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अहंकार की रस्सी और भक्ति की नाव
एक शांत संध्या का समय था। आश्रम के प्रांगण में मंद-मंद हवा बह रही थी। दूर आकाश में अस्त होता सूर्य अपनी अंतिम किरणों से वातावरण को स्वर्णिम बना रहा था। उसी समय आचार्य श्री अनंतदास अपने प्रिय शिष्य माधव को जीवन का एक गूढ़ रहस्य समझाने के लिए एक कथा कहने लगे।
उन्होंने कहा—एक विशाल, निर्मल और सदाबहार नदी थी। उसका जल शांत दिखाई देता था, पर उसकी गहराई में अनगिनत रहस्य छिपे थे। नदी के दोनों तटों पर दो सुंदर नगर बसे हुए थे। एक तट पर वैभव और ऐश्वर्य से परिपूर्ण एक राज्य था, जहाँ समरवीर नाम का राजा रहता था। दूसरे तट पर एक भव्य और प्राचीन देवालय स्थित था, जिसकी शिखर आकाश को छूते प्रतीत होते थे। उस मंदिर की घंटियों की ध्वनि दूर-दूर तक भक्ति का संदेश देती थी।
राजा समरवीर अत्यंत सामर्थ्यवान था, पर उसके हृदय में अहंकार का निवास था। वह अपने प्रत्येक कार्य में अपनी श्रेष्ठता का प्रदर्शन करता। उसे अपने पद, वैभव और सामर्थ्य पर अत्यधिक गर्व था। उसी राज्य में गोपाल नाम का एक सेवक भी रहता था। गोपाल सरल, विनम्र और भगवान के प्रति समर्पित था। उसके पास धन नहीं था, पर हृदय में भक्ति का अथाह खजाना था।
एक दिन दोनों नदी के तट पर पहुँचे। राजा के मन में मंदिर के दर्शन की इच्छा जागी। रात का समय था। चाँदनी नदी के जल पर चाँदी की परत-सी बिछा रही थी। वहाँ दो नावें बंधी थीं। राजा एक नाव पर सवार हुआ और गोपाल दूसरी नाव पर।
रात्रि गहराती गई। चारों ओर सन्नाटा छा गया। केवल चप्पुओं की आवाज़ और जल की हल्की लहरें सुनाई दे रही थीं। राजा पूरी शक्ति से चप्पू चलाता रहा। उसके माथे पर पसीना छलक आया। उसे विश्वास था कि उसकी शक्ति और परिश्रम उसे अवश्य ही उस पार पहुँचा देंगे। परंतु रात बीतती रही और किनारा दूर ही रहा।
उधर गोपाल ने शांत मन से भगवान का स्मरण करते हुए नाव आगे बढ़ाई। उसके हृदय में न कोई घमंड था, न कोई उतावलापन। वह हर चप्पू के साथ ईश्वर का नाम लेता जाता। कुछ ही समय में वह मंदिर पहुँच गया। उसने श्रद्धा से दर्शन किए, प्रार्थना की, और प्रभु के चरणों में कृतज्ञता अर्पित की।
जब भोर हुई और सूर्य की पहली किरणें फैलीं, तब राजा ने देखा कि वह वहीं है, जहाँ से चला था। उसके परिश्रम के बावजूद नाव एक कदम भी आगे नहीं बढ़ी थी। उसी समय उसने गोपाल को मंदिर से लौटते देखा। गोपाल के चेहरे पर अद्भुत शांति और आनंद झलक रहा था।
राजा के मन में आश्चर्य और व्याकुलता उत्पन्न हुई। वह सोच में पड़ गया कि इतना प्रयास करने के बाद भी वह क्यों नहीं पहुँच पाया। तभी ज्ञात हुआ कि उसकी नाव तो अभी भी उसी खूंटे से बंधी थी। उसने पूरी रात चप्पू चलाया, पर रस्सी खोलना भूल गया।
आचार्य अनंतदास ने माधव को समझाया कि यही मनुष्य जीवन का सत्य है। मनुष्य दिन-रात परिश्रम करता है, साधन जुटाता है, पूजा-पाठ करता है, परंतु यदि उसके भीतर अहंकार की रस्सी बंधी रहे, तो वह आध्यात्मिक लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकता। अहंकार वह खूंटा है, जो हमें बाँधकर रखता है। आसक्ति वह रस्सी है, जो आगे बढ़ने नहीं देती।
जब तक व्यक्ति स्वयं को केंद्र में रखता है, तब तक उसकी नाव उसी तट पर बंधी रहती है। जैसे ही वह स्वयं को हटाकर ईश्वर को आगे रखता है, वैसे ही उसकी यात्रा सरल हो जाती है। भगवान के दरबार में पद, प्रतिष्ठा या अधिकार का कोई मूल्य नहीं; वहाँ केवल विनम्रता और समर्पण का महत्व है।
जो स्वयं को राजा मानता है, वह दूरी में ही भटकता रहता है। जो स्वयं को दास मानकर चलता है, वही सच्चे अर्थों में प्रभु के समीप पहुँचता है। जीवन की सफलता शक्ति में नहीं, समर्पण में है। परिश्रम आवश्यक है, पर उससे पहले अहंकार की गाँठ खोलना और आसक्ति की रस्सी काटना और भी आवश्यक है।
कथा समाप्त हुई तो माधव की आँखों में समझ का प्रकाश झलक रहा था। उसे ज्ञात हो चुका था कि साधना की नाव को आगे बढ़ाने से पहले भीतर की रस्सियाँ खोलनी पड़ती हैं।
और सच ही तो है—जब तक हम स्वयं को आगे रखेंगे, तब तक दूरी बनी रहेगी। जैसे ही हम कहेंगे कि सब कुछ उसी का है, उसी से है और उसी के लिए है, तब जीवन की नाव सहज ही परम लक्ष्य की ओर बढ़ने लगेगी।
हरे कृष्ण।