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पृथ्वी के उद्धार की अद्भुत कथा — श्रीवराह अवतार

 

प्रलय का समय बीत चुका था। चारों ओर जल ही जल दिखाई दे रहा था। सम्पूर्ण पृथ्वी उस अथाह प्रलय-सागर में डूब गयी थी। उसी समय स्वायम्भुव मनु को सृष्टि की व्यवस्था सँभालने का कार्य मिला था।

 

परंतु जब उन्होंने चारों ओर देखा तो उनका हृदय व्याकुल हो उठा। पृथ्वी ही दिखाई नहीं दे रही थी।

 

वे अत्यन्त विनम्रता से ब्रह्मा के पास पहुँचे और हाथ जोड़कर बोले—

 

मनु बोले—

“हे जगत्पिता! आपने मुझे सृष्टि की व्यवस्था चलाने का आदेश दिया है। परंतु पृथ्वी तो प्रलय के जल में डूब चुकी है। यदि पृथ्वी ही नहीं रहेगी तो प्रजा कहाँ बसेगी? कृपा करके पृथ्वी का उद्धार कीजिये, जिससे मैं आपकी आज्ञा का पालन कर सकूँ।”

 

मनु की विनती सुनकर ब्रह्माजी गम्भीर विचार में पड़ गये।

उन्होंने मन ही मन सोचा—

 

“पृथ्वी तो रसातल में चली गयी है। उसे बाहर कैसे निकाला जाए?”

 

जब कोई उपाय सूझा नहीं, तब उन्होंने अपने हृदय से विष्णु का स्मरण किया।

 

उसी समय एक अद्भुत घटना घटी।

विचारमग्न ब्रह्माजी की नासिका से अंगूठे के समान छोटा एक वराह (सूअर) निकल पड़ा।

 

सब आश्चर्यचकित रह गये।

 

क्षण भर में वह छोटा वराह बढ़ते-बढ़ते पर्वत के समान विशाल हो गया। उसका स्वर गगन को कंपा देने वाला था।

 

गरजा जब वह दिव्य वराह, गूँज उठा सारा संसार।

जैसे मेघों में बिजली चमके, वैसे दमके उसके दाँत अपार।

 

उसका शरीर अत्यन्त कठोर था, त्वचा पर कड़े-कड़े रोम थे। श्वेत दाँत चमक रहे थे और नेत्रों से तेज की किरणें निकल रही थीं।

 

फिर वह महान् वराह अत्यन्त वेग से आकाश में उछला और गर्जना करता हुआ प्रलय-सागर में कूद पड़ा।

 

जल में प्रवेश करते समय उसका रूप ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो कोई वज्र के समान कठोर पर्वत समुद्र में गिर पड़ा हो।

 

उसके तीखे खुर जल को चीरते हुए आगे बढ़ रहे थे।

 

बहुत नीचे रसातल लोक में पहुँचकर उसने पृथ्वी को देखा, जो वहाँ डूबी हुई थी और समस्त जीवों का आश्रय बनी हुई थी।

 

भगवान ने अत्यन्त प्रेम से पृथ्वी को अपनी दाढ़ों पर उठाया और ऊपर की ओर चल पड़े।

 

लेकिन उसी समय एक भयंकर दैत्य ने उनका मार्ग रोक लिया। वह था हिरण्याक्ष

 

हिरण्याक्ष ने क्रोध से कहा—

 

हिरण्याक्ष बोला—

“अरे सूअर! तू इस पृथ्वी को कहाँ लिये जा रहा है? पहले मुझसे युद्ध कर!”

 

उसने अपनी भारी गदा से भगवान पर आक्रमण किया।

 

लेकिन भगवान मुस्कुराए।

 

भगवान वराह बोले—

“दैत्य! यह पृथ्वी सब प्राणियों का आधार है। इसका उद्धार होना ही चाहिए।”

 

फिर भगवान ने अत्यन्त सहज भाव से युद्ध किया और क्षण भर में हिरण्याक्ष का वध कर दिया।

 

अब भगवान वराह पृथ्वी को अपनी श्वेत दाढ़ों पर धारण किये जल से बाहर निकले। उनका नीलवर्ण शरीर तमाल वृक्ष के समान शोभित हो रहा था।

 

उन्हें देखकर ब्रह्मा, ऋषि और देवता समझ गये कि यह कोई साधारण रूप नहीं, स्वयं भगवान का अवतार है।

 

सबने हाथ जोड़कर स्तुति की—

 

जय हो जगत् के पालनहार,

दाढ़ों पर धरती धारण करने वाले।

संकट में जो दौड़े आते,

वही सच्चे भगवान कहलाते।

 

इस प्रकार भगवान ने पृथ्वी का उद्धार करके सृष्टि की रक्षा की।