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“नरसिंह की टेक और केदार राग की लाज”

(एक अनन्य भक्ति की अमर गाथा)

 

मनुष्य का संचित धन समय के साथ क्षीण हो जाता है। यौवन, जीवन और विद्या भी काल के चक्र में बंधकर मिट जाते हैं। परंतु जो कुछ भगवान् के चरणों में अर्पित होता है—वह कभी नष्ट नहीं होता। यदि इस जन्म में उसका फल न भी मिले, तो जन्मान्तर में चक्रवृद्धि व्याज के साथ अवश्य प्राप्त होता है। इसी अटल विश्वास को हृदय में धारण किए भक्तराज दिन-रात प्रभु का भजन करते रहते थे। परंतु उस दिन उनके हृदय में एक पीड़ा बार-बार टीस बनकर उठ रही थी। उनका प्रिय केदार राग साठ रुपयों में बंधक पड़ा था। बिना उस राग के वे अपने प्रभु का आवाहन कैसे करते? वे ध्यान में बैठते, आँखें मूँदते, करताल थामते—पर चित्त बार-बार उसी विचार में उलझ जाता।

“मेरे प्रभु! मैं आपको पुकारूँ भी तो कैसे? मेरा केदार तो बंधक पड़ा है…”

उनकी व्याकुलता बढ़ती ही जा रही थी।

 

वैकुण्ठ में आधी रात

उधर भगवान् दिव्य वैकुण्ठधाम में विश्राम कर रहे थे। लक्ष्मीजी चरणों में विराजित थीं , जो प्रेमपूर्वक पादसेवन कर रही थीं।

अचानक आधी रात में भगवान् एकाएक उठ बैठे। उनके नेत्रों में अद्भुत गंभीरता थी, मानो किसी अत्यंत आवश्यक कार्य के लिए तत्पर हों।

श्रीलक्ष्मी ने मुस्कराकर पूछा—

“प्राणनाथ! यह कैसी शीघ्रता? क्या कोई दैत्य उत्पात मचा रहा है? या किसी गजेन्द्र की पुकार सुनाई दी है?”

भगवान् की दृष्टि दूर कहीं लगी हुई थी। उन्होंने धीमे स्वर में कहा—

“प्रिये! आज किसी दैत्य का वध नहीं करना। आज तो मेरे एक प्रिय भक्त की लाज रखनी है… वह निरपराध है, परंतु उसका हृदय व्यथा से भरा है। मैं उसके पास जा रहा हूँ।”

इतना कहकर वे बिना गरुड़, बिना किसी पार्षद के—स्वयं ही चल पड़े। भक्त की पीड़ा उन्हें अधिक विलंब करने नहीं दे रही थी।

 

जूनागढ़ की आधी रात

क्षणभर में वे पहुँचे और नरसिंह मेहता का ही रूप धारण कर धरणीधर मेहता के घर के द्वार पर पहुँचे। धीरे-धीरे द्वार खटखटाया गया।

“कौन है?” भीतर से उनींदी आवाज आई।

“द्वार खोलिए, मैं नरसिंहराम हूँ। ऋण चुकाने आया हूँ।”

द्वार खुला। सामने वही परिचित स्वरूप।

धरणीधर ने कहा—

“भक्तराज! इतनी रात को कष्ट क्यों किया?

कुछ दिन और भी रह जाते तो क्या हानि थी?”

भगवान् मुस्कराए—

“जब एक उदार गृहस्थ से रुपये मिल गए तो उन्हें घर पर रखकर क्या करूँ? अभी मेरे मन में केदार राग गाने की तीव्र इच्छा हो रही है। इसलिए सोचा—अभी जाकर ऋण चुका दूँ और अपना राग मुक्त कर लूँ।”

उन्होंने साठ रुपये सामने रख दिए। रुपये गिने गए। प्रतिज्ञापत्र पर भरपाई लिख दी गई।

भगवान् वह पत्र लेकर राजमहल के मंदिर पहुँचे, जहाँ व्याकुल नरसिंह मेहता ध्यान में बैठे थे। अंतरिक्ष से वह पत्र धीरे से उनके सामने गिर पड़ा।

 

चमत्कार का पत्र

नरसिंह ने पत्र उठाया। ज्यों ही पढ़ा—

“आज आधी रात को नरसिंहरामजी ने साठ रुपये चुका दिए…”

उनकी आँखों से प्रेमाश्रु झरने लगे।

कंठ रुद्ध हो गया।

रोम-रोम पुलकित हो उठा।

 

वे समझ गए— “यह मेरे प्रभु का कार्य है!”

और वे प्रेम में उन्मत्त होकर नृत्य करने लगे। कुछ लोग उपहास करने लगे—

“देखो, पकड़े जाने के भय से पागल बन रहा है!”

“सुबह होते ही राजा की तलवार इसका पागलपन दूर कर देगी!”

परंतु भक्त को इन बातों से क्या? उसके लिए तो बस एक सत्य था—

“मेरे जैसे क्षुद्र जीव के लिए भी प्रभु के हृदय में स्थान है!”

 

अंतिम परीक्षा

प्रातःकाल निकट था।

राजा माण्डलीक ने कठोर स्वर में कहा—

“अब अधिक अभिनय मत कीजिए। यदि अंतिम मुहूर्त तक आपके कंठ में हार नहीं पड़ा, तो परिणाम भयानक होगा।”

पूर्व दिशा अरुणिम हो रही थी। पक्षियों का कलरव गूँज रहा था।

 

नरसिंह ने सोचा—

“मैं तो प्रभु के भरोसे बैठा हूँ…

पर वे क्या सोच रहे हैं?

क्या यह मेरी अंतिम परीक्षा है?”

आँखों से अश्रुधारा बह चली।

 

उन्होंने करताल सँभाली और केदार राग में गाना प्रारंभ किया—

“हे दयालु! क्या आपकी प्रीति का यही प्रतिफल है?

मेरी गर्दन की क्या बिसात—

आपकी लाज उससे कहीं अधिक मूल्यवान है!”

वे आगे गाने लगे—

“सुदामा को मुट्ठी तंदुल के बदले महल दिए,

द्रौपदी की लाज रखी,

गोवर्धन उठा लिया—

तो क्या आज एक पुष्पहार के लिए कृपण बनेंगे?”

उनकी वाणी काँप रही थी—

“प्रभु! मैं मृत्यु से नहीं डरता।

डरता हूँ आपकी अपकीर्ति से।

संसार कहेगा— नरसिंह की टेक व्यर्थ गई!”

फिर वे रो पड़े—

“परमात्मा! यह तो मेरे कर्मों का फल है। आप निर्दोष हैं। परंतु आपके सिवा किसे पुकारूँ? मेरे तो एक आप ही पति हैं…”

भक्ति की यह अग्नि अब चरम पर थी।

 

चमत्कार का प्रभात

ज्यों ही सूर्य की पहली किरण फूटी,

मंदिर का ताला स्वयं टूटकर गिर पड़ा।

भारी जंजीरें झनझनाकर भूमि पर आ गिरीं।

द्वार अपने आप खुल गए।

एक दिव्य ज्योति प्रकट हुई।

उस प्रकाशमंडल से स्वयं मुरलीमनोहर प्रकट हुए।

सबकी आँखें विस्फारित थीं।

भगवान् आगे बढ़े, अपने कंठ का हार उतारा

और नरसिंह के गले में पहना दिया।

हार गले में पड़ते ही नरसिंह उन्मुक्त स्वर में पुकार उठे—

“बोलो भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र की जय!”

और मंदिर में जयघोष गूँज उठा।

 

संदेश

उस दिन संसार ने देख लिया—

धन नष्ट हो सकता है,

यौवन क्षीण हो सकता है,

जीवन समाप्त हो सकता है—

परंतु सच्ची भक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती।

भक्त की टेक पर स्वयं भगवान् को आना पड़ता है।

भक्त की लाज, भगवान् की लाज बन जाती है।

और जहाँ प्रेम की पुकार सच्ची हो—

वहाँ वैकुण्ठ से धरती तक की दूरी एक क्षण में मिट जाती है।