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🌿 “घड़े से छलका अहंकार”
(जब भक्ति ने जप नहीं, प्रेम को चुना)
📜 कथा
वैकुण्ठ लोक की शांत आकाशगंगा में एक दिन नारद मुनि वीणा बजाते हुए विचरण कर रहे थे। उनके मुख से हर क्षण “नारायण… नारायण…” की ध्वनि निकल रही थी। देवता प्रणाम करते, ऋषि नमन करते, और स्वयं नारद जी के भीतर यह भाव धीरे-धीरे गहराने लगा—
“मैं तो क्षण-क्षण प्रभु का स्मरण करता हूँ,
मेरे समान भक्त इस त्रिलोक में कौन?”
मन में उपजा यह भाव कब गर्व बन गया, नारद जी को स्वयं भी पता न चला।
उसी गर्व के साथ वे सीधे वैकुण्ठ पहुँचे। भगवान विष्णु शेषनाग पर विराजमान थे—शांत, करुण और मुस्कराते हुए।
नारद जी ने झुककर कहा—
“प्रभु! मैं निरंतर आपका नाम लेता हूँ, आपके गुण गाता हूँ। क्या मैं आपका सबसे बड़ा भक्त नहीं हूँ?”
भगवान विष्णु मंद-मंद मुस्कराए। उनकी मुस्कान में न उपहास था, न अस्वीकार—बस एक गहरा रहस्य छिपा था।
उन्होंने कहा—
“नारद, तुम्हारा प्रेम मुझे प्रिय है।
परंतु चलो, आज तुम्हें मेरा एक और भक्त दिखाता हूँ।”
क्षण भर में दोनों पृथ्वी लोक में आ पहुँचे।
🌾 किसान का घर
वह कोई राजमहल नहीं था।
मिट्टी की दीवारें, खपरैल की छत,
आँगन में तुलसी का पौधा
और भीतर सादगी से भरा जीवन।
भोर होते ही वह किसान उठा।
उसने हाथ जोड़कर आकाश की ओर देखा—
“नारायण… आज का दिन भी तुम्हारे नाम।”
फिर वह खेतों में जुट गया।
हल चलाते समय न कोई मंत्र,
न कोई शंखनाद—
बस श्रम, पसीना और कर्तव्य।
शाम को लौटकर, थका हुआ शरीर,
पर शांत हृदय…
दीपक जलाया और बोला—
“हे नारायण, आज भी सब संभाल लिया।”
इतना कहकर वह सो गया।
नारद जी यह सब देख रहे थे।
उनका मन असमंजस में पड़ गया।
वे बोले—
“प्रभु! यह तो दिन में केवल दो बार ही आपका नाम लेता है।
और मैं तो हर समय जप करता हूँ!
फिर यह मुझसे बड़ा भक्त कैसे?”
🏺 घड़े की परीक्षा
भगवान विष्णु ने एक जल से भरा घड़ा उठाया और नारद जी को दिया।
“नारद, इसे सिर पर रखकर पूरे दिन घूमो।
पर ध्यान रहे—एक बूँद भी न गिरे।”
नारद जी चल पड़े।
हर कदम पर सावधानी,
हर पल डर—
कहीं पानी छलक न जाए।
दिन ढल गया।
संध्या हो गई।
नारद जी लौटे—थके, मौन, चिंतन में डूबे।
भगवान ने पूछा—
“नारद, आज कितनी बार मेरा नाम लिया?”
नारद जी की दृष्टि झुक गई।
“प्रभु… एक बार भी नहीं।
पूरा ध्यान घड़े पर ही रहा।”
🌸 भक्ति का रहस्य
भगवान विष्णु ने स्नेह से कहा—
“नारद, यही अंतर है।
तुम नाम जपते हो,
पर मन कहीं और भटक जाता है।
वह किसान नाम कम लेता है,
पर जब लेता है—
तो पूरा हृदय दे देता है।”
✨ काव्य पंक्तियाँ ✨
नाम की संख्या से नहीं,
भाव की सच्चाई से मैं मिलता हूँ।
जहाँ अहंकार शून्य हो जाए,
वहीं भक्ति का दीप जलता हैं।
भगवान् आगे बोले—
“भक्ति का अर्थ संसार छोड़ना नहीं,
कर्तव्य निभाते हुए मुझे याद रखना है।
जिसका हल चलता है खेत में,
पर मन टिका है मुझमें—
वही सच्चा भक्त है।”
🌧️ नारद का परिवर्तन
नारद जी का गर्व टूट चुका था।
उनकी आँखों में विनय उतर आया।
उन्होंने प्रभु के चरणों में शीश रख दिया—
“प्रभु, आज समझ आया—
भक्ति प्रदर्शन नहीं, समर्पण है।
क्षमा करें।”
भगवान विष्णु ने उन्हें उठाया।
उनकी मुस्कान और गहरी हो गई।
🌼 व्याख्या (Explanation)
यह कथा हमें सिखाती है कि—
जो व्यक्ति अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से निभाते हुए,
भगवान को हृदय में बसाए रखता है—
वह बिना दिखावे के भी महान भक्त बन जाता है।
🌺 नीति (Moral)
सच्ची भक्ति शब्दों में नहीं,
भावों में होती है।
जहाँ अहंकार समाप्त होता है,
वहीं भगवान प्रकट होते हैं।