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“सत्संग की शक्ति: पत्थर से पारस”
घने वन की नीरवता में, जहाँ केवल पत्तों की सरसराहट और पक्षियों की मंद ध्वनि सुनाई देती थी, वहीं कहीं एक ऐसा जीवन भटक रहा था जिसे संसार “अपराधी” कहता था, पर जिसे अभी तक स्वयं अपना परिचय नहीं मिला था। उसका नाम था भैरवदास। (पूर्व नाम वह भूल चुका था, और संसार भी…)
भैरवदास का जन्म ऐसे परिवार में हुआ जहाँ चोरी, डाका और लूटपाट ही आजीविका थी। बचपन से ही उसे यही शिक्षा दी गई—
“दूसरों का धन ही हमारा साधन है।”
उसके लिए यह पाप नहीं, परंपरा थी। वह कठोर था, निर्भीक था, और उसके हृदय में दया के लिए कोई स्थान नहीं था। परन्तु नियति ने उसके जीवन में एक ऐसा मोड़ लिख रखा था, जहाँ पत्थर भी पिघलने वाला था।
संत से प्रथम भेंट – एक मौन क्रांति
एक दिन वह वन में शिकार की तरह किसी राहगीर की तलाश में घूम रहा था। तभी उसकी दृष्टि एक वृक्ष के नीचे बैठे एक संत पर पड़ी। संत की आँखों से अश्रुधारा बह रही थी, पर उनके चेहरे पर अपूर्व शांति थी।
भैरवदास ठिठक गया। उसने सोचा— “यह कैसा व्यक्ति है? जिसके पास कोई भोग नहीं, कोई साधन नहीं… फिर भी ये रो रहे हैं। क्या इनके पास कोई ऐसा सुख है जो मुझे कभी नहीं मिला?”
संत के दर्शन मात्र से उसके भीतर कुछ काँप उठा। जिसने जीवन में कभी किसी के सामने सिर न झुकाया था, उसका मस्तक स्वयं झुक गया।
उस क्षण—
“अहंकार की दीवार में पहली दरार पड़ी, और अपराधी के भीतर का मनुष्य जाग पड़ा।”
संत ने आँखें खोलीं। उनकी दृष्टि करुणा से भरी थी। उन्होंने उसे पास बुलाया, स्नेह से बैठाया। धीरे-धीरे वार्तालाप हुआ।
जब संत ने उसके जीवन के विषय में पूछा, तो उसने बिना झिझक सब बता दिया—
“मैं चोरी करता हूँ,
डाका डालता हूँ,
लूटपाट करता हूँ।”
संत ने कहा—
“बेटा, यह मार्ग विनाश का है। जीवन अमूल्य है। इसे प्रभु के चरणों में लगाओ। आज से चोरी छोड़ दो।”
भैरवदास के भीतर द्वंद्व हुआ। उसने हाथ जोड़कर कहा—
“यह संभव नहीं। यही मेरा जीवन है।
परंतु आप जो और कहें, मैं प्राण देकर भी निभाऊँगा।”
संत मुस्कुराए। उन्होंने उसे चार नियम दिए—
सदैव सत्य बोलना।
साधु सेवा में रुचि रखना और संतों का आदर करना।
बिना भगवान को अर्पित किए जल या अन्न ग्रहण न करना।
जहाँ भी प्रभु की आरती हो, दर्शन किए बिना न जाना।
भैरवदास ने वचन दिया।
साधु सेवा और पहला चमत्कार
अब वह चोरी तो करता, परंतु धन से पहले साधु सेवा करता।
उसके भीतर एक नई भावना जन्म ले चुकी थी।
एक बार संतों की मंडली उसके घर आई।
घर में अन्न नहीं था।
उसने उधार माँगा—मना कर दिया गया।
रात थी।
खेतों में किसान सो रहे थे।
वह गेहूँ भर लाया।
पर उसके भारी पैरों के निशान खेत में रह गए।
संतों को भोजन कराते समय उसके मन में भय था—
“अब पकड़ा जाऊँगा।”
तभी अचानक धूल भरी आँधी चली।
वर्षा हुई।
पैरों के निशान मिट गए।
वह स्तब्ध रह गया।
“सेवा की थाली में श्रद्धा थी, और रक्षा का उत्तर स्वयं आकाश ने दिया।”
उस दिन उसका विश्वास दृढ़ हुआ— “साधु सेवा कभी व्यर्थ नहीं जाती।”
घोड़े की लीला – सत्य की परीक्षा
एक उत्सव था। वह गुरु के पास कुछ ले जाना चाहता था, पर उसके पास धन नहीं था। उसने निश्चय किया—
“आज चोरी करूँगा, पर गुरु सेवा के लिए।”
वह सैनिक का वेश बनाकर राजा के अस्तबल में घुसा।
पहरेदार ने पूछा—
“कौन है?”
सत्य बोलना उसका नियम था। उसने कहा—
“मैं चोर हूँ।”
पहरेदार हँस पड़ा—
“चोर कभी स्वयं को चोर नहीं कहता।”
वह एक सुंदर काला घोड़ा लेकर निकल गया।
प्रातःकाल मार्ग में मंदिर से मंगला आरती की ध्वनि आई। गुरु की आज्ञा स्मरण हुई। उसने घोड़ा बाँधा और दर्शन को चला गया।
उधर सैनिकों को संदेह हुआ।
पीछा किया।
घोड़ा मिला—पर अब वह श्वेत था।
काला घोड़ा सफेद हो चुका था।
सैनिक विस्मित।
भैरवदास बाहर आया।
पूछा गया—
“क्या तुमने यह घोड़ा चुराया?”
उसने निर्भीक कहा—
“हाँ, मैं वही चोर हूँ।”
“पर यह तो काला था!”
वह बोला—
“मैं आरती देखने गया था। रंग कैसे बदला, यह तो ठाकुर जी जानें।”
राजा के पास ले जाया गया। राजा उसकी सत्यता से प्रभावित हुआ।
“जहाँ छल हार गया, वहाँ सत्य ने सिंहासन पा लिया।”
राजा ने उसे दंड नहीं,
सम्मान दिया।
संपत्ति दी।
पूर्ण परिवर्तन
संपत्ति लेकर वह गुरु चरणों में गया। आँखों से आँसू बह रहे थे। उसने कहा—
“गुरुदेव, अब मैं चोरी नहीं करूँगा। आपने मुझे नया जन्म दिया है।”
धीरे-धीरे उसका जीवन पूर्णत: बदल गया।
अब उसका मन चोरी में नहीं, सेवा में लगता था।
एक दिन उसके मन में जिज्ञासा हुई—
“प्रभु कैसे दिखते हैं? क्या मुझे दर्शन नहीं देंगे?”
कई दिन बीत गए। एक दिन वह भावावेश में बोल उठा—
“प्रभु! पहले मैं बिना स्नान किए खाता था, अब आपके लिए स्नान करता हूँ। पहले कभी तिलक-कंठी नहीं धारण की, अब केवल आपके लिए करता हूँ। मैं इतना कर रहा हूँ… आप मेरे लिए क्या कर रहे हैं? क्या दर्शन नहीं देंगे?”
उसकी वाणी में शिकायत थी, पर प्रेम भी था। और उसी क्षण—
प्रकाश फैल गया।
वातावरण सुगंधित हो उठा।
प्रभु प्रकट हुए।
“जहाँ प्रेम पुकार बन जाए, वहाँ ईश्वर को प्रकट होना ही पड़ता है।”
भैरवदास रो पड़ा।
जिसने जीवन भर दूसरों का धन छीना,
आज वह प्रभु के चरणों में स्वयं को समर्पित कर रहा था।
अंतिम संदेश
जो कभी सोचता था—
“आज कहाँ चोरी करनी है?”
अब सोचता था—
“आज कौन संत आएँगे? सेवा कैसे करूँ?”
पहले सिपाही हथकड़ी लेकर पीछे घूमते थे।
अब लोग उसकी चरण रज माथे पर लगाते थे।
एक संत की शरण और चार नियमों का पालन— और एक अपराधी परम भक्त बन गया।
“सत्संग की अग्नि में पाप जल जाते हैं, संत कृपा से पत्थर भी पारस बन जाते हैं।”
इस कथा का सार यही है—
कैसा भी दुष्ट क्यों न हो,
यदि संत कृपा हो जाए,
तो भगवद् दर्शन और भक्ति दुर्लभ नहीं रहती।
सत्संग सर्वोपरि है।
संत संग से घोर पापी भी महात्मा बन सकता है।
और यही भैरवदास की अमर कथा है—
पतन से परमार्थ तक की यात्रा।