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कृपा का अदृश्य स्पर्श

 

देवलोक में एक दिन अद्भुत शांति थी। वीणा की मधुर तान के बीच देवर्षि नारद के मन में एक सूक्ष्म प्रश्न लहर की तरह उठ खड़ा हुआ। वे लोक-लोकांतरों में भ्रमण करते हुए पृथ्वी के अनेक दृश्य देख चुके थे। कहीं अभाव में जीते भक्त, तो कहीं वैभव में डूबे वे लोग जो ईश्वर को स्मरण भी न करते थे। उनके मन में जिज्ञासा ने आकार लिया।

 

वे श्रीहरि के चरणों में पहुँचे और अत्यंत विनम्रता से बोले कि उनके मन में एक शंका जन्मी है—क्यों अक्सर सच्चे भक्त कठिनाइयों से घिरे रहते हैं, जबकि जो प्रभु को मानते भी नहीं, वे ऐश्वर्य से परिपूर्ण दिखाई देते हैं? यह कैसी लीला है?

 

श्रीहरि ने मंद मुस्कान से उनकी ओर देखा। वह मुस्कान करुणा और गहन रहस्य से भरी थी। उन्होंने संकेत किया कि कृपा को केवल बाहरी आँखों से नहीं, बल्कि अंतर की दृष्टि से समझना पड़ता है। और फिर वे स्वयं साधु-वेश धारण कर नारद के साथ पृथ्वी पर उतर आए, ताकि प्रश्न का उत्तर शब्दों से नहीं, अनुभव से दिया जा सके।

 

पहला द्वार — वैभव का बंधन

 

रात्रि का समय था। नगर के मध्य एक भव्य भवन चमक रहा था। संगमरमर की दीवारें, ऊँचे फाटक, और पहरेदारों की कतार—यह था धनाढ्य व्यापारी धनपाल का घर। उसके पास अपार संपत्ति थी, पर हृदय में करुणा का स्थान संकीर्ण था।

 

दो साधु-वेशधारी अतिथि उसके द्वार पर पहुँचे। उन्होंने विनम्रता से कुछ अन्न की याचना की। द्वार खुला, और सामने आया धनपाल—आडंबर से भरा, गर्व से तना हुआ। साधुओं को देखकर उसके मुख पर तिरस्कार की रेखाएँ उभर आईं। उसने उन्हें कठोर शब्दों से अपमानित किया और अपने द्वार से दूर कर दिया।

 

नारद का हृदय क्षोभ से भर उठा। उन्हें लगा कि ऐसे व्यक्ति को दंड मिलना चाहिए। परंतु श्रीहरि के मुख पर वही शांति थी। उन्होंने उस व्यापारी को आशीर्वाद दिया कि उसका धन और बढ़े, उसकी तिजोरियाँ कभी खाली न हों।

 

नारद स्तब्ध रह गए। उन्हें लगा मानो न्याय का तराजू उलट गया हो।

 

“धन का दीपक जितना जलता,

उतना ही छाया गहराती है।

जिस मन में ‘मैं’ का अंधेरा हो,

वहाँ कृपा छिपी रह जाती है।”

 

दूसरा द्वार — प्रेम का प्रकाश

 

कुछ दूर एक कच्ची पगडंडी के अंत में एक छोटी-सी झोपड़ी थी। वहाँ रहती थी वृद्धा गोमती। जीवन में उसका सहारा बस एक गौ माता थी और प्रभु का नाम। उसकी झोपड़ी में वैभव नहीं था, पर भक्ति की सुगंध थी।

 

जब दो साधु उसके द्वार पर पहुँचे, तो वह आनंद से भर उठी। उसने उन्हें आसन दिया, चरण धोए, और अपनी एकमात्र गाय का दूध प्रेमपूर्वक अर्पित किया। उसकी आँखों में श्रद्धा थी, स्वर में अपनापन, और हृदय में पूर्ण समर्पण।

 

नारद का मन पिघल गया। उन्हें लगा, यही तो सच्ची भक्त है—जिसके पास कुछ नहीं, फिर भी देने का भाव असीम है। उन्होंने मन ही मन कामना की कि प्रभु इसे सुख-समृद्धि से भर दें।

 

श्रीहरि ने मौन सहमति दी—पर उसी क्षण उस गाय के प्राण हर लिए गए।

 

नारद के हृदय में वेदना की लहर उठी। यह दृश्य उन्हें विचलित कर गया। जिस गाय को वह वृद्धा अपने जीवन का आधार मानती थी, वही उससे छिन गई।

 

“कभी-कभी जो छिन जाता है,

वही सबसे बड़ा उपहार होता है।

जो टूटता है बाहर से,

भीतर वही आधार होता है।”

 

रहस्य का उद्घाटन

 

नारद के मुख पर व्याकुलता स्पष्ट थी। तब श्रीहरि ने करुणा से समझाया कि गोमती का जीवन अंत के समीप है। यदि उसकी गाय जीवित रहती, तो मृत्यु के समय उसका मन उसी में उलझ जाता। स्मरण प्रभु का नहीं, उस एकमात्र सहारे का होता। और मनुष्य जिस भाव से देह त्यागता है, उसी भाव में बंध जाता है।

 

गाय का वियोग उसके लिए पीड़ा अवश्य है, पर वही उसे अंतिम क्षण में पूर्णतः प्रभु-स्मरण की ओर मोड़ देगा। यह हानि नहीं, उसकी मुक्ति का मार्ग है।

 

फिर श्रीहरि ने धनपाल की ओर संकेत किया। उसका मन धन से बंधा है। मरते समय उसकी चेतना तिजोरियों और संपत्ति में अटकी रहेगी। वही आसक्ति उसे पुनर्जन्म के बंधन में डाल देगी। बाहरी वृद्धि वास्तव में उसके भीतर के बंधन को और दृढ़ कर रही है।

 

नारद की आँखों में समझ का प्रकाश उतर आया। उन्हें ज्ञात हुआ कि ईश्वर की कृपा का स्वरूप अक्सर मनुष्य की समझ से परे होता है।

 

“कृपा का स्पर्श अदृश्य होता है,

वह आँसुओं में भी मुस्कान बो देता है।

जो छूटे उससे मत घबराओ,

हर वियोग मुक्ति संजो देता है।”

 

अंतिम संदेश

 

श्रीहरि ने अंत में समझाया कि मनुष्य मरते समय जिस वस्तु, व्यक्ति या भाव से सबसे अधिक जुड़ा होता है, वही उसके अगले जन्म का कारण बनता है। इसलिए सच्ची भक्ति पाने में नहीं, छोड़ देने में है।

 

कभी-कभी निर्धनता, वियोग और अभाव—ये सब दंड नहीं, बल्कि छिपी हुई कृपा होते हैं। प्रभु अपने प्रियजनों से वह सब दूर कर देते हैं जो उन्हें उनसे दूर कर सकता है। और जो प्रभु से दूर हैं, उन्हें वही मिलता है जो उन्हें और बाँध दे।

 

नारद की वीणा फिर बज उठी। अब उसमें प्रश्न नहीं, अनुभव की गहराई थी। उन्होंने समझ लिया था कि—

 

“जो दिखे वही सत्य नहीं,

जो मिले वही लाभ नहीं।

प्रभु की लीला गहन अनोखी,

हर छाया में भी अभिशाप नहीं।”

 

और उस दिन से नारद जब भी किसी भक्त को अभाव में देखते, तो मुस्कुरा देते—क्योंकि उन्हें ज्ञात हो चुका था कि शायद वहाँ अदृश्य कृपा का सबसे गहरा स्पर्श छिपा है।

 

जय श्रीहरि। 🙏