य स्वर गूँजा—
“वत्स! कहाँ जा रहे हो?”
पीछे मुड़ते ही
जगदम्बा अपने दिव्य स्वरूप में प्रकट हुईं।
🌸 वरदान और वैराग्य
माँ बोलीं—
“तुम्हारी साधना और करुणा से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ।
जो चाहो, वर माँगो।”
भर्तृहरि ने विनम्रता से कहा—
“माता!
जो स्वयं भिक्षा माँगकर पेट भरता हो,
उससे मैं क्या माँगूँ?”
माँ ने मुस्कराकर कहा—
“मैं सर्वशक्तिमती हूँ।”
तब भर्तृहरि ने चरणों में शीश नवाया—
“यदि प्रसन्न हैं तो यही वर दें—
कि जो कुछ मुझे मिले,
वह दीन-दुःखियों में बँटता रहे
और अभाव में भी मेरा मन डगमगाए नहीं।”
माँ भवानी ने कहा—
“एवमस्तु।”
🔱 शिव का उपदेश
सब देख रहे थे त्रिकालदर्शी महादेव।
वे मंद हँसी के साथ बोले—
“भद्रे!
मेरे भक्त इसलिए दरिद्र नहीं होते कि उन्हें मिलता नहीं—
बल्कि इसलिए कि
भक्ति के साथ जुड़ी उदारता
उन्हें बार-बार सब कुछ लुटा देने को विवश कर देती है।
वे खाली हाथ होकर भी
राजाओं से अधिक सम्पन्न
और संसारियों से अधिक संतुष्ट होते हैं।”
जिसके पास भक्ति हो, वह कभी निर्धन नहीं,
जिसका मन भरा हो, उसका हाथ खाली नहीं।
🌼 कथा का भावार्थ (Explanation)
यह कथा केवल दान की नहीं,
आसक्ति-त्याग की है।
भर्तृहरि ने यह सिद्ध किया कि—
यहाँ भूख केवल पेट की नहीं थी,
यह इच्छाओं की भूख की परीक्षा थी—
जिसमें भर्तृहरि पूर्णतः विजयी हुए।
🪔 नीति / Moral
🌱 सच्ची सम्पन्नता वस्तुओं में नहीं, संतोष में है।
🌱 दान वही महान है, जो स्वयं अभाव में रहकर किया जाए।
🌱 भक्ति जब करुणा से जुड़ती है, तब वह ईश्वर से भी बड़ा रूप ले लेती है।
जो दे सके बिना सोचे, वही साधक कहलाता है,
जो भूख में भी मुस्कुराए, वही वास्तव में सम्राट है।