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छिलकों में छिपा अमृत

 

हस्तिनापुर की राजसभा उस दिन विशेष रूप से सजी हुई थी। स्वर्ण-स्तंभों पर दीपों की पंक्तियाँ जगमगा रही थीं, सुगंधित धूप की लहरियाँ वातावरण को मदमस्त कर रही थीं और राजमहल के प्रांगण में चाँदी की थालियों में छप्पन प्रकार के व्यंजन सजे थे। यह सब वैभव एक ही उद्देश्य से था—द्वारका के नाथ, योगेश्वर श्रीकृष्ण को प्रभावित करना।

 

कौरवों और पांडवों के बीच बढ़ती वैराग्नि को शांत करने के लिए स्वयं भगवान कृष्ण शांतिदूत बनकर हस्तिनापुर आए थे। वे चाहते थे कि रक्तपात न हो, भाई-भाई के बीच युद्ध न हो। परंतु दुर्योधन के मन में शांति नहीं, केवल अहंकार था। उसने सोचा—“यदि मैं श्रीकृष्ण को अपने वैभव से मोहित कर लूँ, तो वे अवश्य ही मेरे पक्ष में झुक जाएँगे।”

 

सभा में जब कृष्ण प्रवेश कर रहे थे, तो ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो शांति स्वयं कदम रख रही हो। उनके चरणों की ध्वनि में करुणा थी, नेत्रों में गहन गंभीरता और मुखमंडल पर दिव्य तेज।

 

दुर्योधन ने आदर का अभिनय करते हुए कहा,

“हे माधव! मेरे महल में आपके स्वागत के लिए सब व्यवस्था की गई है। कृपा कर मेरे साथ भोजन करें।”

 

कृष्ण ने उसकी ओर देखा। वह दृष्टि भेदक थी—मानो बाहरी आडंबर के पार उसके अंतर्मन को देख रही हो। वे शांत स्वर में बोले—

 

“दुर्योधन, भोजन के केवल दो कारण होते हैं—या तो खिलाने वाले के हृदय में प्रेम हो, या खाने वाले को अत्यंत भूख हो। यहाँ न तो तुम्हारे मन में मेरे प्रति प्रेम है और न ही मुझे भूख है। अतः तुम्हारा यह अहंकारी निमंत्रण मैं स्वीकार नहीं कर सकता।”

 

उनके शब्दों ने सभा के वैभव को एक क्षण में शून्य कर दिया। स्वर्ण-थालियाँ जैसे निस्तेज हो गईं। दुर्योधन का अभिमान घायल हुआ, पर वह मौन रह गया।

 

कृष्ण ने राजमहल की ओर एक बार भी मुड़कर नहीं देखा। वे सीधे उस मार्ग पर चल पड़े जहाँ वैभव नहीं, केवल सादगी थी—महात्मा विदुर का छोटा-सा घर।

 

 

 

विदुर का घर साधारण था—कच्ची दीवारें, मिट्टी का आँगन, और भीतर एक कोना जहाँ तुलसी का छोटा-सा चौरा था। उस समय विदुर घर पर नहीं थे। केवल उनकी पत्नी, सुलभा—जिन्हें सब स्नेह से विदुरानी कहते थे—घर के कामों में लगी थीं।

 

अचानक द्वार पर आहट हुई। उन्होंने बाहर आकर देखा—द्वार पर स्वयं द्वारिकाधीश खड़े हैं!

 

क्षण भर को उनकी साँस थम गई। आँखें फैल गईं। हाथ काँपने लगे।

“हे नाथ…! आप… मेरे द्वार पर?”

 

वे सुध-बुध खो बैठीं। न कोई स्वर्ण आसन, न चंदन, न आरती की थाली—कुछ भी तो नहीं था उनके पास। केवल एक निर्मल हृदय।

 

वे जल्दी से भीतर गईं, एक साधारण आसन बिछाया और काँपते हाथों से कहा, “प्रभु, कृपा कर बैठिए।”

 

कृष्ण मुस्कुराए। वह मुस्कान ऐसी थी जैसे स्वयं चंद्रमा किसी झोंपड़ी में उतर आया हो।

 

उन्होंने स्नेह से कहा,

“काकी, मुझे बड़ी भूख लगी है। जल्दी से कुछ खाने को दो।”

 

भगवान की भूख! यह सुनकर विदुरानी का हृदय और भी व्याकुल हो उठा। घर में न पकवान थे, न मिठाइयाँ। उन्होंने इधर-उधर देखा और कोने में रखे कुछ केले दिखाई दिए। वही उनका धन था, वही उनका अर्पण।

 

वे जल्दी-जल्दी केले लेकर आईं। आँखें कृष्ण के मुखकमल पर टिकी थीं। प्रेम की धारा इतनी प्रबल थी कि संसार का बोध लुप्त हो गया। वे केले छीलने लगीं—पर प्रेम की तल्लीनता में उन्होंने केला तो फेंक दिया और छिलका कृष्ण के हाथ में रख दिया।

 

कृष्ण ने देखा—यह छिलका नहीं, प्रेम का प्रसाद है।

 

उन्होंने बिना कुछ कहे, बड़े चाव से वह छिलका खाना शुरू कर दिया। उनके मुख पर ऐसा आनंद था मानो वे अमृत का पान कर रहे हों।

 

उनकी आँखों में भाव था—

 

“भक्त के भाव में जो मधुरता है,

वह स्वर्ग के रस में कहाँ?

जहाँ प्रेम की गंध बसती है,

वहीं मेरा सच्चा जहाँ।”

 

उसी समय विदुर घर लौटे। भीतर का दृश्य देखकर वे चौंक पड़े।

“अरी ओ पगली! यह तू क्या कर रही है? साक्षात भगवान को केले के छिलके खिला रही है!”

 

विदुरानी जैसे गहरी निद्रा से जागीं। उन्होंने देखा—केले का गूदा एक ओर पड़ा है और छिलके प्रभु के हाथ में! वे लज्जा से काँप उठीं। आँखों से अश्रुधारा बहने लगी।

 

“प्रभु! मुझसे कैसी भूल हो गई… मैं तो अज्ञानी हूँ…”

 

विदुर ने तुरंत केले का गूदा उठाकर कृष्ण को दिया। कृष्ण ने एक ग्रास खाया, फिर मुस्कुराकर बोले—

 

“विदुर जी, इस केले में वह स्वाद कहाँ जो काकी के उन छिलकों में था! वे छिलके केवल छिलके नहीं थे—वे शुद्ध प्रेम में डूबे हुए थे। प्रेम का जो रस उनमें था, वह किसी राजभोग में नहीं।”

 

फिर वे धीरे से बोले—

 

“न मेवा, न मिष्ठान मुझे,

न स्वर्ण-थाल की चाह।

भक्त-हृदय की एक कणिका,

मुझको करती है तृप्त अथाह।”

 

विदुरानी के आँसू अब लज्जा के नहीं, आनंद के थे। उस क्षण उनका छोटा-सा घर बैकुंठ से भी अधिक पावन हो उठा।

 

 

 

इस घटना ने संसार को एक अमर संदेश दिया—

 

भगवान को दिखावा प्रिय नहीं।

उन्हें महलों की ऊँचाई नहीं, हृदय की गहराई चाहिए।

वे दोष नहीं देखते, केवल भाव देखते हैं।

 

दुर्योधन के राजमहल में छप्पन भोग सजे थे, पर उनमें प्रेम का अंश नहीं था।

विदुरानी की झोपड़ी में केवल केले थे, पर उनमें आत्मा का समर्पण था।

 

तभी तो भक्त गाते हैं—

"सबसे ऊँची प्रेम सगाई,

दुर्योधन की मेवा त्यागी।

साग विदुर घर खाई…”

 

और सच ही तो है—

जहाँ प्रेम है, वहीं भगवान हैं।

जहाँ अहंकार है, वहाँ केवल शून्यता।

 

उस दिन हस्तिनापुर ने देख लिया—

स्वर्ण से बड़ा हृदय है,

भोग से बड़ा भाव है!!