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८५) सत्य की अमर गाथा – महाराज हरिश्चन्द्र

सत्य की अमर गाथा – महाराज हरिश्चन्द्र

बहुत समय पहले सूर्यवंश में एक ऐसे राजा हुए, जिनका नाम आज भी सत्य और धर्म का पर्याय माना जाता है। उनका नाम था महाराज हरिश्चन्द्र। वे महाराज त्रिशंकु के पुत्र थे। उनके बारे में कहा जाता था कि यदि उन्होंने एक बार कोई वचन दे दिया, तो उसे निभाने के लिए वे अपना सब कुछ त्याग सकते थे। उनके लिए सत्य केवल एक शब्द नहीं, बल्कि जीवन का सबसे बड़ा धर्म था।

महाराज हरिश्चन्द्र की राजधानी अयोध्या अत्यन्त समृद्ध और सुखी थी। चारों ओर हरियाली थी, खेत लहलहाते थे, नदियाँ निर्मल जल से भरी रहती थीं और प्रजा प्रसन्नतापूर्वक अपना जीवन व्यतीत करती थी। राज्य में न चोरी थी, न अन्याय और न ही किसी प्रकार का अत्याचार। राजा अपनी प्रजा को अपनी संतान के समान मानते थे। यदि किसी प्रजा के घर में दुःख आता, तो उन्हें भी रातभर नींद नहीं आती थी।

राजा की धर्मनिष्ठा, दानशीलता और सत्यप्रियता की चर्चा केवल पृथ्वी पर ही नहीं, बल्कि स्वर्गलोक तक पहुँच गई। एक दिन देवराज इन्द्र की सभा में देवर्षि नारद ने बड़े प्रेम से कहा, “पृथ्वी पर यदि कोई राजा सत्य का वास्तविक उपासक है, तो वह हरिश्चन्द्र हैं।”

यह सुनकर इन्द्र के मन में विचार आया, “क्या कोई मनुष्य इतना दृढ़ हो सकता है कि संसार की सबसे कठिन परिस्थितियों में भी सत्य का साथ न छोड़े?”

उन्होंने महर्षि विश्वामित्र से निवेदन किया, “भगवन्! यदि आप उचित समझें तो राजा हरिश्चन्द्र की परीक्षा लीजिए। तभी संसार को उनके सत्य का वास्तविक स्वरूप ज्ञात होगा।”

महर्षि विश्वामित्र मुस्कुराए। वे जानते थे कि मनुष्य की महानता सुख में नहीं, बल्कि कठिनाइयों में परखी जाती है। उन्होंने राजा की परीक्षा लेने का निश्चय किया और अयोध्या पहुँच गए।

राजा हरिश्चन्द्र ने बड़े आदर के साथ उनका स्वागत किया। उन्होंने विनम्रतापूर्वक कहा, “गुरुदेव! आज मेरा राज्य धन्य हो गया। कृपया आदेश दें, मैं आपकी कौन-सी सेवा कर सकता हूँ?”

महर्षि ने कहा, “राजन्! यदि तुम सचमुच धर्मप्रिय हो, तो मुझे दान दो।”

राजा ने बिना एक क्षण सोचे उत्तर दिया, “भगवन्! मेरा सब कुछ आपका है। जो चाहें, माँग लीजिए।”

विश्वामित्र ने शांत स्वर में कहा, “तो मुझे तुम्हारा सम्पूर्ण राज्य चाहिए।”

सभा में सन्नाटा छा गया। मंत्री, सैनिक और प्रजा आश्चर्य से राजा की ओर देखने लगे। लेकिन हरिश्चन्द्र के चेहरे पर न चिंता थी, न क्रोध। उन्होंने मुस्कुराते हुए अपना मुकुट उतारा, राजदण्ड नीचे रखा और कहा, “आज से यह सम्पूर्ण राज्य आपका हुआ।”

विश्वामित्र ने राज्य स्वीकार कर लिया। फिर बोले, “राजन्! दान तभी पूर्ण माना जाता है, जब दाता दक्षिणा भी दे। मुझे एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ दक्षिणा के रूप में चाहिए।”

राजा के पास अब कुछ भी नहीं बचा था। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, “भगवन्! मुझे एक महीने का समय दीजिए। मैं अवश्य आपकी दक्षिणा चुका दूँगा।”

विश्वामित्र ने अनुमति दे दी।

अब हरिश्चन्द्र के सामने सबसे बड़ा प्रश्न था—वे जाएँ तो कहाँ जाएँ? उस समय काशी को भगवान शिव की नगरी माना जाता था। इसलिए वे अपनी पत्नी रानी शैब्या और छोटे पुत्र रोहिताश्व के साथ काशी की ओर चल पड़े।

राजमहल से निकलते समय प्रजा की आँखों से आँसू रुक नहीं रहे थे। लोग उनके चरण पकड़कर रोने लगे।

“महाराज! हमें छोड़कर मत जाइए।”

राजा ने प्रेम से कहा, “मेरे प्रिय जनों, राजा बदल सकता है, लेकिन धर्म कभी नहीं बदलना चाहिए। तुम सब धर्म का पालन करना और सदैव सत्य के मार्ग पर चलना।”

इतना कहकर वे भारी मन से अयोध्या छोड़कर चले गए।

काशी पहुँचने पर समय तेजी से बीतने लगा, लेकिन दक्षिणा चुकाने का कोई उपाय दिखाई नहीं दिया। अंततः राजा ने एक अत्यन्त कठिन निर्णय लिया।

उन्होंने अपनी प्रिय पत्नी और इकलौते पुत्र को एक ब्राह्मण के हाथ बेच दिया।

जिस रानी ने कभी महलों के अतिरिक्त कुछ नहीं देखा था, वह अब दूसरों के घर बर्तन माँजने लगी। झाड़ू लगाती, पानी भरती और दिन-रात सेवा करती। छोटा-सा राजकुमार रोहिताश्व भी ब्राह्मण की पूजा के लिए प्रतिदिन फूल चुनकर लाता।

राजा हरिश्चन्द्र ने स्वयं को एक चाण्डाल के हाथ बेच दिया। वही चाण्डाल काशी के श्मशान का स्वामी था।

उसने राजा से कहा, “आज से श्मशान में आने वाले प्रत्येक मृतक का कफ़न लेना। बिना कफ़न लिए किसी का दाह-संस्कार नहीं होने देना।

राजा ने सिर झुकाकर कहा, “स्वामी, आपकी आज्ञा मेरे लिए सर्वोपरि है।”

एक समय सम्पूर्ण पृथ्वी पर शासन करने वाला राजा अब फटे वस्त्र पहनकर श्मशान में रहने लगा। चारों ओर जलती चिताएँ, धुएँ से भरा आकाश और रोते-बिलखते लोग। यही अब उनका संसार था। लेकिन उनके चेहरे पर शिकायत का एक शब्द भी नहीं था।

उधर रानी शैब्या और रोहिताश्व भी दिन-रात कठिन परिश्रम करते रहे। धीरे-धीरे उनका शरीर दुर्बल हो गया। फिर भी वे कभी भगवान से शिकायत नहीं करते थे। उन्हें विश्वास था कि सत्य की राह कठिन अवश्य होती है, परन्तु उसका अंत सदैव मंगलमय होता है।

एक दिन रोहिताश्व हमेशा की तरह बगीचे में फूल चुन रहा था। वह भगवान के लिए सबसे सुंदर फूल ढूँढ़ रहा था। तभी झाड़ियों में छिपा एक काला विषधर सर्प निकला और उसने बालक को डस लिया।

रोहिताश्व ने एक बार अपनी माँ को पुकारा और कुछ ही क्षणों में भूमि पर गिर पड़ा।

जब यह समाचार रानी शैब्या तक पहुँचा, तो उनके पैरों तले से जमीन खिसक गई। वे दौड़ती हुई अपने पुत्र के पास पहुँचीं। उन्होंने उसे बार-बार गोद में उठाया, पुकारा—

“बेटा… आँखें खोलो… देखो, तुम्हारी माँ आई है…”

लेकिन अब कोई उत्तर नहीं मिला।

उनकी आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली। संसार में एक माँ के लिए अपने पुत्र का निर्जीव शरीर उठाने से बड़ा दुःख शायद कोई नहीं होता।

उन्होंने किसी प्रकार अपने पुत्र का शरीर उठाया और अकेली ही श्मशान की ओर चल पड़ीं।

श्मशान पहुँचते ही एक सेवक उनके सामने आकर खड़ा हो गया।

वह सेवक और कोई नहीं, स्वयं महाराज हरिश्चन्द्र थे।

दोनों ने वर्षों बाद एक-दूसरे को देखा, लेकिन गरीबी, दुःख और समय ने उनके रूप को इतना बदल दिया था कि पहले वे एक-दूसरे को पहचान ही नहीं पाए।

राजा ने अपने कर्तव्य के अनुसार कहा, “माता, अंतिम संस्कार से पहले कफन का शुल्क देना होगा।”

रानी रोते हुए बोलीं, “मेरे पास कुछ भी नहीं है। मैं एक दासी हूँ। कृपा करके मेरे पुत्र का अंतिम संस्कार होने दीजिए।”

राजा ने दृढ़ स्वर में कहा, “मैं अपने स्वामी की आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकता।”

तभी रानी ने ध्यान से उनके चेहरे की ओर देखा।

“स्वामी…! क्या आप… महाराज हरिश्चन्द्र हैं?”

राजा की आँखों में भी आँसू आ गए।

“शैब्या…! और यह… हमारा रोहिताश्व…”

क्षणभर के लिए दोनों मौन हो गए।

एक ओर पिता का हृदय अपने पुत्र के वियोग में तड़प रहा था, दूसरी ओर एक सेवक अपने स्वामी के आदेश का पालन करने के लिए खड़ा था।

रानी हाथ जोड़कर बोलीं, “महाराज! मेरे पास देने के लिए कुछ भी नहीं है।”

राजा ने भारी मन से कहा, “यदि मैं आज अपने धर्म से हट गया, तो जीवनभर सत्य का पालन करने का मेरा संकल्प टूट जाएगा।”

रानी समझ गईं कि उनके पति आज भी वही सत्यनिष्ठ राजा हैं।

“रानी शैब्या के पास रोहिताश्व के लिए अलग से कफ़न नहीं था। इसलिए उन्होंने अपनी साड़ी का आँचल फाड़कर उसे कफ़न के रूप में अर्पित करने का निश्चय किया।

जैसे ही उन्होंने साड़ी फाड़नी चाही, उसी क्षण पूरा आकाश दिव्य प्रकाश से भर उठा।

चारों ओर शंखध्वनि गूँजने लगी। सुगंधित पुष्पों की वर्षा होने लगी।

भगवान नारायण, ब्रह्माजी, देवराज इन्द्र, धर्मराज और महर्षि विश्वामित्र वहाँ प्रकट हुए।

महर्षि विश्वामित्र ने आगे बढ़कर कहा, “राजन्! बस, अब और नहीं। तुम्हारी परीक्षा पूर्ण हुई। तुमने सिद्ध कर दिया कि संसार में सत्य से बड़ा कोई धर्म नहीं।”

इन्द्र ने अमृत की वर्षा की।

क्षणभर पहले जो बालक निर्जीव पड़ा था, वही रोहिताश्व धीरे-धीरे उठ बैठा, मानो गहरी नींद से जागा हो।

रानी ने अपने पुत्र को हृदय से लगा लिया। राजा की आँखों से भी आनंद के आँसू बह निकले।

धर्मराज ने मुस्कुराकर कहा, “राजन्! जिस चाण्डाल की सेवा तुम कर रहे थे, वह वास्तव में मैं ही था। तुम्हारे धर्म की परीक्षा लेने के लिए मैंने यह रूप धारण किया था।”

भगवान नारायण ने कहा, “हरिश्चन्द्र! तुम्हारे समान सत्य का पालन करने वाला मनुष्य अत्यन्त दुर्लभ है। तुम अपने परिवार सहित सदेह स्वर्ग जाने के अधिकारी हो।”

लेकिन राजा हरिश्चन्द्र ने विनम्रता से हाथ जोड़ दिए।

उन्होंने कहा, “प्रभु! मैं अकेला स्वर्ग कैसे जा सकता हूँ? मेरी प्रजा मेरे बिना दुःखी होगी। यदि वे मेरे साथ चल सकें, तभी मुझे स्वर्ग स्वीकार है।”

देवराज इन्द्र ने कहा, “राजन्! प्रत्येक जीव अपने कर्मों का फल भोगता है।”

राजा बोले, “यदि मेरे सत्कर्मों का कोई फल है, तो वह मेरी प्रजा में बाँट दीजिए। मुझे अकेले सुख नहीं चाहिए।”

देवता उनकी करुणा और प्रजाप्रेम से अभिभूत हो गए।

इन्द्र ने कहा, “तथास्तु!”

कहा जाता है कि राजा के पुण्य के प्रभाव से अयोध्या की प्रजा भी दिव्य लोक की अधिकारी बनी। बाद में महर्षि विश्वामित्र ने पुनः अयोध्या का राज्य व्यवस्थित किया और रोहिताश्व को राजसिंहासन पर बैठाया।

आज भी जब सत्य, वचन-पालन और धर्म की बात होती है, तो सबसे पहले महाराज हरिश्चन्द्र का नाम लिया जाता है। उन्होंने हमें सिखाया कि धन, राज्य, वैभव और सुख जीवन में बार-बार मिल सकते हैं, लेकिन यदि सत्य एक बार खो जाए, तो उसे वापस पाना अत्यन्त कठिन होता है।

इसीलिए भारत की संस्कृति में कहा गया है—

“सत्य ही ईश्वर है और सत्य का मार्ग कठिन अवश्य है, परन्तु अंत में विजय उसी की होती है।”

महाराज हरिश्चन्द्र का जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, धर्म, सत्य, करुणा और अपने कर्तव्य का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए। जो मनुष्य इन चारों का पालन करता है, वही वास्तव में महान कहलाने योग्य है, और उसका यश युगों-युगों तक अमर रहता है।

 

 

सूर्यवंश की पावन धरती पर, एक ऐसा नृप अवतार हुआ,
सत्य, धर्म और त्याग जहाँ, जीवन का आधार हुआ।
नाम था जिनका हरिश्चन्द्र, सत्य जिनका अभिमान था,
वचन निभाना प्राणों से बढ़कर, उनका सच्चा सम्मान था।

अयोध्या नगरी सुख से भरी थी, खेत सुनहरे लहराते थे,
निर्मल जल से बहती नदियाँ, जन-जन गीत सुनाते थे।
न अन्याय था, न भय कहीं, न था किसी पर अत्याचार,
राजा अपनी प्रजा को मानें, सदा हृदय का सच्चा प्यार।

राजा के यश की गाथाएँ, स्वर्गलोक तक पहुँच गईं,
देवसभा में सत्य-धर्म की, चर्चाएँ भी गूँज गईं।
नारद बोले—“धरती पर यदि, सत्य का कोई मान है,
हरिश्चन्द्र ही वह राजा हैं, जिनका जग में सम्मान है।”

इन्द्र ने तब विश्वामित्र से, विनय सहित यह बात कही—
“परखिए इनके सत्य को अब, कैसी दृढ़ इनकी राह रही।”
ऋषिवर बोले—“सत्य मनुज का, संकट में पहचाना जाए,
सुख में सब धर्मी बन जाते, कठिन समय ही सत्य बताए।”

ऋषि पहुँचे अयोध्या नगरी, राजा ने सत्कार किया,
विनय सहित चरणों में झुककर, सेवा का अधिकार दिया।
ऋषि ने माँगा सारा राज्य, सभा स्तब्ध रह गई वहीं,
राजा ने हँसकर राज्य समर्पित, मन में कोई शंका नहीं।

फिर बोले ऋषि—“दान तभी है, जब दक्षिणा भी साथ मिले।”
स्वर्ण मुद्राएँ माँगी उनसे, धर्म-पथ पर पग और चले।
राजा बोले—“समय दीजिए, वचन हमारा अटल रहेगा।”
सत्य के रक्षक का संकल्प, हर परिस्थिति में अडिग रहेगा।

पत्नी शैब्या, पुत्र रोहित संग, काशी की ओर चले वे,
पीछे रोती रही प्रजा सारी, आँसू थमते न थे तब से।
राजा बोले—“धर्म न छोड़ो, चाहे राजा बदल जाए,
सत्य सदा जीवन का दीपक, जग को राह दिखाता जाए।”

समय बीता, धन न मिला तो, भाग्य ने कैसी चाल चली,
पत्नी-पुत्र को बेचना पड़ा, आँखों में थी पीर पली।
रानी बनकर दासी जीतीं, पुत्र फूल चुन लाता था,
कर्म कठिन थे, मन में फिर भी, ईश्वर पर विश्वास रहा।

राजा स्वयं बिके चाण्डाल को, श्मशान हुआ अब उनका धाम,
जलती चिताएँ, धुआँ चारों ओर, सत्य बना उनका विश्राम।
कर्तव्य उनका एक यही था—कफ़न बिना न दाह हो,
धर्म निभाना प्रथम कर्तव्य, चाहे हृदय में आह हो।

एक दिवस जब फूल चुन रहा, बालक रोहित बाग के बीच,
विषधर सर्प ने डस लिया उसे, मृत्यु आ पहुँची थी समीप।
माँ ने दौड़कर पुत्र उठाया, पुकारा बारम्बार उसे,
किन्तु मौन पड़ा था वह बालक, छोड़ गया संसार जिसे।

काँपते कदमों से रानी फिर, पुत्र लिए श्मशान चलीं,
भाग्य की कैसी लीला देखो, वहीं पति से भेंट हुई।
कर्तव्यवश राजा ने पूछा—“कफ़न का शुल्क चुकाना होगा।”
रानी बोलीं—“कुछ भी नहीं है, दया करो, यह धर्म होगा।”

पहचान हुई, दोनों रोए, पुत्र पड़ा था निश्चल वहीं,
हृदय पिता का फटता जाता, पर धर्म डिगा फिर भी नहीं।
राजा बोले—“सत्य न टूटे, चाहे प्राण ही क्यों न जाएँ।”
रानी बोलीं—“यही धर्म है, सत्य कभी मत छोड़िए।”

जब आँचल अपना फाड़ने को, शैब्या आगे बढ़ने लगीं,
दिव्य प्रकाश से भर उठा गगन, पुष्प-वृष्टि होने लगी।
शंख बजे, देवगण आए, ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र महान,
धर्मराज और विश्वामित्र ने, किया सत्य का गुणगान।

ऋषि बोले—“हे सत्यवीर! अब परीक्षा पूरी हो गई।
सत्य-धर्म की यह गाथा जग में, युग-युग तक अमर हो गई।”
अमृत बरसा, रोहित जागा, जैसे गहरी निद्रा टूटी,
माता-पिता के आँचल में फिर, जीवन की मुस्कान फूटी।

धर्मराज ने सत्य बताया—“चाण्डाल मैं ही बन आया था।
तुम्हारे धर्म की दृढ़ता को, जग के सम्मुख लाया था।”
विष्णु बोले—“स्वर्ग तुम्हारा, परिवार सहित अधिकार है।”
राजा बोले—“प्रजा बिना यह, मेरे लिए स्वीकार नहीं है।”

“यदि मेरे पुण्यों का फल हो, मेरी प्रजा में बाँट दिया जाए,
उनके सुख में ही मेरा सुख है, मुझको अकेला स्वर्ग न भाए।”
देव सभी यह प्रेम देखकर, भाव-विभोर हो उठे तभी,
इन्द्र बोले—“तथास्तु राजन्! अमर रहेगा यश अब ही।”

रोहित फिर सिंहासन पर बैठे, राज्य पुनः सुशोभित हुआ,
सत्य, दया और धर्म का दीपक, फिर से जग में प्रज्वलित हुआ।
आज भी जब सत्य की बातें, जग में कोई करता है,
सबसे पहले हरिश्चन्द्र का, पावन नाम ही आता है।

धन-वैभव सब क्षणिक जगत में, सत्य सदा अविनाशी है,
धर्म-पथ चाहे कठिन बहुत हो, अंत उसी की विजय होती है।
जो सत्य, करुणा, धर्म, कर्तव्य को, जीवन का आधार बनाए,
उसका यश युग-युग तक अमर हो, जग श्रद्धा से शीश झुकाए।

संदेश

सत्य ही ईश्वर, सत्य ही शक्ति, सत्य ही जीवन का मान,
सत्य-पथ पर जो अडिग चले, वही बने जग में महान।
हरिश्चन्द्र की यह अमर कहानी, देती हमको यही संदेश—
धर्म निभाओ, सत्य अपनाओ, यही मनुष्य का श्रेष्ठ वेश।

______________________

सरल बाल-कविता
 

बहुत पुरानी बात निराली,
एक कहानी बड़ी निराली।
सूर्यवंश के राजा थे वे,
हरिश्चन्द्र कहलाते थे वे।

सत्य-धर्म से प्रेम था उनको,
वचन निभाना भाता था।
एक बार जो वचन दे देते,
जीवन भर निभ जाता था।

अयोध्या नगरी सुख से भरी,
हर घर में खुशहाली थी।
न कोई भूखा, न कोई दुखी,
सबके चेहरे पर लाली थी।

राजा सबको प्रेम लुटाते,
सबको अपना मानते थे।
प्रजा के दुख में दुखी होकर,
रात-रात भर जागते थे।

उनकी महिमा स्वर्ग पहुँची,
देवों ने गुणगान किया।
नारद जी की बात सुनकर,
इन्द्र ने विचार किया।

विश्वामित्र तब धरती पर आए,
सत्य की परीक्षा ली।
माँग लिया सारा ही राज्य,
राजा ने सब दान दी।

बिना शिकायत, बिना दुख के,
वचन अपना पूरा किया।
राजा ने अपना राज्य त्यागा,
धर्म का दीपक जला दिया।

फिर ऋषि बोले—“दक्षिणा दो,”
राजा बोले—“समय मिले।”
पत्नी-पुत्र संग काशी पहुँचे,
सत्य के दीपक मन में जले।

धन न था, न कोई सहारा,
समय बड़ा ही कठिन था।
पत्नी-पुत्र को बेचना पड़ा,
मन में गहरा दुख था।

राजा स्वयं भी बिक गए जाकर,
श्मशान के रखवाले को।
कर्तव्य अपना निभाते रहे,
सिर झुकाकर मालिक को।

नन्हा रोहित फूल चुनता था,
भगवान को अर्पण करता था।
एक दिन विषधर सर्प ने डँसा,
जीवन उसका हरता था।

माँ रोती उसे लेकर आई,
श्मशान भूमि के द्वार पर।
भाग्य देखो, वहीं खड़े थे,
राजा अपने कर्तव्य पर।

राजा बोले—“कफ़न का नियम,
सबको पूरा करना है।”
रानी बोली—“कुछ भी नहीं है,
बस बेटे को विदा करना है।”

राजा बोले—“धर्म बड़ा है,
मैं नियम नहीं तोड़ूँगा।”
रानी बोली—“सत्य की खातिर,
सब कुछ मैं भी छोड़ूँगी।”

रानी ने अपने मन को बाँधा,
साड़ी का एक भाग दिया,
कफ़न बनाने की तैयारी में,
त्याग का सुंदर भाव दिया।

तभी अचानक दिव्य प्रकाश,
आकाश से बरस जाता है।
फूल बरसे, शंख बजे फिर,
देव सभी वहाँ आए।

रोहित फिर से जीवित होकर,
माँ के गले लग जाए।
भगवान बोले—“हे हरिश्चन्द्र,
तुमने सत्य निभाया है।”

धर्म, दया और सच्चाई का,
सच्चा मार्ग दिखाया है।
आज भी दुनिया याद करे,
उनका उज्ज्वल नाम सदा।

सत्य, धर्म और सच्चाई से,
बढ़ता है सम्मान सदा।
आओ हम भी यह प्रण लें,
झूठ कभी न बोलेंगे।

सत्य, दया और अच्छे कर्मों से,
जीवन अपना तोलेंगे।
सत्य की राह कठिन सही,
पर मंज़िल बहुत सुहानी है।

हरिश्चन्द्र की यह अमर कथा,
हम सबकी पहचान है।

 

प्रश्न–उत्तर

1. महाराज हरिश्चन्द्र किस वंश के राजा थे और उनके पिता का क्या नाम था?
उत्तर: महाराज हरिश्चन्द्र सूर्यवंश के महान राजा थे। वे महाराज त्रिशंकु के पुत्र थे और सत्य, धर्म तथा वचन-पालन के लिए पूरे संसार में प्रसिद्ध थे।

2. महाराज हरिश्चन्द्र के जीवन का सबसे बड़ा धर्म क्या था?
उत्तर: उनके लिए सत्य ही जीवन का सर्वोच्च धर्म था। वे किसी भी परिस्थिति में अपना वचन नहीं तोड़ते थे और सत्य का सदैव पालन करते थे।

3. अयोध्या राज्य की मुख्य विशेषताएँ क्या थीं?
उत्तर: अयोध्या समृद्ध, सुखी और शांतिपूर्ण राज्य था। वहाँ चोरी, अन्याय और अत्याचार नहीं था तथा प्रजा प्रसन्नतापूर्वक जीवन व्यतीत करती थी।

4. देवराज इन्द्र ने महर्षि विश्वामित्र से क्या निवेदन किया था?
उत्तर: देवराज इन्द्र ने महर्षि विश्वामित्र से अनुरोध किया कि वे राजा हरिश्चन्द्र की परीक्षा लें, जिससे उनके सत्य और धर्म की वास्तविक महानता संसार के सामने आए।

5. महर्षि विश्वामित्र ने राजा हरिश्चन्द्र से दान में क्या माँगा?
उत्तर: महर्षि विश्वामित्र ने राजा हरिश्चन्द्र से उनका सम्पूर्ण राज्य दान में माँगा। राजा ने बिना किसी संकोच के अपना पूरा राज्य उन्हें अर्पित कर दिया।

6. राज्य दान देने के बाद महर्षि विश्वामित्र ने क्या माँगा?
उत्तर: राज्य स्वीकार करने के बाद महर्षि विश्वामित्र ने दान की पूर्णता के लिए एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ दक्षिणा के रूप में माँगी और भुगतान के लिए समय दिया।

7. दक्षिणा चुकाने के लिए राजा हरिश्चन्द्र ने क्या कठिन निर्णय लिया?
उत्तर: दक्षिणा चुकाने के लिए राजा ने अपनी पत्नी शैब्या और पुत्र रोहिताश्व को ब्राह्मण के हाथ बेच दिया तथा स्वयं चाण्डाल के सेवक बन गए।

8. राजा हरिश्चन्द्र को श्मशान में कौन-सा कार्य सौंपा गया था?
उत्तर: चाण्डाल ने उन्हें आदेश दिया कि बिना कफ़न लिए किसी भी मृतक का दाह-संस्कार न होने दें और नियम का पालन करें।

9. रोहिताश्व की मृत्यु कैसे हुई?
उत्तर: रोहिताश्व भगवान की पूजा के लिए फूल चुन रहा था। तभी एक विषैले सर्प ने उसे डस लिया, जिससे कुछ ही क्षणों में उसकी मृत्यु हो गई।

10. श्मशान में राजा हरिश्चन्द्र ने अपनी पत्नी से क्या कहा?
उत्तर: अपने कर्तव्य का पालन करते हुए राजा ने रानी शैब्या से कहा कि अंतिम संस्कार से पहले कफ़न देना आवश्यक है।

11. रानी शैब्या के पास कफ़न न होने पर उन्होंने क्या करने का निश्चय किया?
उत्तर: रानी शैब्या के पास कफ़न खरीदने के लिए धन नहीं था। इसलिए उन्होंने अपनी साड़ी का आँचल फाड़कर कफ़न बनाने का निश्चय किया।

12. राजा हरिश्चन्द्र की परीक्षा कब समाप्त हुई?
उत्तर: जैसे ही रानी साड़ी का आँचल फाड़ने लगीं, देवता प्रकट हुए। महर्षि विश्वामित्र ने घोषणा की कि राजा की कठिन परीक्षा पूर्ण हो चुकी है।

13. धर्मराज ने अपने वास्तविक रूप के बारे में क्या बताया?
उत्तर: धर्मराज ने बताया कि वही चाण्डाल के रूप में राजा की सेवा ले रहे थे। उन्होंने यह रूप केवल उनके धर्म और सत्य की परीक्षा के लिए धारण किया था।

14. भगवान नारायण ने राजा हरिश्चन्द्र को कौन-सा वरदान दिया?
उत्तर: भगवान नारायण ने कहा कि सत्य और धर्म के पालन के कारण राजा हरिश्चन्द्र अपने परिवार सहित सदेह स्वर्ग जाने के अधिकारी हैं।

15. राजा हरिश्चन्द्र ने अकेले स्वर्ग जाने से क्यों इंकार किया?
उत्तर: राजा ने कहा कि वे अपनी प्रजा को छोड़कर अकेले स्वर्ग नहीं जाना चाहते। यदि प्रजा साथ चल सके, तभी वे स्वर्ग स्वीकार करेंगे।

16. इस कथा से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर: यह कथा सिखाती है कि सत्य, धर्म, करुणा और कर्तव्य का पालन हर परिस्थिति में करना चाहिए। अंततः सत्य की ही विजय होती है और वही मनुष्य महान कहलाता है।

 

बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

1. महाराज हरिश्चन्द्र किस वंश के राजा थे?
(A) चंद्रवंश
(B) यादववंश
(C) सूर्यवंश
(D) कुरुवंश
उत्तर: (C) सूर्यवंश

2. महाराज हरिश्चन्द्र के पिता का नाम क्या था?
(A) दशरथ
(B) त्रिशंकु
(C) दिलीप
(D) सगर
उत्तर: (B) त्रिशंकु

3. महाराज हरिश्चन्द्र किस गुण के लिए प्रसिद्ध थे?
(A) पराक्रम
(B) दानशीलता
(C) सत्य और धर्मपालन
(D) युद्ध कौशल
उत्तर: (C) सत्य और धर्मपालन

4. हरिश्चन्द्र की राजधानी कौन-सी थी?
(A) काशी
(B) हस्तिनापुर
(C) अयोध्या
(D) मिथिला
उत्तर: (C) अयोध्या

5. देवराज इन्द्र की सभा में हरिश्चन्द्र की प्रशंसा किसने की?
(A) महर्षि वशिष्ठ
(B) देवर्षि नारद
(C) महर्षि कश्यप
(D) अगस्त्य ऋषि
उत्तर: (B) देवर्षि नारद

6. महाराज हरिश्चन्द्र की परीक्षा लेने का निर्णय किसने लिया?
(A) महर्षि वशिष्ठ
(B) महर्षि विश्वामित्र
(C) महर्षि वाल्मीकि
(D) महर्षि अत्रि
उत्तर: (B) महर्षि विश्वामित्र

7. महर्षि विश्वामित्र ने दान में क्या माँगा?
(A) स्वर्ण
(B) हाथी
(C) सम्पूर्ण राज्य
(D) सेना
उत्तर: (C) सम्पूर्ण राज्य

8. दान पूर्ण करने के लिए महर्षि विश्वामित्र ने कितनी दक्षिणा माँगी?
(A) पाँच सौ स्वर्ण मुद्राएँ
(B) एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ
(C) दो हजार स्वर्ण मुद्राएँ
(D) दस हजार स्वर्ण मुद्राएँ
उत्तर: (B) एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ

9. दक्षिणा चुकाने के लिए हरिश्चन्द्र अपने परिवार सहित कहाँ गए?
(A) प्रयाग
(B) मथुरा
(C) काशी
(D) उज्जैन
उत्तर: (C) काशी

10. रानी शैब्या और रोहिताश्व को किसके हाथ बेचा गया?
(A) व्यापारी
(B) सैनिक
(C) ब्राह्मण
(D) वैश्य
उत्तर: (C) ब्राह्मण

11. राजा हरिश्चन्द्र ने स्वयं को किसके हाथ बेच दिया?
(A) व्यापारी
(B) चाण्डाल
(C) ब्राह्मण
(D) मंत्री
उत्तर: (B) चाण्डाल

12. चाण्डाल ने हरिश्चन्द्र को कौन-सा कार्य सौंपा?
(A) खेती करना
(B) मंदिर की सेवा करना
(C) श्मशान में कफ़न लेना
(D) सैनिकों को प्रशिक्षित करना
उत्तर: (C) श्मशान में कफ़न लेना

13. रोहिताश्व की मृत्यु किस कारण हुई?
(A) बीमारी से
(B) दुर्घटना से
(C) सर्पदंश से
(D) नदी में डूबने से
उत्तर: (C) सर्पदंश से

14. रानी शैब्या अपने पुत्र का शव लेकर कहाँ पहुँचीं?
(A) राजमहल
(B) मंदिर
(C) श्मशान
(D) आश्रम
उत्तर: (C) श्मशान

15. रानी शैब्या के पास कफ़न न होने पर उन्होंने क्या करने का निश्चय किया?
(A) सहायता माँगने का
(B) शव वापस ले जाने का
(C) अपनी साड़ी का आँचल फाड़कर कफ़न बनाने का
(D) प्रतीक्षा करने का
उत्तर: (C) अपनी साड़ी का आँचल फाड़कर कफ़न बनाने का

16. उसी समय वहाँ कौन-कौन प्रकट हुए?
(A) केवल भगवान नारायण
(B) केवल महर्षि विश्वामित्र
(C) भगवान नारायण, ब्रह्माजी, इन्द्र, धर्मराज और महर्षि विश्वामित्र
(D) केवल धर्मराज
उत्तर: (C) भगवान नारायण, ब्रह्माजी, इन्द्र, धर्मराज और महर्षि विश्वामित्र

17. धर्मराज ने किस रूप में हरिश्चन्द्र की परीक्षा ली थी?
(A) ब्राह्मण
(B) साधु
(C) चाण्डाल
(D) सैनिक
उत्तर: (C) चाण्डाल

18. भगवान नारायण ने हरिश्चन्द्र को किस योग्य बताया?
(A) राजसूय यज्ञ करने योग्य
(B) सदेह स्वर्ग जाने योग्य
(C) सम्राट बनने योग्य
(D) ऋषि बनने योग्य
उत्तर: (B) सदेह स्वर्ग जाने योग्य

19. हरिश्चन्द्र ने स्वर्ग जाने से पहले क्या इच्छा व्यक्त की?
(A) अधिक धन माँगा
(B) अपना राज्य वापस माँगा
(C) अपनी प्रजा को भी साथ ले जाने की इच्छा व्यक्त की
(D) वन में रहने की इच्छा जताई
उत्तर: (C) अपनी प्रजा को भी साथ ले जाने की इच्छा व्यक्त की

20. इस कथा का मुख्य संदेश क्या है?
(A) धन सबसे बड़ा है।
(B) बल ही सर्वोपरि है।
(C) सत्य, धर्म, करुणा और कर्तव्य का पालन जीवन का सर्वोच्च आदर्श है।
(D) राज्य ही सबसे बड़ा सुख है।
उत्तर: (C) सत्य, धर्म, करुणा और कर्तव्य का पालन जीवन का सर्वोच्च आदर्श है।

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