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🌺 भक्ति का रहस्य: जब भगवान स्वयं भक्त बन जाते हैं🌺
एक समय की बात है।
देवर्षि नारद मुनि अपनी वीणा के मधुर स्वर बिखेरते हुए अयोध्या में भगवान श्रीराम के द्वार पर पहुँचे।
“नारायण… नारायण…” का पावन उच्चारण करते हुए उन्होंने देखा कि द्वार पर हनुमान जी प्रहरी बनकर खड़े हैं—पूर्ण विनय, पूर्ण सतर्कता और पूर्ण समर्पण के साथ।
नारदजी ने मुस्कुराते हुए पूछा,
“हनुमान! आज प्रभु क्या कर रहे हैं?”
हनुमान जी ने सरलता से उत्तर दिया,
“मुनिवर, इतना ही जानता हूँ कि प्रभु किसी बही-खाते में कुछ लिख रहे हैं।”
नारदजी को आश्चर्य हुआ।
“भगवान और बही-खाता? यह तो किसी मुनीम का काम होता है!”
हनुमान जी ने हाथ जोड़कर कहा,
“आप स्वयं जाकर देख लीजिए, प्रभु का कार्य प्रभु ही जानते हैं।”
📜 भक्तों की बही-खाता
नारद मुनि भीतर पहुँचे।
उन्होंने देखा—भगवान श्रीराम गंभीर मुद्रा में एक बही में कुछ लिख रहे हैं।
नारदजी ने विनोदपूर्वक कहा,
“प्रभु! आप यह लेखा-जोखा स्वयं क्यों करते हैं? किसी और को यह काम सौंप दीजिए।”
श्रीराम मुस्कुराए और बोले,
“नारद, यह कार्य मैं किसी को नहीं सौंप सकता।”
“ऐसा कौन-सा महत्वपूर्ण लेखा है प्रभु?” नारदजी ने जिज्ञासा से पूछा।
भगवान ने कहा,
“इस बही में मैं उन भक्तों के नाम लिखता हूँ जो प्रतिपल मुझे स्मरण करते हैं—जो मुझे जीभ से भजते हैं। मैं उनकी नित्य हाजिरी लगाता हूँ।”
नारदजी ने उत्सुक होकर बही खोली।
उन्होंने देखा—सबसे ऊपर नारद मुनि का नाम लिखा था।
उनका हृदय गर्व से भर गया।
पर तभी उनकी दृष्टि ठहर गई…
पूरी बही में हनुमान जी का नाम कहीं नहीं था।
नारदजी चकित रह गए।
“यह कैसे हो सकता है? जो प्रभु के सबसे प्रिय हैं, उनका नाम ही नहीं?”
🌼 हनुमान की विनम्रता
नारद मुनि बाहर आए और हनुमान जी से बोले,
“हनुमान! प्रभु की बही में सभी भक्तों के नाम हैं, पर तुम्हारा नाम नहीं है।”
हनुमान जी ने सहज भाव से कहा,
“मुनिवर, यदि प्रभु ने मेरा नाम योग्य नहीं समझा, तो अवश्य ही कोई कारण होगा। इसमें दुख की क्या बात?”
फिर हनुमान जी ने धीरे से कहा,
“हाँ, प्रभु एक और दैनंदिनी भी रखते हैं…”
नारदजी चौंक पड़े।
“एक और?”
“हाँ,” हनुमान बोले,
“उसमें प्रभु कुछ और ही लिखते हैं।”
📖 भगवान की दैनंदिनी
नारद मुनि पुनः श्रीराम के पास पहुँचे।
“प्रभु! मैंने सुना है कि आप एक और दैनंदिनी रखते हैं। उसमें क्या लिखते हैं?”
श्रीराम मुस्कुराए,
“नारद, वह तुम्हारे लिए नहीं है।”
नारद मुनि का मन अब अत्यंत व्याकुल हो उठा था।
उन्होंने विनयपूर्वक प्रभु श्रीराम से कहा—
“प्रभु! कृपा कर बताइए… मैं स्वयं देखना चाहता हूँ कि आप उस दैनंदिनी में क्या लिखते हैं?”
भगवान श्रीराम मंद-मंद मुस्कुराए। वह मुस्कान करुणा, प्रेम और गूढ़ रहस्य से भरी हुई थी।
उन्होंने शांत स्वर में कहा—
“मुनिवर, इस दैनंदिनी में मैं उन भक्तों के नाम लिखता हूँ,
जिन्हें मैं स्वयं नित्य भजता हूँ।”
यह सुनते ही नारद मुनि स्तब्ध रह गए।
भगवान… और भक्त?
उनके लिए यह वाक्य ही साधारण नहीं था।
कंपते हाथों से नारदजी ने दैनंदिनी खोली।
जैसे ही उनके नेत्र पहले पृष्ठ पर पड़े—
सबसे ऊपर केवल एक ही नाम लिखा था… ‘हनुमान’।
न कोई अलंकार,
न कोई विशेषण,
न कोई उपाधि—
बस हनुमान।
उस क्षण नारद मुनि का समस्त अभिमान, समस्त गर्व, समस्त आत्ममुग्धता
ओस की बूँद की तरह विलीन हो गई।
उनकी आँखों से अश्रु बह चले—
ये अश्रु लज्जा के नहीं,
बोध के थे।
🌼 भक्ति का गूढ़ रहस्य
नारद मुनि को अब सत्य स्पष्ट दिखने लगा था—
पर हनुमान जी…
वे प्रभु का नाम लेते नहीं थे,
वे प्रभु का नाम जीते थे।
हनुमान जी की भक्ति में
न कोई मांग थी,
न कोई दावा,
न कोई अपेक्षा।
उनका प्रत्येक श्वास—राम था,
प्रत्येक कर्म—राम के लिए था,
और उनका सम्पूर्ण अस्तित्व—राम को समर्पित था।
🌟 कथा का सार और संदेश
इस कथा का गूढ़ तात्पर्य अत्यंत गहन और जीवन को दिशा देने वाला है—
🔹 जो भक्त भगवान को केवल जीभ से भजते हैं,
उन्हें प्रभु अपना भक्त मानते हैं।
🔹 लेकिन जो भक्त भगवान को हृदय से भजते हैं,
जिनकी चेतना, कर्म और जीवन ही भक्ति बन जाते हैं—
उन भक्तों के प्रभु स्वयं भक्त बन जाते हैं।
ऐसे भक्तों का नाम
किसी साधारण बही-खाते में नहीं,
भगवान अपने हृदय रूपी विशेष सूची में अंकित करते हैं।
🌺 अंतिम प्रेरणा
सच्ची भक्ति
दिखाई नहीं देती—
वह अनुभव की जाती है।
जहाँ अहंकार मिट जाता है,
वहीं भक्ति आरंभ होती है।
और जहाँ भक्ति पूर्ण होती है,
वहीं भगवान स्वयं झुक जाते हैं।
🙏हनुमान जी हमें सिखाते हैं—
भक्त बनने से बड़ा सौभाग्य है,
पर भगवान का भक्त बन जाना—
भक्ति की परम सिद्धि है। 🌸
यह कथा हमें सिखाती है कि—
हनुमान जी की भक्ति बोलती नहीं, जीती है।
और ऐसी भक्ति के सामने स्वयं भगवान भी नतमस्तक हो जाते हैं।
🙏सच्ची भक्ति वही है, जिसमें भक्त अपने अस्तित्व को भूल जाए—और भगवान उसे कभी न भूलें।