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🌺 माला और बन्दूक — दो हथियारों की कथा 🌺
शहर का बस-स्टैंड हमेशा की तरह शोर से भरा हुआ था।
इंजन की घरघराहट, लोगों की भाग-दौड़, चायवालों की आवाज़—सब कुछ जैसे जीवन की आपाधापी का चित्र था।
उसी कोलाहल के बीच, एक पुराना बरगद खड़ा था—शांत, स्थिर और गवाह।
उसकी छाया में एक संत बैठे थे।
सादा वस्त्र, शांत मुखमुद्रा, और हाथों में धीरे-धीरे घूमती हुई राम-नाम की माला।
हर मनका जैसे उनके भीतर उतर रहा था—
हर “राम” जैसे सांसों को पवित्र कर रहा था।
भीड़ चल रही थी समय के पीछे,
और एक संत बैठा था समय के पार…
तभी एक बस आकर रुकी।
उसमें से एक अंग्रेज उतरा—लंबा कद, सख्त चेहरा, और कंधे पर टंगी हुई बन्दूक।
उसकी आँखें उस शांत दृश्य पर ठहर गईं।
वह संत के पास आया और व्यंग्य से पूछा—
“ये आपके हाथ में क्या है?”
संत ने मुस्कराकर उसकी ओर देखा।
उनकी दृष्टि बन्दूक पर ठहर गई।
वे बड़े सहज भाव से बोले—
“और ये तुम्हारे कंधे पर क्या है?”
अंग्रेज ने गर्व से कहा—
“ये मेरा हथियार है।”
संत ने बिना किसी तर्क या क्रोध के कहा—
“ये भी मेरा हथियार है।”
अंग्रेज चौंका।
उसने पूछा—
“ये आपको किसने दिया?”
संत ने प्रश्न को प्रश्न से ही उत्तर दिया—
“और तुम्हें ये बन्दूक किसने दी?”
अंग्रेज बोला—
“मेरी सरकार ने।”
संत की वाणी में अद्भुत मिठास थी—
“यह माला मुझे मेरी युगल सरकार—श्री राधा-कृष्ण ने दी है।”
एक सरकार सत्ता से चलती है,
दूसरी सरकार श्रद्धा से…
अंग्रेज ने फिर पूछा—
“ये क्या काम करती है?”
संत ने शांत स्वर में कहा—
“पहले बता, तेरा हथियार क्या काम करता है?”
अंग्रेज ने बिना एक क्षण गंवाए,
पेड़ की डाल पर बैठे एक निरीह पक्षी पर बन्दूक तानी—
और गोली चला दी।
धमाके की आवाज़ के साथ,
पक्षी तड़पता हुआ नीचे गिर पड़ा।
उसकी फड़फड़ाहट जैसे जीवन की आखिरी गुहार थी।
अंग्रेज बोला—
“ये काम करता है मेरा हथियार!”
संत का हृदय करुणा से भर उठा।
उन्होंने उस तड़पते पक्षी को देखा,
अपनी माला उसके शरीर से स्पर्श कराई और आँखें बंद कर धीरे से कहा—
“राम…”
क्षण भर का मौन…
और फिर एक चमत्कार।
पक्षी की आँखें खुलीं,
उसके पंखों में फिर से प्राण लौट आए।
वह उड़ता हुआ वापस उसी डाल पर जा बैठा,
मानो कुछ हुआ ही न हो।
जहाँ बन्दूक जीवन छीनती है,
वहाँ नाम जीवन लौटा देता है…
संत बोले—
“मेरा हथियार ये काम करता है।”
अंग्रेज के हाथ काँपने लगे।
बन्दूक उसके कंधे पर बोझ बन गई।
उसकी आँखों में पहली बार विनम्रता उतरी।
वह संत के चरणों में बैठ गया।
उस दिन उसने जाना—
शक्ति डर से नहीं, श्रद्धा से जन्म लेती है।
उसने श्री हरिनाम की दीक्षा ली
और उसका जीवन दिशा पा गया।
हरि नाम की लूट है,
लूट सके तो लूट।
अंत काल पछताएगा,
जब प्राण जाएंगे छूट॥
🌼 कथा का भावार्थ / व्याख्या 🌼
यह कथा केवल चमत्कार की नहीं है,
यह दो दृष्टियों की टक्कर है—
एक जो शक्ति को विनाश में देखती है,
और दूसरी जो शक्ति को करुणा में पहचानती है।
बन्दूक बाहर के शत्रु को मारती है,
लेकिन नाम भीतर के अंधकार को।
संत यह नहीं कहते कि हथियार गलत है,
वे यह दिखाते हैं कि सच्चा हथियार वह है जो जीवन बचाए, न कि छीने।
🌸 नीति / Moral 🌸
जिसके पास नाम का सहारा है,
उसे किसी और हथियार की आवश्यकता नहीं।
क्योंकि राम-नाम वह शक्ति है
जो मृत्यु में भी जीवन जगा देती है।
🙏 जय जय श्री राधे 🙏