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🌾 शीर्षक: नमक जैसा प्रेम
जो दिखाई नहीं देता, पर जीवन का स्वाद बन जाता है
🌸 कथा
बहुत समय पहले की बात है। एक विशाल, समृद्ध और सुव्यवस्थित राज्य था। उस राज्य के राजा केवल प्रतापी ही नहीं, बल्कि दूरदर्शी और संवेदनशील भी थे। उनकी प्रजा उन्हें आदर से देखती थी, क्योंकि वे न्यायप्रिय थे और राज्य को परिवार की तरह मानते थे।
राजा की तीन पुत्रियाँ थीं—तीनों रूपवती, बुद्धिमती और संस्कारों से परिपूर्ण। पर राजा का प्रेम केवल उनकी सुंदरता या राजसी वैभव तक सीमित नहीं था। वे चाहते थे कि उनकी बेटियाँ जीवन को केवल सोने-चाँदी और ऐश्वर्य से न आँकें, बल्कि जीवन की सच्ची विद्या, विवेक और संबंधों की गहराई को भी समझें।
इसी उद्देश्य से राजा ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया।
तीनों राजकुमारियों को उन्होंने एक प्रसिद्ध गुरुकुल भेजा—जहाँ जीवन को जिया जाता था, केवल पढ़ा नहीं।
गुरुकुल का जीवन राजमहल से बिल्कुल भिन्न था।
न रेशमी वस्त्र,
न स्वर्ण जड़ित पलंग,
न सेवकों की कतारें।
पर वहाँ था—
वर्षों की सुविधा छोड़कर, तीनों राजकुमारियाँ मिट्टी के फर्श पर बैठकर वेद-विद्या, नीति, धर्म, व्यवहार और आत्मबोध सीखने लगीं।
“सादा जीवन, उच्च विचार —
यही गुरुकुल का सार।”
दो वर्षों तक उन्होंने न थककर अध्ययन किया। वे केवल शास्त्र नहीं पढ़ रहीं थीं,
वे धैर्य, मौन, करुणा और विनम्रता भी सीख रही थीं।
🎉 राजमहल में उत्सव
जब दो वर्ष पूर्ण हुए और तीनों राजकुमारियाँ गुरुकुल से लौटीं,
तो पूरा राज्य उल्लास से भर उठा।
ढोल-नगाड़ों की गूँज,
फूलों की वर्षा,
और प्रजा की आँखों में गर्व।
राजा का हृदय आनंद से छलक रहा था।
उन्होंने एक भव्य दरबार और भोज का आयोजन किया।
भोज के पश्चात राजा ने महामंत्री से कहा—
“महामंत्री जी, कोई ऐसा प्रश्न पूछिए, जिससे यह पता चले कि मेरी पुत्रियों ने केवल ज्ञान ही नहीं, बल्कि जीवन को कितना समझा है।”
👑 प्रश्न और उत्तर
महामंत्री ने एक ही प्रश्न तीनों से पूछा—
“राजकुमारी जी, आप अपने पिताजी से कितना प्रेम करती हैं?”
🌞 पहली राजकुमारी बोली—
“मैं अपने पिताजी से उतना प्रेम करती हूँ, जितना सूर्य धरती से करता है।
जो प्रतिदिन प्रकाश देता है और जीवन को संभव बनाता है।”
सभा तालियों से गूँज उठी।
🌿 दूसरी राजकुमारी ने कहा—
“मैं अपने पिताजी से उतना प्रेम करती हूँ, जितना एक राजा अपनी प्रजा से करता है—
संरक्षक, पालनकर्ता और मार्गदर्शक के रूप में।”
सभा ने फिर प्रशंसा की।
अब सबकी निगाहें तीसरी राजकुमारी पर थीं।
🧂 तीसरी राजकुमारी ने शांत स्वर में कहा—
“मैं अपने पिताजी से उतना ही प्रेम करती हूँ,
जितना लोग अपने भोजन में नमक से करते हैं।”
सभा में सन्नाटा छा गया।
कुछ लोग हँस दिए।
कुछ ने इसे साधारण समझा।
राजा का हृदय आहत हो गया।
उन्हें लगा—
इतना सादा, इतना छोटा उत्तर?
क्या यही गुरुकुल की शिक्षा है?
क्रोध और पीड़ा में उन्होंने आदेश दिया—
“इसे फिर से गुरुकुल भेज दिया जाए। इसकी विद्या अभी अधूरी है।”
तीसरी राजकुमारी ने कोई विरोध नहीं किया।
न आँसू, न शिकायत।
🌧️ मार्ग में संवाद
रास्ते में महामंत्री ने पूछा—
“राजकुमारी जी, आपने इतना गूढ़ उत्तर दिया, फिर भी महाराज नाराज़ हो गए।”
राजकुमारी मुस्कराकर बोली—
“जो सबसे आवश्यक होता है,
वह अक्सर सबसे साधारण लगता है।
नमक दिखाई नहीं देता,
पर उसके बिना स्वाद भी नहीं रहता।”
🍽️ बोध की घड़ी
महामंत्री ने रसोई में आदेश दिया—
उस दिन महाराज के भोजन में नमक न डाला जाए।
राजा ने पहला कौर लिया…
फिर दूसरा…
और फिर थाली एक ओर रख दी।
“यह कैसा भोजन है? इसमें स्वाद ही नहीं है!”
उसी क्षण राजा की आँखों से आँसू बह निकले।
उन्हें अपनी बेटी के शब्द याद आ गए।
“नमक का महत्व तब समझ आता है,
जब वह न हो।”
🙏 पश्चाताप और स्वीकार
राजा तुरंत गुरुकुल पहुँचे।
तीसरी राजकुमारी को ससम्मान वापस लाए।
दरबार में उन्होंने कहा—
“मेरी तीसरी पुत्री का प्रेम
सबसे सच्चा था।
नमक जैसा प्रेम—
जो दिखता नहीं,
पर जीवन को अर्थ देता है।”
🌺 व्याख्या (Explanation)
यह कथा हमें सिखाती है कि
हर प्रेम को शब्दों की चमक की आवश्यकता नहीं होती।
कुछ प्रेम मौन होते हैं,
पर वही सबसे गहरे होते हैं।
जो संबंध दिखावे से दूर,
कर्तव्य और त्याग से जुड़े हों—
वही स्थायी होते हैं।
🌿 नीति (Moral)
सच्चा प्रेम वह नहीं जो बोलकर जताया जाए,
सच्चा प्रेम वह है
जो बिना बोले जीवन को सँवार दे।
या सरल शब्दों में—
रिश्तों में नमक की तरह बनिए—
कम दिखें, पर सबसे ज़रूरी रहें।