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एक मजदूर, एक उपदेश, और मोक्ष

 

शहर की भीड़ भरी सड़क पर एक धनी व्यापारी, सेठ रघुनाथदास, बस से उतरे। उनके वस्त्र कीमती थे, चाल में अभिमान था और हाथों में भारी सामान। उन्होंने चारों ओर नजर दौड़ाई। धूप तेज थी, हवा में धूल तैर रही थी। तभी उनकी दृष्टि एक साधारण से मजदूर पर पड़ी—दुबला-पतला, चेहरे पर थकान, पर आँखों में अजीब-सी शांति।

 

सेठ ने ऊँची आवाज में पुकारा—

“ए भाई! इधर आओ। यह सामान मेरे घर तक ले चलोगे? कितने पैसे लोगे?”

 

मजदूर विनम्रता से आगे आया। उसकी आवाज में संकोच नहीं, एक सहजता थी—

“सेठजी, जो देना हो दे देना। पर मेरी एक शर्त है।”

 

सेठ की भौंहें तन गईं—“कैसी शर्त?”

 

मजदूर ने धीमे से कहा—

“जब मैं सामान लेकर चलूँ, तो रास्ते में या तो आप मेरी सुनना… या आप कुछ सुनाना।”

 

सेठ का चेहरा तमतमा उठा।

“फालतू बातों का समय नहीं है मेरे पास! जाओ, अपना काम करो।”

 

वह आगे बढ़ गए, पर उस दिन जैसे नियति ने भी खेल रच रखा था। कोई दूसरा मजदूर मिला ही नहीं। जैसे वनगमन के समय गंगा तट पर केवल एक ही नाव थी, वैसे ही वहाँ केवल वही मजदूर खड़ा था।

 

मजबूर होकर सेठ ने उसे फिर बुलाया।

मजदूर दौड़ता हुआ आया—“क्या मेरी शर्त मंजूर है, सेठजी?”

 

स्वार्थ के कारण सेठ ने अनमने मन से कहा—“हाँ, हाँ, मंजूर है।”

 

सामान कंधे पर रखकर मजदूर चल पड़ा। लगभग पाँच सौ मीटर की दूरी थी। कुछ कदम चलने के बाद वह मुस्कराकर बोला—

“सेठजी, आप सुनाओगे या मैं सुनाऊँ?”

 

सेठ ने झुंझलाकर कहा—“तू ही सुना।”

 

मजदूर की आँखों में चमक आ गई।

“तो ध्यान से सुनिएगा…”

 

वह बोलता गया—जीवन की बातें, समय की चाल, पाप-पुण्य का हिसाब, और मनुष्य के अहंकार की नश्वरता। उसकी आवाज में कोई विद्वत्ता नहीं थी, पर शब्दों में गहराई थी। सेठ चलते रहे, पर मन कहीं और था।

 

“धन कमाया है तुमने बहुत,

पर क्या पाया है मन का सुख?

सुन ले मानव समय की धुन,

जीवन क्षणभंगुर, सांसें अल्प।”

 

घर आ गया। मजदूर ने सामान बरामदे में रख दिया। सेठ ने कुछ पैसे दिए। मजदूर ने पैसे ले लिए, फिर गंभीर स्वर में पूछा—

“सेठजी, मेरी बात ध्यान से सुनी?”

 

सेठ हँस पड़ा—

“मैंने तेरी कोई बात नहीं सुनी। मुझे तो अपना काम निकालना था।”

 

मजदूर की आँखों में करुणा उतर आई। उसने शांत स्वर में कहा—

“सेठजी, आपने जीवन की बहुत बड़ी गलती कर दी। कल ठीक सात बजे आपकी मृत्यु होने वाली है।”

 

सेठ का चेहरा क्रोध से लाल हो गया—

“तेरी बकवास बहुत हो गई! निकल जा यहाँ से!”

 

मजदूर ने निडर स्वर में कहा—

“मार लो या छोड़ दो, पर सच यही है। अभी भी समय है, मेरी बात ध्यान से सुन लो।”

 

सेठ के भीतर कहीं हलचल हुई। पहली बार उनकी आवाज धीमी पड़ी—

“ठीक है… बोल। ध्यान से सुनूँगा।”

 

मजदूर बोला—

“जब मृत्यु के बाद ऊपर जाओगे, तो तुमसे पूछा जाएगा—‘पहले पाप का फल भोगोगे या पुण्य का?’ तब कहना—‘पाप का फल भुगतने को तैयार हूँ, पर जो पुण्य किया है, उसका फल अपनी आँखों से देखना चाहता हूँ।’”

 

यह कहकर मजदूर चला गया।

 

दूसरे दिन ठीक सात बजे… सेठ रघुनाथदास की मृत्यु हो गई।

 

आँख खुली तो स्वयं को एक दिव्य लोक में पाया। यमदूत उन्हें यमराज के सामने ले गए। यमराज ने गंभीर स्वर में पूछा—

“हे मनुष्य! पहले पाप का फल भोगना चाहता है या पुण्य का?”

 

सेठ को मजदूर की बात याद आई।

“पाप का फल भुगतने को तैयार हूँ, पर अपने पुण्य का फल आँखों से देखना चाहता हूँ।”

 

यमराज चौंके।

“यहाँ ऐसी व्यवस्था नहीं है। दोनों के फल भोगने होते हैं।”

 

सेठ ने दृढ़ स्वर में कहा—

“फिर पूछा क्यों? न्याय के स्थान पर अन्याय कैसा?”

 

यमराज विचलित हुए। वे उन्हें ब्रह्मा जी के पास ले गए। ब्रह्मा जी ने अपनी पोथियाँ उलट-पलट दीं, पर कोई नियम नहीं मिला।

 

अंततः वे भगवान के पास पहुँचे।

 

भगवान ने यमराज और ब्रह्मा से कहा—

“आप दोनों जाइए, अपना-अपना कार्य कीजिए।”

 

फिर उन्होंने सेठ से मुस्कराकर पूछा—

“कहो रघुनाथ, क्या चाहते हो?”

 

सेठ ने विनम्र स्वर में वही बात दोहराई।

 

भगवान की आँखों में करुणा झलक उठी—

“धन्य है वह सद्गुरु, वह मजदूर… जिसने अंतिम समय में भी तुम्हारा कल्याण किया। मूर्ख! उसके बताए उपाय के कारण ही तो तुम आज मेरे सामने खड़े हो। मेरे दर्शन से बड़ा पुण्य-फल और क्या देखना चाहते हो? मेरे दर्शन मात्र से तुम्हारे समस्त पाप भस्म हो गए।”

 

सेठ की आँखों से आँसू बह निकले।

अहंकार पिघल गया। मन द्रवित हो उठा।

 

“गुरु वचन अमृत की धारा,

जो सुन ले, वह तर जाए।

अहंकार की दीवार गिरे,

तो ईश्वर स्वयं मिल जाए।”

 

सेठ ने हाथ जोड़ दिए।

अब वह सेठ नहीं था—एक विनम्र आत्मा था।

 

उस दिन उसे समझ आया—

धन से बड़ा ज्ञान है,

ज्ञान से बड़ा विनम्रता,

और विनम्रता से बड़ा है गुरु का वचन।

 

क्योंकि कौन-सा शब्द कब जीवन की दिशा बदल दे…

यह कोई नहीं जानता।