+91 8005792734
Contact Us
Contact Us
amita2903.aa@gmail.com
Support Email
Jhunjhunu, Rajasthan
Address
(८१)
“जब कन्हैया ने बाँहों में उठाया”
रसोई में तवा तप रहा था। आटे की सोंधी खुशबू घर में फैल रही थी। एक माँ अपने छोटे-से संसार में खोई, रोटियाँ बेलते-बेलते धीरे-धीरे जप कर रही थी—
“ॐ भगवते वासुदेवाय नमः…”
उसके पास अलग से पूजा का समय कहाँ था? सुबह से रात तक घर, बच्चे, जिम्मेदारियाँ… बस काम करते-करते ही वही उसका मंदिर था, वही उसकी आरती, वही उसका ध्यान।
उसकी आवाज़ धीमी थी, पर विश्वास गहरा—
“हाथों में आटा, मन में तू,
मेरे कन्हैया बस साथ तू…”
अचानक—
धड़ाम!!!
और फिर एक दिल दहला देने वाली चीख।
उसका कलेजा जैसे किसी ने मुठ्ठी में भींच लिया। हाथ से बेलन गिरा, रोटी तवे पर जलने लगी। वह भागी… आँगन की ओर।
वहाँ… आठ साल का चुन्नू… उसका लाल… चित्त पड़ा था। माथे से खून बह रहा था।
उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया।
मन हुआ कि फूट-फूट कर रो दे।
पर घर में और कोई नहीं था।
उसकी चीख किसे बुलाती?
चुन्नू आधी बेहोशी में बस एक ही शब्द दोहरा रहा था—
“माँ… माँ…”
उस पुकार में दर्द था, भरोसा था, और एक अदृश्य डोर थी जो उसे टूटने नहीं दे रही थी।
माँ की आँखों से आँसू बह निकले, पर पाँव ठिठके नहीं।
दस दिन पहले ही उसका अपेंडिक्स का ऑपरेशन हुआ था। टाँके अभी हरे थे। सीढ़ियाँ चढ़ते-उतरते भी दर्द होता था।
पर उस क्षण…
“ममता जब जागे,
तो पर्वत भी झुक जाए,
माँ की बाहों में
हर दुख रुक जाए…”
ना जाने कहाँ से शक्ति आई। उसने चुन्नू को गोद में उठाया। बीस-बाईस किलो का बच्चा उस दिन उसे रुई-सा हल्का लगा।
वह भागी… आधा किलोमीटर दूर नर्सिंग होम तक।
दर्द से उसका पेट जल रहा था, सांसें टूट रही थीं, पर कदम रुक नहीं रहे थे।
रास्ते भर वह बड़बड़ाती रही—
“हे कन्हैया! क्या बिगाड़ा था मैंने तुम्हारा? मेरे ही बच्चे को क्यों? अगर उसे कुछ हो गया तो मैं तुम्हें कभी माफ़ नहीं करूँगी… सुन रहे हो ना? तुम बस मुस्कुराते रहते हो, आज क्यों चुप हो?”
आँसू, गुस्सा, डर… सब मिलकर उसके विश्वास को चुनौती दे रहे थे।
नर्सिंग होम पहुँची तो डॉक्टर साहब अभी भी वहीं थे, जबकि उनका समय दोपहर दो बजे तक का था। घड़ी में साढ़े तीन बज रहे थे।
जैसे किसी ने उन्हें रोक रखा हो।
इलाज तुरंत शुरू हुआ।
जाँच के बाद डॉक्टर ने कहा—
“घबराने की बात नहीं है, चोट ऊपर-ऊपर की है। बच्चा बिल्कुल ठीक हो जाएगा।”
उसने राहत की साँस ली।
ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके काँपते कंधों पर हाथ रखकर कहा हो—
“मैं हूँ ना…”
रात को घर लौटी तो सब सामान्य था। चुन्नू हँस रहा था, टीवी देख रहा था। पर उसका मन शांत नहीं था।
उसे अपने शब्द याद आ रहे थे।
वह शिकायतें… वह तकरार…
अचानक उसे सुबह की एक छोटी-सी बात याद आई—
कल ही तो पुराने चापाकल का जंग लगा पाइप आँगन से हटवाया था।
ठीक वहीं चुन्नू गिरा था।
अगर वह पाइप वहीं होता…?
उसका हाथ अपने पेट के टाँकों पर गया।
“मैंने उसे उठाया कैसे? मैं तो कपड़ों की बाल्टी तक नहीं उठा पाती…”
उसकी आँखें फैल गईं।
वह समझने लगी थी—
“जिसे मैं अपनी ताकत समझी,
वो तेरी कृपा थी।
जिसे मैं संयोग कहती रही,
वो तेरी व्यवस्था थी…”
टीवी पर अचानक प्रवचन की आवाज़ गूँजी—
“प्रभु कहते हैं: मैं तुम्हारे आने वाले संकट रोक नहीं सकता, लेकिन तुम्हें इतनी शक्ति दे सकता हूँ कि तुम आसानी से उन्हें पार कर सको। तुम्हारी राह आसान कर सकता हूँ। बस धर्म के मार्ग पर चलते रहो।”
उसकी रूह काँप उठी।
क्या यह उत्तर था?
वह धीरे-धीरे घर के मंदिर तक गई।
दीया हल्के-हल्के जल रहा था।
और उसे लगा—
कन्हैया मुस्कुरा रहे हैं।
उसकी आँखों से आँसू टपक पड़े।
वह हाथ जोड़कर बोली—
“मुझे माफ़ कर देना कान्हा… दर्द में मैं तुझे भूल गई थी। तूने मेरा संकट नहीं हटाया, पर उसे पार करने की ताकत दे दी। आज समझ गई हूँ—माँ मैं हूँ, पर शक्ति तू है…”
उस रात उसने फिर वही जप किया—
“ॐ भगवते वासुदेवाय नमः…”
पर आज आवाज़ में शिकायत नहीं, समर्पण था।
डर नहीं, विश्वास था।
और उसे भीतर से स्पष्ट सुनाई दिया—
“मैं तुम्हारे हर आँसू में हूँ,
हर परीक्षा में हूँ।
संकट आएगा,
पर तुम्हें गिरने नहीं दूँगा…”
उस दिन एक माँ ने जाना—
भगवान संकट नहीं रोकते,
पर माँ की बाहों में अपनी शक्ति भर देते हैं।