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“एक दोहे की जागृति”
संध्या का समय था। राजमहल दीपों की स्वर्णिम आभा से जगमगा रहा था। वृद्धावस्था की ओर बढ़ते राजा विक्रमसेन अपने सिंहासन पर बैठे थे। बालों में चाँदी उतर आई थी, आँखों में अनुभव की गहराई थी, पर भीतर कहीं एक अनकही चिंता भी थी—समय की।
वर्षों तक राज्य का सुख भोगते-भोगते उन्हें आभास हो चला था कि जीवन की संध्या निकट है। इसी भाव से उन्होंने एक भव्य उत्सव का आयोजन किया। गुरुदेव, मित्र राष्ट्रों के राजा, राजकुमार और दरबारी—सभी आमंत्रित थे। मनोरंजन के लिए राज्य की सुप्रसिद्ध नर्तकी मृणालिनी को बुलाया गया।
राजा ने आदरपूर्वक कुछ स्वर्ण मुद्राएँ अपने गुरुदेव के चरणों में रख दीं—यदि वे चाहें तो उत्तम नृत्य पर नर्तकी को पुरस्कृत कर सकें।
रात्रि गहराती गई। मृणालिनी का नृत्य मन को मोह लेने वाला था। पायल की झंकार जैसे समय की चाल से होड़ कर रही थी। तबले की थाप के साथ उसके भाव बदलते—कभी श्रृंगार, कभी करुणा, कभी भक्ति।
धीरे-धीरे रात्रि ढलने लगी। ब्रह्ममुहूर्त समीप था। दीपक की लौ थरथरा रही थी। तभी मृणालिनी ने देखा—तबलावादक ऊँघ रहा है। उसकी थाप ढीली पड़ रही थी। उसे जगाने के लिए उसने नृत्य रोककर करुण स्वर में एक दोहा गाया—
“बहु बीती, थोड़ी रही,
पल-पल गयी बिताय।
एक पलक के कारने,
क्यों कलंक लग जाय।”
स्वर में ऐसी वेदना थी कि सभागार में सन्नाटा छा गया।
तबलावादक चौंक उठा। उसे लगा जैसे ये पंक्तियाँ उसी के लिए हैं—“रात भर साधना की, अब अंतिम पहर में क्यों चूक जाऊँ?” उसकी उँगलियाँ पुनः सजग हो उठीं।
गुरुदेव के हृदय में भी कंपन हुआ। वे वर्षों से तप, संयम और भक्ति में लीन थे। पर आज, वृद्धावस्था में, राजदरबार के इस नृत्य में आकर कहीं उनकी साधना विचलित तो नहीं हो रही?
उनके भीतर स्वर गूँजा—
“साधक हूँ मैं जीवन भर का,
अब क्यों मोह में डोलूँ?
अंतिम साँसों की बेला में,
क्यों तप की ज्योति टटोलूँ?”
आँखें नम हो गईं। उन्होंने सारी स्वर्ण मुद्राएँ उठाकर मृणालिनी के चरणों में अर्पित कर दीं। यह पुरस्कार नहीं था—यह जागृति के प्रति कृतज्ञता थी।
मृणालिनी ने फिर वही दोहा दोहराया।
राजकुमारी, जो युवावस्था की दहलीज़ पर थी, भीतर से टूट गई। उसे लगा यह पंक्तियाँ उसी को पुकार रही हैं। कई दिनों से वह पिता की अनदेखी से आहत थी। उसने आवेश में आकर महावत के साथ भाग जाने का निश्चय कर लिया था। पर दोहे की पंक्तियाँ उसके हृदय में तीर-सी चुभीं—
“एक क्षण की भूल, जीवन भर का कलंक।”
उसने अपना नवलखा हार उतारकर मृणालिनी को अर्पित कर दिया। आँसुओं में उसका आवेग बह गया।
फिर वही दोहा गूँजा।
युवराज का हृदय काँप उठा। वह अधीर था। सोचता था—“पिता वृद्ध हो चले हैं, राज मुझे क्यों नहीं देते?” आज रात उसने षड्यंत्र रच लिया था। पर यह दोहा उसके अंतर में बिजली-सा कौंधा—
“राज मिले या न मिले आज,
समय का अपना दौर।
पितृ रक्त से सना ताज क्या,
दे पाएगा मन को ठौर?”
वह काँप उठा। उसने अपना मुकुट उतारकर मृणालिनी के सामने रख दिया।
अब मृणालिनी फिर वही दोहा गाने लगी। राजा विक्रमसेन का धैर्य टूट गया। उन्हें लगा जैसे एक वैश्या ने सबको मोह लिया हो। उन्होंने क्रोध में कह दिया कि एक दोहे से सबको लूट लिया।
इतना सुनते ही गुरुदेव की आँखों से आँसू बह निकले। उन्होंने शांत स्वर में कहा कि यह स्त्री वैश्या नहीं, आज उनकी गुरु बन गई है। उसने उन्हें जगा दिया है। वे वर्षों की तपस्या को अंतिम समय में नष्ट करने चले आए थे। अब वे लौटेंगे—वन की ओर, आत्मा की ओर।
गुरुदेव कमंडल उठाकर चल पड़े।
राजकुमारी ने पिता के चरणों में सिर रख दिया। उसने स्वीकार किया कि वह अधीरता में जीवन नष्ट करने जा रही थी, पर इस दोहे ने उसे संयम सिखाया।
युवराज ने भी अपराध स्वीकार किया। उसकी आँखों में पश्चाताप था।
राजा स्तब्ध थे। उन्हें लगा जैसे एक साधारण दोहा नहीं, स्वयं समय ने उन्हें आईना दिखा दिया हो।
उनके भीतर स्वर उठा—
“राज, वैभव, यश, अभिमान,
सब क्षणभंगुर छाया।
धन-धरती सब धरा रह जाये,
साथ चले बस माया।”
क्षणभर में उनके मन में वैराग्य का प्रकाश फैल गया। उन्होंने उसी समय युवराज का राजतिलक कर दिया। राजकुमारी को स्वतंत्रता दी कि वह अपनी इच्छा से वर चुने। दरबार में उपस्थित राजकुमारों में से उसने स्वयं अपना जीवनसाथी चुन लिया।
राजा ने राज-पाट त्याग दिया और गुरु की शरण में वन की ओर चल पड़े।
सभागार खाली हो गया। दीपक की लौ धीमी हो चली थी। मृणालिनी अकेली खड़ी थी।
उसने सोचा—“मेरे दो शब्दों ने सबका जीवन बदल दिया… पर मैं स्वयं क्यों अंधकार में रहूँ?”
उसके हृदय में भी वैराग्य की किरण फूटी।
“जग को दी जो राह नई,
क्यों खुद राह न चुनूँ?
नाम तेरा लेकर प्रभु,
अब शरण तेरी गुनूँ।”
उसने उसी क्षण अपने नृत्य-जीवन का त्याग कर दिया। आँसू भरी आँखों से आकाश की ओर देखा और क्षमा माँगी।
उस दिन राजमहल में उत्सव नहीं, आत्मजागरण हुआ था।
एक दोहे की दो पंक्तियों ने समय को थाम लिया था।
क्योंकि सच यही है—
प्रशंसा से पिघलना नहीं चाहिए,
आलोचना से उबलना नहीं चाहिए।
धैर्य और चिंतन से ही
जीवन का मार्ग उज्ज्वल होता है।
और इस धरा का…
इस धरा पर…
सब धरा रह जाता है।
जय श्री कृष्ण।