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मृत्यु के पार का प्रकाश — नचिकेता और आत्मा का रहस्य
यज्ञशाला में वेदमंत्रों की गंभीर ध्वनि गूँज रही थी। अग्नि प्रज्वलित थी, घृत की आहुति से लपटें स्वर्णिम हो उठतीं और वातावरण में हवन की पवित्र सुगंध फैल रही थी। महर्षि वाजश्रवा ने ‘विश्वजित् यज्ञ’ का संकल्प लिया था—ऐसा यज्ञ जिसमें अपनी समस्त प्रिय वस्तुएँ दान में दे दी जाती हैं। वे प्रतिष्ठा और लोक-यश की कामना से ब्राह्मणों को गौ-दान कर रहे थे।
परंतु वहाँ खड़ा एक बालक सब देख रहा था—वह था उनका पुत्र, नचिकेता। उसका हृदय निर्मल था, दृष्टि निष्कपट। उसने देखा कि जो गौएँ दान में दी जा रही हैं, वे दुर्बल, दुग्धहीन और वृद्ध हैं। उनके दाँत गिर चुके थे, वे न जल पी सकती थीं, न घास चर सकती थीं। बालक का मन उद्विग्न हो उठा।
उसके भीतर से एक करुण स्वर उठा—
“पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रिया:।
अनन्दा नाम ते लोकास्तान् स गच्छति ता ददत्॥”
(कठोपनिषद् 1.1.3)
अर्थात—जो मनुष्य ऐसी गौएँ दान में देता है जो जल पी चुकी हैं, घास खा चुकी हैं, दूध दे चुकी हैं और इन्द्रियों से हीन हैं, वह आनंदहीन लोकों को प्राप्त होता है।
नचिकेता का हृदय धर्म के प्रति जागृत हो उठा। वह धीरे से पिता के समीप गया और विनम्र स्वर में बोला—
“पिताश्री! आप यह यज्ञ किस भाव से कर रहे हैं? क्या यह दान पूर्णतः निष्कपट है?”
वाजश्रवा उस समय अतिथियों के सत्कार और यज्ञ-विधि में व्यस्त थे। उन्होंने पुत्र की बात अनसुनी कर दी। पर बालक का मन संतुष्ट न हुआ।
बालक के हृदय में धर्म के प्रति प्रामाणिकता थी। उसने सोचा—
“दान वह है जो त्याग से जन्मे,
जो प्रिय हो, वही अर्पित हो।
जो स्वयं के लिए व्यर्थ हो गया,
वह कैसा यज्ञ, कैसा संकल्प हो?”
वह विनम्र स्वर में पुनः बोला कि ऐसा दान यज्ञ का फल नहीं देगा। असमर्थ गौओं का दान अनुचित है।
पुत्र के इन शब्दों से वाजश्रवा को क्रोध आ गया। उन्हें लगा कि एक बालक उन्हें धर्म सिखा रहा है। उन्होंने कठोर स्वर में कहा कि वह उन्हें धर्म-अधर्म का ज्ञान न दे।
नचिकेता ने शांत भाव से कहा कि वह ज्ञान नहीं दे रहा, केवल निवेदन कर रहा है कि उचित दान किया जाए।
तब वाजश्रवा ने पुनः क्रोधित होकर कहा कि यदि उसके विचार में यह दान उचित नहीं है तो बताओ उत्तम दान क्या है। वेदों में पुत्र को पिता की सर्वोत्तम संपत्ति कहा गया है, तो क्या वे उसे भी दान कर दें?
अपने पिता को इस प्रकार बोलते देख नचिकेता ने प्रसन्नता पूर्वक कहा कि यदि वह उनके लिए सर्वोत्तम है तो उन्हें उसे अवश्य किसी को दान दे देना चाहिए। उसने आग्रह किया कि वे बताएं कि उसे किसे दान में दे रहे हैं।
वाजश्रवा ने पहले इसे बालपन समझकर टाल दिया। पर नचिकेता बार-बार पूछने लगा—“आप मुझे किसे दान में दे रहे हैं?”
बार-बार के प्रश्न से वाजश्रवा चिढ़ गए। क्रोध में उन्होंने कह दिया—“जा, मैंने तुझे यम को दान में दे दिया।”
वचन यज्ञशाला में, अग्नि के सम्मुख, ब्राह्मणों की उपस्थिति में कहा गया था। वह क्रोध का शब्द था, पर धर्मभूमि पर उच्चरित हुआ था।
नचिकेता के भीतर विचित्र शांति थी। उसने सोचा—
“यदि पिता का वचन असत्य हो जाए,
तो पुत्र का जन्म व्यर्थ है।
धर्म यदि डगमगाने लगे,
तो जीवन ही निष्फल है।”
नचिकेता ने इसे आदेश मान लिया।
कुछ ही क्षणों में वाजश्रवा को अपनी भूल का आभास हुआ। उन्होंने प्रेम से समझाया कि वे तो क्रोध में कह बैठे थे। पर नचिकेता ने कहा कि यदि वह पिता के वचन का पालन न करे तो उनका वचन मिथ्या हो जाएगा। अतः उन्हें यमलोक जाने की आज्ञा दी जाए।
पिता के चरण स्पर्श कर वह यमलोक की ओर चल पड़ा।
नचिकेता — मृत्यु के द्वार पर अडिग खड़ा एक बालक
यमलोक की दिशा में बढ़ते हुए नचिकेता के चरणों में न थकान थी, न भय। उसके मन में केवल एक ही दीप जल रहा था—सत्य का दीप। जब वह यमपुरी के विशाल, गंभीर और अलौकिक द्वार पर पहुँचा, तो वहाँ प्रहरी रूप में खड़े यमदूतों ने उसे रोक लिया।
उनकी वाणी कठोर थी, पर बालक की आँखों में निर्भयता थी।
“बालक! यहाँ किस उद्देश्य से आए हो? यह यमपुरी है—मृत्यु का लोक। जीव यहाँ स्वेच्छा से नहीं आते।”
नचिकेता ने शांत स्वर में उत्तर दिया—
“मेरे पिताश्री ने मुझे यमराज को दान में दिया है। अतः मैं अपने पिता के वचन की रक्षा करने आया हूँ। कृपया मुझे धर्मराज से मिलने की अनुमति दें।”
यमदूतों ने विस्मय से उसे देखा। इतना छोटा बालक, और इतनी दृढ़ वाणी! उन्होंने कहा—
“यमराज अभी अपने भवन में नहीं हैं। तुम्हें यहीं प्रतीक्षा करनी होगी।”
नचिकेता ने बिना क्षण भर विचार किए कहा—
“यदि प्रतीक्षा ही मेरी परीक्षा है, तो मैं प्रतीक्षा करूँगा।”
वह वहीं द्वार पर भूमि पर बैठ गया।
एक दिन बीता…
दूसरा दिन बीता…
तीसरा दिन भी बीत गया…
तीन दिन और तीन रातें—बिना अन्न, बिना जल।
न शिकायत, न पश्चाताप।
केवल मौन तपस्या।
उसकी मनःस्थिति मानो कह रही थी—
“सत्य के पथ पर जो बढ़ता है,
वह भय से नहीं, धैर्य से लड़ता है।”
यमराज का आगमन और तीन वरदान
तीसरे दिन के अंत में यमराज अपने भवन लौटे। द्वार पर एक तेजस्वी बालक को देख वे चकित रह गए। उनकी दिव्य दृष्टि ने क्षण भर में सब जान लिया।
वे स्वयं उसके समीप आए और गंभीर, किंतु करुण स्वर में बोले—
“हे ऋषिपुत्र! तुम धन्य हो। केवल अपने पिता के वचन की रक्षा के लिए तुम यहाँ तक चले आए। तीन दिन से मेरे द्वार पर बिना अन्न-जल के बैठे रहे—यह मेरे लिए लज्जा की बात है। अतः मैं तुम्हें तीन वरदान देता हूँ। पृथ्वी पर लौटने से पूर्व तुम तीन इच्छाएँ माँग सकते हो।”
नचिकेता ने विनम्रतापूर्वक प्रणाम किया। उसकी वाणी में आदर था—
“हे धर्मराज! आपकी कृपा के लिए मैं कृतज्ञ हूँ। यदि आपने तीन वर देने का वचन दिया है, तो प्रथम वर में मैं यही चाहता हूँ कि जब मैं पृथ्वी पर लौटूँ, तो मेरे पिताश्री का हृदय शांत हो। उनका क्रोध पूर्णतः समाप्त हो जाए। वे मुझे पहचानें, प्रेम से स्वीकार करें, और उनका मन सदा धर्म और सत्य में स्थित रहे।”
यमराज मुस्कराए।
“तथास्तु! तुम्हारे पिता का हृदय शांत होगा, और वे तुम्हें पहले से भी अधिक स्नेह करेंगे।”
फिर उन्होंने पूछा—
“अब बताओ, दूसरा वर क्या है?”
नचिकेताग्नि का रहस्य
नचिकेता ने गंभीर स्वर में कहा—
“हे धर्मराज! मैंने सुना है कि स्वर्गलोक में न वृद्धावस्था है, न भय, न मृत्यु। वहाँ देवता अमर भाव से निवास करते हैं। कृपया मुझे वह अग्निविद्या बताइए जिसके द्वारा मनुष्य स्वर्ग की प्राप्ति करता है। मैं उस दिव्य अग्नि का रहस्य जानना चाहता हूँ।”
यमराज क्षण भर के लिए स्तब्ध रह गए। इतना गूढ़ प्रश्न—और वह भी एक बालक के मुख से!
किन्तु वे वचनबद्ध थे। उन्होंने विस्तार से स्वर्गप्राप्ति की अग्नि-विद्या समझाई—यज्ञ की विधि, ईंटों की संख्या, आहुति का क्रम, और उसके प्रतीकात्मक अर्थ। नचिकेता ने सब कुछ ध्यानपूर्वक स्मरण कर लिया।
यमराज प्रसन्न होकर बोले—
“वत्स! आज से यह अग्नि ‘नचिकेताग्नि’ के नाम से जानी जाएगी। यह तुम्हारे नाम को अमर करेगी।”
तीसरा वर — मृत्यु का रहस्य
अब तीसरे वर की बारी थी।
नचिकेता ने स्थिर दृष्टि से यमराज को देखा और कहा—
“प्रभु, मनुष्य मृत्यु के बाद रहता है या नहीं—इस विषय में संदेह है। कुछ कहते हैं कि आत्मा रहती है, कुछ कहते हैं कि नहीं रहती। मैं आपसे आत्मा, जन्म और मरण का रहस्य जानना चाहता हूँ। यही मेरा तीसरा वर है।”
यह सुनकर यमराज गंभीर हो गए।
“हे बालक! यह प्रश्न देवताओं के लिए भी कठिन है। यह अत्यंत गूढ़ रहस्य है। तुम इतने छोटे हो—इस ज्ञान का क्या करोगे? इसके स्थान पर धन माँग लो, दीर्घायु माँग लो, राज्य माँग लो।”
नचिकेता शांत था—
“प्रभु, धन क्षणभंगुर है। दीर्घायु भी अंततः समाप्त हो जाती है। मैं उस सत्य को जानना चाहता हूँ जो मृत्यु से परे है।”
यमराज ने फिर समझाया—
“सृष्टि के अंत तक जीवित रहने का वरदान ले लो। स्वर्ग की अप्सराएँ, रथ, संगीत—जो चाहो ले लो।”
नचिकेता की वाणी में अद्भुत दृढ़ता थी—
“भोग क्षणिक हैं, ज्ञान शाश्वत है,
मैं क्षण नहीं, अनंत चाहता हूँ।”
“हे धर्मराज! अमर होकर भी यदि अज्ञान में रहूँ तो वह अमरता किस काम की? आपने ही तो मृत्यु का विधान बनाया है। मैं आपके नियम को असत्य नहीं करना चाहता। यदि यह रहस्य देवता भी नहीं जानते, तो मुझे विश्वास है कि आप ही इसे बताने में समर्थ हैं। कृपा कर मेरा तीसरा वर पूर्ण कीजिए।”
यमराज ने अनेक प्रकार के प्रलोभन दिए, यहाँ तक कि कुछ समय के लिए भीतर चले गए—मानो परीक्षा ले रहे हों। पर नचिकेता अडिग रहा, जैसे पर्वत।
आत्मा का दिव्य ज्ञान
अंततः यमराज प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा—
“वत्स! तुमने श्रेय (श्रेष्ठ मार्ग) को चुना है, प्रेय (भोग) को नहीं। इसलिए मैं तुम्हें वह ज्ञान दूँगा जो दुर्लभ है।”
उन्होंने समझाया—
उन्होंने बताया—
हृदय में अंगूठे के आकार के समान चेतना का प्रकाश है—वही परमात्मा का निवास है। जो इसे अपने भीतर अनुभव करता है, वह सबमें उसी प्रकाश को देखता है, इसलिए किसी से घृणा नहीं करता।
आत्मा का स्वरूप
यमदेव बोले—
“यह शरीर मिट्टी से बना है, और एक दिन मिट्टी में मिल जाएगा। परंतु जो इसमें निवास करता है—वह जीवात्मा—उसका कभी नाश नहीं होता। शरीर के नष्ट होने से आत्मा नष्ट नहीं होती।
यह आत्मा भोग-विलास में नहीं उलझती। उसे न सुख बाँध सकता है, न दुःख। वह नाशवान, जड़ और परिवर्तनशील शरीर से सर्वथा भिन्न है।
वह अनंत है, अनादि है, दोषरहित है। उसका कोई कारण नहीं, कोई कार्य नहीं।
उसका न जन्म होता है, न मृत्यु।”
फिर उन्होंने गूँजते स्वर में कहा—
“न जायते म्रियते वा कदाचित्,
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।”
“आत्मा कभी जन्म नहीं लेती और कभी मरती नहीं। वह सदा थी, सदा है, और सदा रहेगी।”
नचिकेता की आँखें श्रद्धा से झुक गईं। वह बोला—
“प्रभु! यदि आत्मा इतनी पवित्र और शाश्वत है, तो मनुष्य उसे क्यों नहीं पहचान पाता?”
🌧अज्ञान का परिणाम
यमराज ने समझाते हुए कहा—
“वत्स, जिस प्रकार वर्षा का जल एक ही होता है, परंतु पर्वतों पर गिरकर अलग-अलग दिशाओं में बहता है, विभिन्न रंग, रूप और गंध ग्रहण कर लेता है—उसी प्रकार एक ही परमात्मा से उत्पन्न जीव अज्ञान के कारण स्वयं को अलग-अलग मान बैठते हैं।
देव, असुर और मनुष्य—सब उसी एक स्रोत से जन्मे हैं, पर वे भगवान को अलग-अलग रूपों में देखते हैं और उसी अनुसार पूजा करते हैं।
अज्ञान के कारण वे जन्म-मरण के चक्र में भटकते रहते हैं—जैसे वर्षा का जल इधर-उधर बहता रहता है।”
फिर उन्होंने करुण स्वर में कहा—
“जो आत्मा-परमात्मा के सत्य को नहीं जानता, वह कर्मों के बंधन में बँधा रहता है। उसके पाप-पुण्य ही उसके अगले जन्म का मार्ग निर्धारित करते हैं।”
🔥 ब्रह्म का स्वरूप — सर्वत्र व्याप्त
नचिकेता ने फिर पूछा—
“प्रभु, ब्रह्म कैसा है? वह कहाँ और कैसे प्रकट होता है?”
यमराज के मुख पर दिव्य तेज झलक उठा—
“ब्रह्म प्राकृतिक गुणों से परे है। वह स्वयंप्रकाश है। उसे ‘वसु’ कहा गया है—जो सबमें वास करता है।
वह अतिथि बनकर हमारे घरों में आता है। यज्ञ की अग्नि में वही प्रकट होता है, आहुति देने वाले में भी वही है।
आकाश में, पृथ्वी में, जल में मछलियों में, वृक्षों में, अंकुरों में, औषधियों में, पर्वतों में, नदियों में—हर स्थान पर वही व्याप्त है।
जो कुछ भी दृष्टिगोचर है, वह उसी का विस्तार है।”
सभा में गूँजती उनकी वाणी मानो कह रही थी—
“जो उसे बाहर खोजता है, वह दूर भटकता है;
जो उसे भीतर देखता है, वह पा लेता है।”
आत्मा के जाने के बाद
नचिकेता ने अगला प्रश्न किया—
“प्रभु, जब आत्मा शरीर से निकल जाती है, तब शरीर में क्या रह जाता है?”
यमदेव ने उत्तर दिया—
“जब आत्मा प्रस्थान करती है, तो उसके साथ प्राण और इन्द्रिय-शक्ति भी चली जाती है। शरीर निर्जीव हो जाता है। परंतु परब्रह्म, जो सबमें व्याप्त है, वह कहीं नहीं जाता। वह तो हर चेतन और जड़ में सदा विद्यमान रहता है।”
🔄 मृत्यु के बाद की योनियाँ
“हे बालक! कर्म ही अगला जन्म निर्धारित करते हैं। अच्छे कर्म ऊँचे जन्म का मार्ग बनाते हैं, बुरे कर्म अधोगति का।
शास्त्र, गुरु, संगति, शिक्षा—इनसे मनुष्य ज्ञान प्राप्त करता है। पर यदि वह पाप में लिप्त रहता है, तो उसे निम्न योनियाँ मिलती हैं—पशु, पक्षी, वृक्ष, यहाँ तक कि स्थावर रूप भी।”
नचिकेता गंभीर हो गया।
“तो क्या मनुष्य ही मुक्ति का अधिकारी है?”
“हाँ, वत्स! मनुष्य-योनि ही आत्मज्ञान का द्वार है।”
🕉 आत्मज्ञान और ‘ॐ’ का रहस्य
अब यमराज का स्वर और भी गूढ़ हो गया—
“तुमने धर्म-अधर्म से परे, कार्य-कारण से परे, भूत-भविष्य-वर्तमान से परे जो तत्व पूछा है—वह परमात्मा है। उसका प्रतीक है ‘ॐ’।
अविनाशी प्रणव—‘ऊँ’—ही परब्रह्म का स्वरूप है।
सारे वेद, सारे मंत्र, सारे छंद उसी एक सत्य की ओर संकेत करते हैं।
जो ‘ॐ’ का ध्यान करता है, वह परमात्मा के निकट पहुँच जाता है।
यही सबसे श्रेष्ठ और अंतिम आश्रय है।”
उन्होंने कहा—
“ऊँकार वह सेतु है,
जो मृत्यु से अमरता तक ले जाता है।”
🌟 प्रेरणा
यमराज ने अंत में नचिकेता की ओर देखकर कहा—
“वत्स! तुमने प्रेय (भोग) नहीं, श्रेय (सत्य) को चुना। इसलिए तुम इस दुर्लभ ज्ञान के अधिकारी बने।”
नचिकेता की आँखों में संतोष का प्रकाश था। उसने मृत्यु के द्वार पर खड़े होकर अमरत्व का ज्ञान प्राप्त किया था।
🔔 प्रेरणास्पद संदेश
एक छोटे बालक की ऐसी दृढ़ इच्छाशक्ति देखकर स्वयं मृत्यु के देवता भी प्रसन्न हुए। नचिकेता केवल एक पात्र नहीं—वह जिज्ञासा, साहस और आत्मज्ञान का प्रतीक है।
स्वामी विवेकानंद ने कहा था—
“यदि मुझे नचिकेता जैसी इच्छाशक्ति वाले दस युवा मिल जाएँ, तो मैं देश की दिशा बदल सकता हूँ।”
नचिकेता हमें सिखाता है—
सत्य के लिए जियो।
प्रलोभनों से मत डिगो।
क्षणभंगुर सुख नहीं, शाश्वत ज्ञान माँगो।
क्योंकि—
“जो मृत्यु के रहस्य को जान लेता है,
वही वास्तव में जीवन को जानता है।”
संदेश
जो मृत्यु के द्वार पर भी सत्य के लिए अडिग रहे,
उसे अमर ज्ञान अवश्य मिलता है।
नचिकेता ज्ञान प्राप्त कर लौटा—पर अब वह केवल बालक नहीं था, वह सत्य का साधक था।
उसकी कथा आज भी सिखाती है—
“जो सत्य के लिए जले,
वही दीपक कहलाए।
जो मृत्यु से भी प्रश्न करे,
वही अमरत्व पाए।”