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Jhunjhunu, Rajasthan
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🌼 भक्ति की वह मालिश, जिसने भगवान को खड़ा कर दिया 🌼
नगर की एक शांत गली में, दो छोटे-से घर बिल्कुल पास-पास थे।
इन घरों में रहती थीं दो वृद्ध स्त्रियाँ—
एक हिन्दू, दूसरी जैन।
संसार ने दोनों से बहुत पहले ही अपने रिश्ते छीन लिए थे।
न कोई संतान, न कोई अपना—
बस एक-दूसरे का सहारा,
और ईश्वर का नाम।
दिन ढलता तो दोनों चौखट पर बैठ जातीं,
कभी बीते दिनों की बातें,
कभी मौन में भीगता अपनापन।
धर्म अलग था,
पर हृदय एक ही धड़कन से चलता था।
हिन्दू वृद्धा के घर में विराजमान थे—
लड्डू गोपाल।
नन्हे से, चंचल, बाल-रूप में।
उसके लिए वे केवल मूर्ति नहीं थे—
वे उसका बेटा थे,
उसकी सांसें थे।
हर सुबह वह काँपते हाथों से उन्हें स्नान कराती,
नए-नए धुले वस्त्र पहनाती,
दूध, फल, माखन का भोग लगाती।
सर्दी हो या गर्मी,
बरसात हो या लू—
माँ की तरह हर ऋतु का ध्यान रखती।
जब भी बाहर जाती,
खाली हाथ नहीं लौटती—
कभी खिलौना,
कभी वस्त्र,
कभी कोई मीठा लड्डू।
“मेरे गोपाल को अच्छा लगे बस यही चाह है…”
यही उसका जीवन-मंत्र था।
उधर जैन वृद्धा भी
अपनी परंपरा में
संयम, करुणा और सेवा को जीती थी।
वह लड्डू गोपाल के सामने
सिर झुका कर प्रणाम करती,
मन में उतना ही सम्मान
जितना अपने अरिहंत के प्रति।
उन दोनों के बीच
न कोई बहस थी,
न कोई तुलना—
बस श्रद्धा का मौन पुल।
एक दिन हिन्दू वृद्धा को
एक महीने की तीर्थ यात्रा का अवसर मिला।
उसने पास बैठी सखी का हाथ थाम लिया—
“बहन, साथ चलोगी?”
जैन वृद्धा ने धीमी मुस्कान के साथ कहा—
“अब ये पाँव इतना साथ नहीं देते।”
हिन्दू वृद्धा की आँखें नम हो गईं।
फिर बोली—
“मैं जहाँ भी जाऊँगी,
भगवान से तुम्हारे लिए प्रार्थना करूँगी।
और… मेरी एक विनती है—
मेरे पीछे मेरे गोपाल का ध्यान रखना।”
जैन वृद्धा का चेहरा खिल उठा—
“यह मेरा सौभाग्य होगा।”
सब नियम समझा दिए गए—
कब स्नान,
कब भोग,
कब शयन।
और फिर…
तीर्थ यात्रा पर निकल गई वह माँ।
अब घर में
लड्डू गोपाल और
जैन वृद्धा।
पहले दिन उसने
पूरे मन से सेवा की।
एक भी नियम में कमी नहीं छोड़ी।
रात को शयन कराकर
वह संतोष से लौटी।
लेकिन अगले दिन सुबह—
जब स्नान की तैयारी में
उसने पहली बार
लड्डू गोपाल के चरण देखे—
तो वह ठिठक गई।
पैर…
पीछे की ओर मुड़े हुए!
उसका हृदय काँप उठा—
“अरे…
मेरे लड्डू गोपाल को क्या हो गया?
इनके तो पैर मुड़ गए हैं!”
उसे याद आया—
हिन्दू वृद्धा कहती थी—
“गोपाल जीवंत हैं…”
भोली थी वह,
शास्त्र नहीं जानती थी।
बस इतना जानती थी कि
दर्द हो तो
मालिश की जाती है।
उसने आँचल फैलाया,
धीरे-धीरे
नन्हे चरणों को सहलाने लगी।
“ठीक हो जाओ ठाकुर…
तुम्हें दर्द न हो…”
उस दिन से
वह दिन में पाँच बार
उन पैरों की मालिश करने लगी।
न कोई मंत्र,
न कोई विधि—
बस ममता।
भक्ति ऐसी थी
कि भगवान का हृदय
पिघल गया।
“जहाँ ज्ञान चूक जाए,
वहाँ प्रेम जीत जाता है।”
एक सुबह—
उसने देखा—
लड्डू गोपाल
सीधे खड़े हैं।
पैर…
संपूर्ण।
वह खुशी से रो पड़ी—
“ठीक हो गए!
मेरे ठाकुर ठीक हो गए!”
कुछ दिनों बाद
हिन्दू वृद्धा लौट आई।
घर में प्रवेश किया,
दर्शन के लिए झुकी—
और ठहर गई।
गोपाल…
खड़े थे।
उसकी आँखें फैल गईं,
हृदय धक से रह गया।
वह दौड़कर सखी के पास गई—
“मेरे लड्डू गोपाल कहाँ हैं?”
जैन वृद्धा ने
पूरी कथा सुना दी।
सुनते-सुनते
हिन्दू वृद्धा का शरीर
काँपने लगा।
वह वापस आई,
गोपाल के चरणों में गिर पड़ी—
“हे गोपाल!
वर्षों सेवा की,
पर पहचान न सकी।
तेरी लीला अपरम्पार है…”
लड्डू गोपाल
मुस्करा रहे थे।
फिर उसने जैन वृद्धा का हाथ पकड़ा—
“बहन…
तू धन्य है।
तुझे यह भी नहीं पता था
कि गोपाल ऐसे ही होते हैं,
फिर भी तेरे प्रेम ने
भगवान को खड़ा कर दिया।”
🌸 काव्य पंक्तियाँ 🌸
ना पूजा की सीमा पूछी,
ना धर्म की दीवार जानी,
जहाँ प्रेम ने छू लिया,
वहीं ईश्वर ने पहचान मानी।
🌿 नीति / Moral 🌿
भगवान को न विधि चाहिए,
न ज्ञान का प्रदर्शन—
उन्हें चाहिए केवल
निष्कपट प्रेम।
धर्म रास्ते हो सकते हैं,
पर मंज़िल एक है—
करुणा, सेवा और भक्ति।
जहाँ भाव सच्चा हो,
वहाँ भगवान स्वयं चलकर आते हैं। 🙏