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🌸 जब भक्ति ने मज़हब की दीवारें तोड़ दीं 🌸

करौली के मदनमोहन और भक्त ताज ख़ाँ की अमर कथा

 

✨ प्रस्तावना

भक्ति न जाति देखती है,

न धर्म, न वेष।

जहाँ प्रेम शुद्ध हो,

वहीं ईश्वर स्वयं चलकर आते हैं।

 

राजस्थान की पावन धरा पर बसा करौली नगर,

जहाँ विराजमान हैं

मदनमोहन—करुणानिधान श्रीकृष्ण।

यह कथा उसी करौली की है,

जहाँ एक मुसलमान का हृदय

कृष्ण-कृपा से वृन्दावन बन गया।

 

न पूछा नाम, न मज़हब जाना,

जहाँ आँसू गिरे, वहीं कृष्ण पहचाना।

 

🕉️ कथा

करौली नगर में

मदनमोहन जी का एक प्राचीन और अलौकिक मंदिर है।

नगर का कण-कण

कृष्ण-भक्ति से सुवासित है।

 

उसी नगर में रहता था

ताज ख़ाँ—

कचहरी में एक साधारण चपरासी।

धर्म से मुसलमान,

पर हृदय से खोजी।

 

एक दिन

कचहरी के काम से

ताज ख़ाँ को

मदनमोहन मंदिर के

पुजारी गोस्वामी जी के पास भेजा गया।

 

ताज ख़ाँ

मंदिर के भीतर जाने का साहस न कर सका।

वह बाहर खड़ा रहकर

गोस्वामी जी को आवाज़ देने लगा।

 

उसी क्षण—

उसकी दृष्टि

मंदिर के गर्भगृह में विराजमान

मदनमोहन जी के मुखमंडल पर पड़ गई।

 

बस…

क्षण भर में

सब कुछ बदल गया।

 

एक झलक में ही बँध गया मन,

न जाने कब लुट गया जीवन।

 

उसके नेत्र

पलक झपकना भूल गए।

हृदय में

एक अनजानी तड़प,

एक मीठा सा दर्द भर गया।

 

गोस्वामी जी के आने से

उसका ध्यान टूटा।

वह संदेश देकर

चला तो गया,

पर मन वहीं छूट गया।

 

🌿 विरह की पीड़ा

उस दिन के बाद

ताज ख़ाँ का जीवन बदल गया।

हर पल

मदनमोहन का चेहरा

आँखों के सामने रहने लगा।

 

मुसलमान होने के कारण

वह मंदिर में प्रवेश से डरता,

पर बाहर से

चोरी-चोरी दर्शन करता रहता।

 

धीरे-धीरे

गोस्वामी जी को

इस बात की शंका हो गई।

उन्होंने ताज ख़ाँ को

मंदिर आने से मना कर दिया।

 

एक दिन

जब ताज ख़ाँ फिर भी आया,

तो मंदिर के एक कार्यकर्ता ने

उसे धक्का देकर भगा दिया।

 

वह क्षण

ताज ख़ाँ के लिए

तलवार से भी तीखा था।

 

न मंदिर मिला, न मोहन,

रो पड़ा टूटा हुआ जीवन।

 

🌧️ भक्त का रोदन

उस दिन से

ताज ख़ाँ ने

भोजन-पानी त्याग दिया।

वह एकांत में बैठकर

बस रोता और पुकारता—

 

“मदनमोहन…

यदि मेरे दर्शन अपराध हैं,

तो मुझे जीवन भी नहीं चाहिए।”

 

कहते हैं—

जब भक्त सच्चे मन से रोता है,

तो भगवान का हृदय भी काँप उठता है।

 

🌙 रात्रि की लीला

मंदिर की परंपरा थी—

रात्रि आरती के बाद

भगवान के सामने

प्रसाद का थाल रखकर

मंदिर बंद कर दिया जाता।

 

उस रात

मंदिर बंद हुआ…

पर लीला खुल गई।

 

मदनमोहन स्वयं

मंदिर के कार्यकर्ता का रूप धरकर

प्रसाद का थाल उठाए

ताज ख़ाँ के घर पहुँच गए।

 

दरवाज़ा खटखटाया।

 

ताज ख़ाँ ने द्वार खोला।

भगवान बोले—

 

“गोस्वामी जी ने

तुम्हारे लिए प्रसाद भेजा है।

इसे ग्रहण करो

और सुबह थाल लेकर

मेरे दर्शन को आना।”

 

ताज ख़ाँ स्तब्ध रह गया।

पर भीतर से आवाज़ आई—

यह झूठ नहीं हो सकता।

 

उसने आँसुओं के साथ

प्रसाद ग्रहण किया।

 

आज भूख नहीं, भक्ति तृप्त हुई,

आज रोटी नहीं, कृपा मिली।

 

भगवान अदृश्य हो गए।

 

🌅 स्वप्न और सत्य

उसी रात

गोस्वामी जी को

स्वप्न में मदनमोहन ने दर्शन दिए—

 

“मैं प्रसाद का थाल

ताज ख़ाँ के घर छोड़ आया हूँ।

प्रातः जब वह आए,

तो उसे मेरे दर्शन से मत रोकना।”

 

सुबह उठकर

गोस्वामी जी ने देखा—

प्रसाद का थाल सचमुच गायब था।

 

वे दौड़कर

महाराज के पास पहुँचे।

सबको लेकर

मंदिर लौट आए।

 

🌼 भक्ति की विजय

संध्या पूजा के समय

ताज ख़ाँ आया—

हाथ में वही प्रसाद का थाल।

 

सभा स्तब्ध रह गई।

 

महाराज आगे बढ़े

और ताज ख़ाँ को

हृदय से लगा लिया।

 

जयकार गूँज उठी—

 

“भक्त ताज ख़ाँ की जय!”

“मदनमोहन की जय!”

 

जहाँ प्रेम सच्चा होता है,

वहाँ भगवान स्वयं साक्षी होते हैं।

 

🌸 आज भी…

आज भी

करौली के मदनमोहन मंदिर में

संध्या आरती के समय

भक्त ताज ख़ाँ को

इस दोहे के साथ स्मरण किया जाता है—

 

“ताज भक्त मुसलिम पै प्रभु तुम दया करी।

भोजन लै घर पहुंचे दीनदयाल हरी॥”

 

🌼 भावार्थ (Explanation)

यह कथा सिखाती है कि—

  • ईश्वर धर्म नहीं, हृदय देखते हैं
  • सच्ची भक्ति में
    नियम भी झुक जाते हैं
  • जब समाज दरवाज़ा बंद करे,
    तब भगवान स्वयं द्वार खोलते हैं

 

ताज ख़ाँ की भक्ति

न किसी ग्रंथ की थी,

न किसी विधि की—

वह केवल प्रेम था।

 

🪔 नीति / Moral

🌱 भक्ति की कोई सीमा नहीं होती।

🌱 ईश्वर के लिए सभी समान हैं।

🌱 जहाँ सच्चा प्रेम है,

वहीं भगवान स्वयं चलकर आते हैं।

 

न हिन्दू, न मुसलमान,

जो रोया, वही भगवान का जान।