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(८२)
“खाली डिब्बे का रहस्य”
दोपहर की हल्की धूप थी। बाज़ार में चहल-पहल थी, पर एक कोने की छोटी-सी दुकान में शांति बसी हुई थी। लकड़ी की अलमारियों में सजे छोटे-बड़े डिब्बे जैसे अपनी-अपनी कहानी कह रहे हों। तभी एक तेजस्वी संन्यासी धीरे-धीरे चलते हुए वहाँ पहुँचे। उनके चरणों की आहट भी जैसे कोई संदेश लेकर आई थी।
उन्होंने एक डिब्बे की ओर इशारा किया—
“इसमें क्या है, वत्स?”
दुकानदार ने विनम्रता से उत्तर दिया, “महाराज, इसमें नमक है।”
“और इसमें?”
“इसमें हल्दी है।”
संन्यासी एक-एक डिब्बे की ओर इशारा करते जाते, और दुकानदार हर बार अलग-अलग वस्तुओं का नाम बताता जाता—मिर्च, धनिया, चावल, दाल… दुकान मानो संसार की तरह थी—हर डिब्बे में कुछ न कुछ भरा हुआ।
आख़िर में, कोने में रखा एक पुराना-सा डिब्बा बचा।
संन्यासी ने पूछा, “और उस अंतिम डिब्बे में क्या है?”
दुकानदार मुस्कुराया, उसकी आँखों में एक अनोखी चमक थी।
“महाराज, उसमें ‘राम-राम’ है।”
संन्यासी चौंक उठे—
“राम-राम? यह कैसी वस्तु है?”
दुकानदार ने धीरे से वह डिब्बा खोला। वह बिल्कुल खाली था।
“महात्मन,” उसने श्रद्धा से कहा, “जब डिब्बा खाली होता है, तो हम उसे ‘खाली’ नहीं कहते। हम कहते हैं—उसमें ‘राम-राम’ है। क्योंकि जो खाली है, वही तो राम के लिए स्थान बनाता है।”
क्षणभर के लिए समय जैसे ठहर गया। संन्यासी की आँखें खुली रह गईं। वर्षों की तपस्या, अनगिनत यात्राएँ… पर यह सरल सत्य आज एक साधारण दुकानदार ने समझा दिया।
वह सोचने लगे—
“मैं भी तो अपने मन को ज्ञान, तर्क, शास्त्रों और विचारों से भरता रहा।
पर क्या मैंने उसे कभी खाली किया?
क्या उसमें राम के लिए स्थान छोड़ा?”
दुकान की वह साधारण-सी जगह उस क्षण तपोभूमि बन गई।
मन का डिब्बा
हम सबके भीतर भी अनेक डिब्बे हैं—
कहीं लोभ भरा है,
कहीं अहंकार,
कहीं ईर्ष्या की हल्दी,
कहीं क्रोध की मिर्च।
जब मन इन सब से भरा रहता है, तो ईश्वर कहाँ समाए?
“मन मंदिर जब स्वच्छ हो, तब दीपक खुद जल जाय,
खाली घट में राम हैं, भरे में कौन समाय।”
संन्यासी की आँखों से कृतज्ञता के आँसू बह निकले। उन्होंने दुकानदार को प्रणाम किया। आज वे देने नहीं, लेने आए थे—और उन्हें जीवन का अमूल्य सत्य मिल गया।
भाव का सार
राम कोई केवल नाम नहीं, वह तो शुद्धता का प्रतीक है।
राम वहाँ बसते हैं जहाँ सरलता है,
जहाँ निर्मलता है,
जहाँ अहंकार का भार नहीं है।
“जहाँ न छल की छाया हो, न मन में हो अभिमान,
ऐसे निर्मल हृदय में बसते हैं भगवान।”
कभी-कभी जीवन की सबसे बड़ी सीख किसी बड़े आश्रम या ग्रंथ से नहीं, बल्कि एक छोटी-सी दुकान से मिलती है।
संन्यासी आगे बढ़ गए, पर अब उनकी चाल में एक नई विनम्रता थी।
उन्होंने समझ लिया था—
“राम-राम उच्चार संग, राम-राम का घोष,
राम-राम मन भावना, राम-राम मन तोष।
मन को कर दो शून्य जब, मिट जाए सब भ्रम-धाम,
खालीपन ही से प्रकट हों, अंतर्यामी राम।”
और सच ही तो है—
जब हम अपने मन का डिब्बा खाली कर देते हैं,
तभी उसमें प्रेम, शांति और परमात्मा का प्रकाश भर पाता है।