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मत्स्यावतार की तीन कथाएँ

 

(१) राजा सत्यव्रत की भक्ति और मत्स्यावतार

 

 

बहुत प्राचीन समय की बात है। जब सृष्टि के रचयिता ब्रह्माजी का विश्राम करने का समय आया, तब उन्हें गहरी नींद आने लगी। उसी समय एक अद्भुत घटना घटी। ब्रह्माजी के मुख से वे पवित्र वेद निकल पड़े, जिनमें समस्त ज्ञान और धर्म का रहस्य समाया हुआ था।

 

उसी समय वहाँ पास ही रहने वाला एक दैत्य हयग्रीव अवसर की तलाश में था। उसने चुपके से उन वेदों को चुरा लिया और उन्हें लेकर समुद्र में जा छिपा।

 

उधर ब्रह्माजी की रात्रि के कारण नैमित्तिक प्रलय का समय भी आ गया। चारों ओर जल ही जल फैल गया। तीनों लोक समुद्र के जल में डूब गए। सृष्टि मानो शून्य हो गयी थी।

 

परन्तु सृष्टि के रक्षक भगवान विष्णु सब कुछ देख रहे थे। वे समझ गए कि हयग्रीव ने वेदों का अपहरण कर लिया है और संसार अज्ञान में डूब जाएगा। वेदों की रक्षा करने और सृष्टि को बचाने के लिए भगवान ने एक अद्भुत रूप धारण करने का निश्चय किया — मत्स्यावतार।

 

सत्यव्रत की भक्ति

दक्षिण भारत के द्रविड़ देश में राजर्षि सत्यव्रत नाम के एक महान और धर्मात्मा राजा रहते थे। वे अत्यंत भक्तिमान थे और भगवान के प्रति उनका प्रेम अपार था।

 

वे मलय पर्वत के एक शिखर पर रहकर कठोर तपस्या कर रहे थे। वे केवल जल पीकर ही जीवन व्यतीत करते और दिन-रात भगवान का ध्यान करते। यही सत्यव्रत आगे चलकर वैवस्वत मनु बने।

 

एक दिन प्रातःकाल वे कृतमाला नदी के तट पर खड़े होकर पितरों के लिए तर्पण कर रहे थे। उन्होंने अपनी अंजलि में जल भरा ही था कि अचानक उसमें एक छोटी-सी मछली आ गयी।

 

राजा ने उसे जल के साथ नदी में छोड़ दिया।

 

तभी वह छोटी-सी मछली मानो प्रार्थना करती हुई बोली—

“राजन्! मुझे मत छोड़िए। इस नदी में बड़ी-बड़ी मछलियाँ और जलचर मुझे खा जाएँगे। कृपया मेरी रक्षा कीजिए।”

 

उसकी करुण आवाज सुनकर सत्यव्रत का हृदय दया से भर गया। उन्होंने उस छोटी-सी मछली को अपने कमण्डलु में रख लिया।

 

रहस्यमय बढ़ती हुई मछली

परन्तु थोड़ी ही देर में वह मछली इतनी बड़ी हो गयी कि कमण्डलु में उसके लिए स्थान ही नहीं रहा।

 

राजा ने आश्चर्य से उसे एक बड़े घड़े (मटके) में डाल दिया।

 

लेकिन आश्चर्य!

केवल दो घड़ी के भीतर ही वह मछली तीन हाथ लंबी हो गयी।

 

अब राजा ने उसे एक बड़े सरोवर में छोड़ दिया।

पर वहाँ भी वह कुछ ही समय में इतना विशाल हो गयी कि पूरा सरोवर उसके शरीर से भर गया।

 

राजा अत्यंत चकित थे। उन्होंने उसे समुद्र में छोड़ने का विचार किया।

 

लेकिन जैसे ही उसे समुद्र में डालने लगे, मछली ने फिर विनती की—

 

“राजन्! मुझे यहाँ मत छोड़िए। समुद्र में भयंकर जीव रहते हैं। मेरी रक्षा कीजिए।”

 

अब सत्यव्रत को समझ आ गया कि यह कोई साधारण मछली नहीं है।

 

वे हाथ जोड़कर बोले—

“हे प्रभु! मत्स्य रूप धारण करके मुझे मोहित करने वाले आप कौन हैं? एक ही दिन में आपने चार सौ कोस का सरोवर घेर लिया। आप अवश्य ही सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक भगवान हैं। कृपया बताइए कि आपने यह रूप किस उद्देश्य से धारण किया है?”

 

भगवान का रहस्य

तब वह दिव्य मछली मुस्करायी और बोली—

 

“राजन्! आज से सातवें दिन प्रलय होगा। तीनों लोक जल में डूब जाएँगे। उस समय मेरी प्रेरणा से एक विशाल नौका तुम्हारे पास आएगी।

 

तुम उसमें सप्तर्षियों को साथ लेकर बैठ जाना और सभी प्राणियों के सूक्ष्म रूप, औषधियाँ तथा बीज भी साथ ले लेना।

 

जब तक ब्रह्माजी की रात्रि समाप्त नहीं होगी, तब तक मैं उस नौका को अपने सींग से बाँधकर समुद्र में सुरक्षित रखूँगा और तुम्हें ज्ञान का उपदेश दूँगा।”

 

यह कहकर भगवान अंतर्धान हो गए।

 

प्रलय का भयानक दृश्य

कुछ ही दिनों बाद वैसा ही हुआ जैसा भगवान ने कहा था।

 

आकाश में काले बादल छा गए।

भयंकर वर्षा होने लगी।

नदियाँ, पर्वत और धरती सब जल में डूब गए।

 

चारों ओर केवल समुद्र का अथाह जल दिखाई दे रहा था।

 

उसी समय सत्यव्रत के पास एक विशाल नौका आ गयी।

 

वे सप्तर्षियों, औषधियों और समस्त बीजों को लेकर उस नौका में बैठ गए।

 

तभी समुद्र से एक अद्भुत दृश्य प्रकट हुआ।

 

एक विशाल स्वर्णमय मत्स्य प्रकट हुआ, जिसका शरीर चार लाख कोस तक फैला हुआ था और उसके सिर पर एक बड़ा तेजस्वी सींग था।

 

सत्यव्रत ने वासुकी नाग की रस्सी बनाकर उस नौका को भगवान के सींग से बाँध दिया।

 

समुद्र की प्रचंड लहरों के बीच वह नौका सुरक्षित चलने लगी।

 

सत्यव्रत भावविभोर होकर भगवान की स्तुति करने लगे।

 

भगवान प्रसन्न हुए और उन्होंने सत्यव्रत को ब्रह्म-तत्त्व और सृष्टि के गहरे रहस्यों का उपदेश दिया। यही ज्ञान आगे चलकर मत्स्य पुराण में वर्णित हुआ।

 

वेदों का उद्धार

जब ब्रह्माजी की नींद समाप्त हुई, तब भगवान मत्स्य समुद्र में गए और दैत्य हयग्रीव का वध कर दिया।

 

फिर उन्होंने पवित्र वेदों को वापस लाकर ब्रह्माजी को सौंप दिया।

 

इस प्रकार भगवान ने संसार को अज्ञान से बचाया और सृष्टि को पुनः धर्म और ज्ञान से प्रकाशित किया।

 

(२) शंखासुर द्वारा वेदों का अपहरण

प्राचीन काल में समुद्र का एक पुत्र शंख था, जिसे शंखासुर कहा जाता था। वह अत्यंत बलवान और अहंकारी दैत्य था। अपने बल और पराक्रम के कारण उसने देवताओं पर आक्रमण कर दिया।

 

भयंकर युद्ध हुआ, परंतु अंत में देवता उससे हार गए। शंखासुर ने उन्हें स्वर्ग से निकाल दिया और देवताओं के अधिकार भी छीन लिए।

 

पराजित देवता अत्यंत दुखी होकर मेरु पर्वत की गुफाओं में जाकर छिप गए। वे शत्रु के अधीन नहीं होना चाहते थे, इसलिए उन्होंने वहाँ रहकर भगवान से प्रार्थना करना प्रारम्भ किया।

 

उधर शंखासुर सोचने लगा—

“देवता वेदों के मंत्रों के बल से ही इतने शक्तिशाली हैं। यदि मैं वेदों को ही छीन लूँ, तो वे कभी शक्तिशाली नहीं बन सकेंगे।”

 

यह विचार आते ही उसने वेदों का अपहरण कर लिया और उन्हें लेकर छिप गया।

 

जब यह समाचार ब्रह्माजी को मिला तो वे अत्यंत चिंतित हो गए। तब कार्तिक मास की प्रबोधिनी एकादशी के दिन वे भगवान विष्णु की शरण में पहुँचे और उनसे सहायता की प्रार्थना की।

 

भगवान विष्णु ने उन्हें आश्वासन दिया—

“चिंता मत कीजिए, मैं वेदों की रक्षा अवश्य करूँगा।”

 

फिर भगवान ने मत्स्य (मछली) का रूप धारण किया। आकाश से गिरकर वे विन्ध्य पर्वत में रहने वाले कश्यप मुनि की अंजलि में आ गिरे।

 

कश्यप मुनि ने दया करके उस छोटी मछली को पहले कमण्डलु में रखा, फिर कुएँ, तालाब और नदी में रखा। परन्तु वह मछली हर स्थान पर तेजी से बड़ी होती गई।

 

अंत में मुनि ने उसे समुद्र में छोड़ दिया, जहाँ वह विशाल रूप धारण कर गई।

 

तब भगवान ने अपने मत्स्य रूप में शंखासुर का वध किया और वेदों को वापस प्राप्त कर लिया।

 

इसके बाद भगवान बदरीवन (बदरिकाश्रम) पहुँचे और वहाँ सभी ऋषियों को बुलाया। उन्होंने आदेश दिया—

“समुद्र में बिखरे हुए वेदों के मंत्रों को खोजकर लाओ।”

 

तब सभी तेजस्वी ऋषि समुद्र में जाकर वेदमंत्रों को खोजने लगे।

जिस ऋषि को जितने मंत्र मिले, वही उस भाग का ऋषि माना गया।

 

अंत में सभी ऋषियों ने वेदों को भगवान को समर्पित कर दिया और भगवान ने उन्हें फिर से व्यवस्थित करके संसार में स्थापित किया।

 

(३) मकर दैत्य द्वारा वेदों का अपहरण

एक अन्य कथा के अनुसार दिति के कई शक्तिशाली पुत्र थे—

मकर, हयग्रीव, हिरण्याक्ष, हिरण्यकशिपु, जम्भ और मय आदि।

 

इनमें मकर नाम का दैत्य अत्यंत चालाक और शक्तिशाली था।

 

एक दिन वह ब्रह्मलोक में गया और अपनी माया से ब्रह्माजी को मोहित कर दिया। ब्रह्माजी जब उसकी माया में फँस गए, तब उसने उनसे समस्त वेद ले लिए।

 

वेदों को लेकर वह तुरंत महासागर में जा छिपा।

 

वेदों के बिना संसार में धर्म का ज्ञान समाप्त हो गया। लोग सत्य, धर्म और कर्तव्य को भूलने लगे। पूरा संसार मानो अज्ञान और अधर्म में डूब गया।

 

यह देखकर ब्रह्माजी अत्यंत दुखी हुए और उन्होंने भगवान विष्णु से प्रार्थना की।

 

ब्रह्माजी की प्रार्थना सुनकर भगवान ने फिर मत्स्यावतार धारण किया और महासागर में प्रवेश किया।

 

समुद्र के भीतर एक भयंकर युद्ध हुआ। अंत में भगवान ने अपने मत्स्य रूप के थूथन (मुख के अग्रभाग) से मकर दैत्य को घायल करके उसका वध कर दिया।

 

फिर उन्होंने उसके पास से सम्पूर्ण वेदों को प्राप्त किया और उन्हें सुरक्षित रूप से ब्रह्माजी को वापस सौंप दिया।

 

इस प्रकार भगवान विष्णु ने संसार को फिर से धर्म और ज्ञान का प्रकाश दिया।

 

✅ संक्षेप में:

इन तीनों कथाओं का मुख्य संदेश एक ही है—

जब भी संसार में ज्ञान और धर्म पर संकट आता है, तब भगवान किसी न किसी रूप में अवतार लेकर उसकी रक्षा करते हैं।