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Jhunjhunu, Rajasthan
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🌸 श्रीगुह निषादराज और श्रीराम की प्रेममयी मित्रता
यह केवल श्रीराम और निषादराज गुह की मित्रता की कहानी नहीं है। यह ऐसी सच्ची भक्ति और मित्रता की कहानी है, जिसमें जाति, पद, धन या ऊँच-नीच का कोई स्थान नहीं है। गुह के लिए श्रीराम केवल अयोध्या के राजकुमार नहीं थे—वे उसके प्राण, उसके जीवन का सबसे बड़ा धन और उसके हृदय के स्वामी थे।
🌿 1. गुह का पूर्वजन्म — एक शिकारी की कहानी
बहुत पहले एक जंगल में गुरुद्रुह नाम का एक भील रहता था।
वह शिकार करके अपने परिवार का पेट पालता था। जानवरों को मारना उसके लिए रोज़ का काम था। उसे यह भी पता नहीं था कि उसके इस काम से कितने पाप हो रहे हैं।
एक दिन महाशिवरात्रि थी।
गुरुद्रुह सुबह-सुबह शिकार करने निकला, लेकिन पूरा दिन जंगल में घूमने के बाद भी उसे एक भी जानवर नहीं मिला।
अब शाम हो चुकी थी।
वह सोचने लगा—
“घर पर मेरे परिवार वाले भूखे होंगे। मैं खाली हाथ कैसे लौटूँ?”
इसलिए उसने सोचा कि रात में शायद कोई जानवर पानी पीने आए। वह एक तालाब के पास बेल के पेड़ पर चढ़कर बैठ गया।
उसे पता भी नहीं था कि उसी पेड़ के नीचे भगवान शिव का शिवलिंग था।
🌙 2. अनजाने में हो गई शिव पूजा
रात का पहला पहर हुआ।
एक हिरणी पानी पीने के लिए तालाब पर आई।
गुरुद्रुह ने उसे देखा और तुरंत अपना धनुष-बाण उठा लिया।
लेकिन जैसे ही वह शिकार करने के लिए हिला, उसके कंधे पर लटकी हुई पानी से भरी तूँबी हिल गई।
उसमें से कुछ पानी नीचे गिरा।
और वह पानी सीधे शिवलिंग पर जा गिरा।
साथ ही पेड़ के कुछ बेलपत्र भी टूटकर शिवलिंग पर गिर पड़े।
गुरुद्रुह को पता भी नहीं था कि उससे भगवान शिव की पूजा हो रही है।
लेकिन भगवान शिव ने उसके इस अनजाने में हुए पूजन को भी स्वीकार कर लिया।
🦌 3. पहली हिरणी की सच्चाई
हिरणी ने जब शिकारी को देखा तो समझ गई कि वह उसे मारना चाहता है।
वह डर गई, लेकिन उसने हिम्मत नहीं छोड़ी।
उसने कहा—
“हे व्याध! मेरे छोटे बच्चे हैं। पहले मैं उन्हें सुरक्षित कर दूँ। मैं उन्हें अपनी बहन या अपने पति को सौंपकर वापस आ जाऊँगी। तब आप मुझे मार देना।”
सोचिए!
वह हिरणी जानती थी कि वापस आने का अर्थ है मृत्यु।
फिर भी उसने झूठ नहीं बोला।
गुरुद्रुह के मन में पहली बार दया जागी।
उसके अंदर जैसे कुछ बदलने लगा।
उसने हिरणी को जाने दिया।
🌿 4. दूसरी हिरणी भी आई
कुछ समय बाद दूसरी हिरणी वहाँ पानी पीने आई।
गुरुद्रुह ने फिर धनुष उठाया।
फिर वही हुआ।
वह पेड़ पर हिला—
पानी शिवलिंग पर गिरा।
बेलपत्र शिवलिंग पर गिरे।
एक बार फिर अनजाने में शिवजी की पूजा हो गई।
दूसरी हिरणी ने भी पहली हिरणी की तरह कहा—
“मुझे पहले अपने बच्चों और परिवार की चिंता है। मैं उन्हें सौंपकर वापस आऊँगी।”
गुरुद्रुह ने उसे भी जाने दिया।
अब उसके मन में दया पहले से अधिक बढ़ चुकी थी।
🦌 5. हिरण भी अपने वचन पर अडिग रहा
इसके बाद एक मजबूत हिरण वहाँ आया।
गुरुद्रुह ने उसे भी मारने के लिए धनुष उठाया।
फिर वही हुआ—जल और बेलपत्र शिवलिंग पर गिरे।
हिरण ने भी कहा—
“मेरे परिवार को मेरी आवश्यकता है। पहले मैं अपने बच्चों को उनकी माता के पास छोड़ दूँ। फिर मैं आपके पास वापस आ जाऊँगा।”
गुरुद्रुह बहुत भूखा था।
उसका परिवार भी भूखा था।
उसे लग रहा था कि आज अगर वह शिकार नहीं करेगा तो घर में भोजन नहीं होगा।
लेकिन अब उसके हृदय में करुणा जाग चुकी थी।
उसने हिरण को भी जाने दिया।
❤️ 6. सबसे बड़ा आश्चर्य — पूरा परिवार वापस आया
अब एक बहुत ही भावुक घटना हुई।
जब हिरण और दोनों हिरणियाँ अपने घर पहुँचे तो उन्होंने एक-दूसरे को सारी बात बताई।
उन्होंने सोचा—
“हम सबने उस शिकारी से वचन दिया है। हम अपना वचन कैसे तोड़ सकते हैं?”
इसलिए वे सभी मिलकर वापस चल पड़े।
उनके साथ उनके छोटे-छोटे बच्चे भी चल पड़े।
कल्पना कीजिए—
एक तरफ एक भूखा शिकारी है, जिसके पास धनुष-बाण है।
और दूसरी तरफ पूरा हिरण परिवार है, जो जानता है कि वहाँ जाने पर उनकी जान जा सकती है।
फिर भी वे सत्य और अपने वचन के लिए वापस जा रहे हैं।
😢 7. गुरुद्रुह के हृदय में बड़ा परिवर्तन
गुरुद्रुह ने जब पूरे हिरण परिवार को अपनी ओर आते देखा तो वह पहले बहुत प्रसन्न हुआ।
उसने धनुष पर बाण चढ़ाया।
लेकिन तभी उसके शरीर के हिलने से फिर—
जल शिवलिंग पर गिरा।
बेलपत्र शिवलिंग पर गिरे।
अब तक भगवान शिव की कृपा से उसके अंदर बहुत बड़ा परिवर्तन हो चुका था।
उसने उन हिरणों को देखा और उसके मन में विचार आया—
“ये पशु होकर भी अपने वचन के इतने पक्के हैं।”
फिर उसने अपने बारे में सोचा—
“और मैं मनुष्य होकर भी केवल अपने स्वार्थ के बारे में सोचता रहा।”
उसका हृदय ग्लानि से भर गया।
उसने धनुष नीचे कर दिया।
उसकी आँखों में करुणा आ गई।
उसने कहा—
“हे श्रेष्ठ हिरणों! तुम धन्य हो। तुमने मुझे आज बहुत बड़ा पाठ सिखाया है। तुम सब सुरक्षित जाओ।”
🔱 8. भगवान शिव का प्रकट होना
गुरुद्रुह के हृदय में सच्चा परिवर्तन देखकर भगवान शिव प्रसन्न हो गए।
भगवान शिव उसके सामने प्रकट हुए।
गुरुद्रुह आश्चर्य से भगवान को देखने लगा।
जिस व्यक्ति ने जीवनभर हिंसा की थी, उसके हृदय में अब दया और भक्ति उत्पन्न हो चुकी थी।
भगवान शिव ने उसे आशीर्वाद दिया और कहा कि भविष्य में भगवान श्रीराम स्वयं उसके घर आएँगे और उससे मित्रता करेंगे।
यही गुरुद्रुह आगे चलकर शृंगवेरपुर के राजा निषादराज गुह बने।
और उनके हृदय में श्रीराम के लिए ऐसी भक्ति थी, जो कभी कम नहीं हुई।
इसीलिए कहा गया—
“शिवजी की सेवा का फल यही है कि श्रीराम के चरणों में अखंड भक्ति प्राप्त हो।”
🌸 9. अब शुरू होती है गुह और बालक श्रीराम की पहली मुलाकात
गुह के पिता की महाराज दशरथ से बहुत अच्छी मित्रता थी।
जब श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न छोटे बच्चे थे, तब गुह के पिता अयोध्या आया करते थे।
गुह ने जब श्रीराम के सुंदर रूप और उनके मधुर स्वभाव के बारे में सुना तो उसके मन में श्रीराम को देखने की बहुत इच्छा पैदा हो गई।
वह बार-बार सोचता—
“मैं कब अयोध्या जाऊँगा? कब श्रीराम को अपनी आँखों से देखूँगा?”
आखिर कई वर्षों के बाद उसके पिता ने उसे अयोध्या जाने की अनुमति दे दी।
गुह की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था।
🎁 10. गुह श्रीराम के लिए उपहार लेकर अयोध्या पहुँचा
गुह अपने साथ बहुत प्रेम से उपहार लेकर चला।
उसने जंगल से प्राप्त कंद-मूल, फल और चारों राजकुमारों के लिए सुंदर पनहियाँ साथ रखीं।
लेकिन उसके मन में सबसे बड़ा उपहार था—
❤️ श्रीराम के प्रति उसका प्रेम।
गुह अयोध्या पहुँच चुका था। उसके हृदय में एक ही इच्छा थी—किसी तरह अपने प्रिय श्रीराम और उनके तीनों भाइयों के दर्शन कर लूँ।
लेकिन उसने श्रीराम को पहले कभी देखा नहीं था। उसने केवल अपने पिता से उनके बारे में सुना था—कि महाराज दशरथ के चार पुत्र हैं, राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न, और चारों ही बहुत सुंदर, गुणवान और मनमोहक हैं।
इसलिए गुह के मन में श्रीराम की एक कल्पना बनी हुई थी।
वह सोचता था—
“न जाने मेरे राम कैसे दिखते होंगे? उनकी मुस्कान कैसी होगी? वे अपने भाइयों के साथ कैसे रहते होंगे? कब मुझे उनके दर्शन होंगे?”
अयोध्या पहुँचकर गुह ने सोचा—
“पहले पवित्र सरयू में स्नान कर लूँ, फिर महाराज दशरथ के महल में जाकर उनके चारों पुत्रों के दर्शन करूँगा।”
😄 11. श्रीराम और भाइयों ने पोटली खोल ली
उसने अपने साथ लाए हुए वन्य कंद-मूल, फल और चार जोड़ी सुंदर पनहियाँ एक पोटली में बाँधकर सरयू के किनारे रख दीं और स्नान करने के लिए नदी में उतर गया।
उसे क्या पता था कि जिस राम के दर्शन के लिए वह इतनी दूर से आया है, वही राम स्वयं उसके पास आने वाले हैं!
उधर कुछ समय बाद चार सुंदर बालक वहाँ आ पहुँचे।
वे इतने मनमोहक थे कि उन्हें देखते ही किसी का भी मन प्रसन्न हो जाए।
वे चारों आपस में खेलते हुए उस पोटली के पास पहुँचे।
उन्हें देखकर गुह ने उन्हें पहचान नहीं पाया।
उसने मन में सोचा—
“कितने सुंदर और सुघर बालक हैं! न जाने ये किसके पुत्र होंगे?”
उधर बालकों की दृष्टि पोटली पर पड़ी।
उन्होंने उत्सुकतावश पोटली खोल दी।
अंदर सुंदर फल और चार जोड़ी पनहियाँ थीं।
बालकों ने पनहियाँ निकाल लीं और पहन लीं। फिर फलों को लेकर खाने लगे।
जब गुह ने यह देखा तो वह कुछ नाराज़ भी हुआ और भीतर-ही-भीतर प्रसन्न भी।
नाराज़ इसलिए कि बिना पूछे उसकी पोटली खोल दी गई थी।
और प्रसन्न इसलिए कि—
“मैं तो ये उपहार लेकर ही राजकुमारों के लिए आया हूँ। अगर इन सुंदर बालकों को ये चीजें इतनी पसंद आ रही हैं, तो अच्छा ही है।”
गुह उनके पास आया और कुछ प्रेम से, कुछ शिकायत के स्वर में पूछने लगा—
“अरे बालकों! तुम लोग किसके बच्चे हो? तुम्हें मालूम भी है कि यह पोटली मैंने किसके लिए लाई थी?”
बालक उसे देखकर मुस्कुराए।
गुह ने आगे कहा—
“मैं यह सब सामान महाराज दशरथ के राजकुमारों के लिए लेकर आया हूँ।”
बालकों ने बड़ी सहजता और मधुर मुस्कान के साथ उत्तर दिया—
“अच्छा! तो फिर ये तो हमारे लिए ही लाए गए हैं।”
गुह को उनके उत्तर पर आश्चर्य हुआ।
उसने उन्हें ध्यान से देखा।
उसके मन में अचानक एक विचार आया—
“कहीं ऐसा तो नहीं…?”
उसने पूछा—
“क्या तुम लोग महाराज दशरथ के राजकुमार हो?”
😭 12. गुह को पता चला—ये ही उसके राम हैं!
बालकों के उत्तर देने से पहले ही जैसे गुह के हृदय को सच्चाई का पता चल गया।
उसका हृदय भीतर से पुकार उठा—
“गुह! यही तो वे चार राजकुमार हैं, जिनके दर्शन के लिए तुम इतने दिनों से तरस रहे थे! यही महाराज दशरथ के पुत्र हैं। और इनमें जो सबसे बड़े हैं—यही तुम्हारे आराध्य, तुम्हारे प्रिय श्रीराम हैं!”
अब तक गुह केवल उन चार सुंदर बालकों को देख रहा था।
लेकिन अगले ही क्षण उसे पता चलने वाला था कि—
जिन्हें वह अपने मन में वर्षों से खोज रहा था, जिनके दर्शन के लिए वह अयोध्या आया था, वे उसके सामने ही खड़े हैं।
बालकों ने भी मुस्कुराकर उसकी बात की पुष्टि कर दी।
उन्होंने कहा—
“सखा! महाराज के कुमार हम ही हैं।”
यह सुनते ही गुह का हृदय भावनाओं से भर उठा।
उसकी आँखों में आँसू आ गए।
उसके हाथ अपने-आप जुड़ गए।
उसका सिर श्रद्धा से झुक गया।
वह श्रीराम के चरणों में गिरने ही वाला था कि श्रीराम और उनके भाइयों ने उसे गिरने नहीं दिया।
श्रीराम और लक्ष्मण ने उसका दाहिना हाथ पकड़ लिया और भरत तथा शत्रुघ्न ने उसका बायाँ हाथ।
चारों भाइयों ने अपने इस नए सखा को प्रेम से अपने साथ महल की ओर ले चले।
गुह की आँखों से आँसू बह रहे थे।
वह सोच रहा था—
“जिस राम के दर्शन के लिए मेरा हृदय इतने वर्षों से व्याकुल था, आज वही राम मेरा हाथ पकड़कर मुझे अपने साथ ले जा रहे हैं!”
उसके लिए इससे बड़ा सौभाग्य और क्या हो सकता था?
यह दृश्य कितना सुंदर रहा होगा!
एक ओर अयोध्या के राजकुमार।
दूसरी ओर वन में रहने वाला निषाद बालक।
लेकिन श्रीराम की दृष्टि में दोनों के बीच कोई अंतर नहीं था।
राम के लिए गुह केवल गुह था—उनका मित्र।
👑 13. दशरथजी ने भी गुह को पुत्र जैसा प्रेम दिया
जब श्रीराम ने गुह का परिचय अपने पिता दशरथजी से कराया तो दशरथजी ने भी उसे प्रेम से अपने हृदय से लगा लिया।
उन्होंने देखा कि—
राम गुह से बहुत प्रसन्न हैं और गुह राम को अपना सर्वस्व मानता है।
दशरथजी ने गुह को अयोध्या में ही रहने के लिए कहा।
उन्होंने कहा कि वह राजकुमारों के साथ रहे, उन्हें जंगल में शिकार करना सिखाए और उनके साथ वन-क्रीड़ा करे।
गुह के लिए तो यह किसी सपने के सच होने जैसा था।
जिस श्रीराम को देखने के लिए वह इतना व्याकुल था, अब वह श्रीराम के साथ रहने वाला उनका सखा बन चुका था।
🏹 14. वन में सिंह वाली घटना
एक दिन श्रीराम अपने भाइयों और मित्रों के साथ वन में गए।
श्रीराम ने कहा—
“आज वन में जो पहला शिकार दिखाई देगा, उस पर मैं ही बाण चलाऊँगा। कोई दूसरा शिकार नहीं करेगा।”
सबने उनकी बात मान ली।
तभी अचानक एक सिंह सामने आ गया।
सिंह श्रीराम पर झपटने ही वाला था।
श्रीराम अभी बाण चलाने की तैयारी ही कर रहे थे।
सभी मित्र और भाई श्रीराम की आज्ञा के कारण चुप खड़े रहे।
लेकिन गुह के लिए सबसे बड़ी बात थी—
“मेरे मित्र श्रीराम को कोई नुकसान नहीं होना चाहिए।”
उसने एक पल भी देर नहीं की।
उसने अपना भाला उठाया और सिंह पर चला दिया।
निशाना सही लगा और सिंह मारा गया।
गुह जानता था कि उसने श्रीराम की आज्ञा का उल्लंघन किया है।
उसे दंड मिल सकता था।
लेकिन उसके मन में एक ही बात थी—
“दंड मुझे मिल जाए, लेकिन मेरे मित्र को कुछ नहीं होना चाहिए।”
श्रीराम गुह की इस भावना को समझ गए।
👑 15. गुह बना शृंगवेरपुर का राजा
जब वे अयोध्या लौटे तो श्रीराम ने अपने पिता दशरथजी को पूरी घटना बताई।
दशरथजी गुह की मित्रता, साहस और निष्ठा से बहुत प्रसन्न हुए।
उन्होंने गुह को अपने हाथ का आभूषण पहनाया और उसे शृंगवेरपुर का राजा बना दिया।
इस प्रकार एक निषाद बालक, जो केवल श्रीराम का मित्र था, श्रीराम के प्रेम और अपने गुणों के कारण निषादराज गुह बन गया।
🌳 16. श्रीराम वनवास के समय गुह के पास पहुँचे
समय बीता।
श्रीराम को वनवास मिला।
श्रीराम, सीता माता और लक्ष्मण जब वन की ओर जा रहे थे, तब वे शृंगवेरपुर पहुँचे।
गुह ने जब अपने प्रिय मित्र श्रीराम को देखा तो उसका हृदय टूट गया।
जिस श्रीराम को उसने राजकुमार के रूप में देखा था, वही आज वनवासी के रूप में उसके सामने खड़े थे।
गुह ने हाथ जोड़कर कहा—
“प्रभु! आप यहीं रह जाइए। आप शृंगवेरपुर का राज्य संभाल लीजिए। मुझे यही सबसे बड़ा सुख मिलेगा।”
लेकिन श्रीराम ने कहा कि उन्हें अपने माता-पिता की आज्ञा का पालन करना है।
गुह समझ गया कि श्रीराम अपने वचन से पीछे नहीं हटेंगे।
उसका मन बहुत दुखी था, लेकिन उसने श्रीराम के निर्णय का सम्मान किया।
🏹 17. भरत की सेना देखकर गुह का प्रेम
जब भरतजी श्रीराम को वापस लाने के लिए सेना लेकर चित्रकूट की ओर जा रहे थे और उनकी सेना शृंगवेरपुर के पास पहुँची, तो गुह को लगा—
“इतनी बड़ी सेना क्यों आई है?”
उसे शंका हुई कि कहीं भरत श्रीराम को नुकसान पहुँचाने तो नहीं आए।
गुह अपने मित्र श्रीराम की रक्षा के लिए युद्ध करने तक तैयार हो गया।
यह उसकी मित्रता की गहराई दिखाता है।
लेकिन जब उसे पता चला कि भरत के मन में श्रीराम के प्रति कितना प्रेम है और वे उन्हें वापस अयोध्या ले जाने आए हैं, तब गुह ने भरत का भी उसी प्रेम से स्वागत किया।
यानी गुह ने राम से प्रेम करने वाले भरत को भी राम जैसा ही सम्मान दिया।
😭 18. चौदह वर्ष बाद श्रीराम की वापसी
अब श्रीराम का वनवास पूरा हो चुका था।
चौदह वर्ष बीत चुके थे।
श्रीराम अयोध्या लौट रहे थे।
जब वे पुष्पक विमान से लौटते हुए शृंगवेरपुर पहुँचे तो लोगों ने निषादराज गुह को बताया—
“प्रभु श्रीराम वापस आ गए हैं!”
लेकिन गुह को विश्वास ही नहीं हुआ।
वह सोचने लगा—
“क्या सचमुच मेरे राम वापस आ गए हैं?
मेरा भाग्य इतना अच्छा कहाँ कि मैं फिर उन्हें देख सकूँ?”
वह वर्षों के वियोग में इतना व्याकुल हो चुका था कि उसे विश्वास नहीं हो रहा था।
❤️ 19. श्रीराम ने स्वयं पुकारा—“मैं आ गया हूँ”
तभी श्रीराम उसके सामने आ गए।
उन्होंने प्रेम से कहा—
“गुह! मैं आ गया हूँ। मुझे देखो।”
गुह ने श्रीराम को देखा।
फिर भी वह जैसे विश्वास नहीं कर पा रहा था।
उसने अपने हाथों से श्रीराम के शरीर को स्पर्श किया।
जैसे ही उसने अपने प्रिय मित्र का स्पर्श महसूस किया—
उसे विश्वास हो गया कि उसके राम सचमुच लौट आए हैं।
वह श्रीराम से लिपट गया।
उसके भीतर चौदह वर्षों का जो वियोग जमा था, वह आँसुओं के रूप में बह निकला।
उसके लिए ऐसा लगा जैसे—
जिसके बिना उसके प्राण ही चले गए थे, वही आज फिर उसके सामने खड़ा है।
उसका जीवन फिर से पूर्ण हो गया।
🌺 इस पूरी कथा का सबसे सुंदर संदेश
गुह की कहानी हमें यह बताती है कि सच्चा प्रेम किसी जाति, पद, धन या ऊँच-नीच को नहीं देखता।
गुह एक निषाद था।
श्रीराम अयोध्या के राजकुमार थे।
लेकिन श्रीराम ने कभी यह नहीं सोचा कि—
“गुह मुझसे अलग है।”
उन्होंने उसे सखा कहा।
और गुह ने भी श्रीराम को केवल राजा नहीं माना।
उसने उन्हें अपना मित्र, अपना जीवन और अपना सर्वस्व माना।
गुह की भक्ति में कोई दिखावा नहीं था।
जब राम राजकुमार थे—गुह उनके साथ था।
जब राम वनवासी बने—गुह तब भी उनके साथ था।
जब उसे लगा कि राम पर संकट है—वह युद्ध के लिए तैयार हो गया।
और जब चौदह वर्ष बाद राम लौटे—गुह का हृदय खुशी और प्रेम से भर गया।
❤️ इसलिए निषादराज गुह की भक्ति को सख्य-भक्ति कहा जाता है।
अर्थात् भगवान को अपना सच्चा मित्र मानकर उनसे प्रेम करना।
और इस कथा की सबसे भावुक बात यही है—
श्रीराम के लिए गुह केवल निषादराज नहीं थे; वे उनके प्रिय सखा थे।
और गुह के लिए श्रीराम केवल अयोध्या के राजा नहीं थे; वे उसके जीवन के प्राण थे।
🌸 श्रीराम और निषादराज गुह 🌸
❤️ एक ऐसी मित्रता, जिसमें कोई भेद नहीं था
सरयू के तट पर प्रेम की,
एक अनोखी गाथा थी,
एक तरफ थे रघुवर राम,
दूजी ओर निषाद की छाया थी।
न धन देखा, न मान देखा,
न देखा कोई पद-प्रतिष्ठान,
राम ने गुह को सखा बनाया,
गुह ने राम को माना प्राण।
राम थे उसके जीवन का धन,
राम ही उसका मान,
राम बिना सूना था जीवन,
राम ही उसकी जान। ❤️
🌿 गुरुद्रुह से गुह बनने तक
घने वन में गुरुद्रुह रहता,
हाथ में लेकर बाण,
शिकार करना जीवन उसका,
वन ही उसका जहान।
एक दिवस शिवरात्रि आई,
शिकार न पाया एक,
घर में भूखा परिवार था उसका,
चिंता लगी अनेक।
बेल-वृक्ष पर चढ़कर बैठा,
ताल किनारे रात,
नीचे शिवलिंग था अनजाना,
नहीं थी उसको ज्ञात।
आई हिरणी जल पीने को,
उसने धनुष उठाया,
तभी अचानक तूँबी का जल,
शिवलिंग पर गिर आया।
बेलपत्र भी नीचे गिरकर,
शिव के शीश चढ़े,
अनजाने में पूजा हुई तो,
भाग्य के द्वार खुले।
🦌 हिरणी का सच्चा वचन
हिरणी बोली—“व्याध! मेरे तो,
छोटे-छोटे बच्चे हैं,
पहले उनको सौंपकर आऊँ,
फिर प्राण आपके हैं।”
जान रही थी लौटने का अर्थ,
मृत्यु सामने खड़ी,
फिर भी उसने सत्य न छोड़ा,
वचन से न हटी घड़ी।
गुरुद्रुह ने धनुष झुका दिया,
जागी दया महान,
पहली बार उसके हृदय में,
बदला मन का ज्ञान।
फिर दूसरी हिरणी आई,
उसने भी वचन दिया,
“परिवार को सौंपकर लौटूँगी,
जीवन मैंने आपको दिया।”
फिर हिरण आया दृढ़ मन लेकर,
उसने भी यही कहा—
“वचन दिया है लौटने का,
झूठ नहीं होगा मेरा।”
❤️ पूरा परिवार लौटा
तीनों जब घर लौटे तो,
सबने सारी बात बताई,
“वचन दिया है उस शिकारी को,
कैसे करें हम बेवफाई?”
बच्चों को भी साथ लिया और,
फिर वन की ओर चले,
जान हथेली पर रखकर,
सत्य के पथ पर चले।
गुरुद्रुह ने देखा उनको,
धनुष फिर से तान लिया,
लेकिन मन ने उसी क्षण,
उससे एक सवाल किया—
“पशु होकर ये वचन निभाएँ,
मानव होकर मैं क्यों हारूँ?
अपने स्वार्थ में डूबा क्यों हूँ,
क्यों न दया को मैं स्वीकारूँ?”
धनुष गिरा उसके हाथों से,
आँखों में जल आया,
“धन्य हो तुम, हे वनवासियों!
तुमने मुझे मनुष्य बनाया।”
🔱 शिवजी का वरदान
करुणा से जब मन भर आया,
शिवजी सामने आए,
गुरुद्रुह के बदले हृदय को,
देख बहुत मुस्कुराए।
बोले—“तेरे जीवन में अब,
भक्ति के दीप जलेंगे,
एक दिवस रघुनंदन राम,
तेरे द्वार स्वयं आएँगे।”
वही गुरुद्रुह आगे चलकर,
गुह के नाम से जाना,
शृंगवेरपुर का राजा बनकर,
राम-प्रेम था उसको पाना।
🌸 अयोध्या में पहली मुलाकात
राम की बातें सुन-सुनकर,
गुह का मन भर आया,
“कब देखूँगा अपने राम को?”
मन ने बार-बार गाया।
कंद-मूल और फल लेकर,
पनहियाँ चार सजाईं,
राम सहित चारों भाइयों के,
लिए भेंट वह लाया।
सरयू तट पर पोटली रखकर,
गुह गया नहाने,
क्या जाने उसके राम स्वयं,
आने वाले थे वहाँ मिलने!
चार बालक खेलते-खेलते,
पोटली तक आ पहुँचे,
फल खाए और पनहियाँ पहनीं,
हँसते-हँसते मुस्कुराए।
गुह ने पूछा—“किसके बच्चे?
क्यों मेरी पोटली खोली?”
बालक बोले—“जिसके लिए लाई,
उसकी ही तो है यह टोली!”
गुह ने देखा ध्यान से उनको,
हृदय लगा कुछ कहने—
“क्या ये दशरथ के राजकुमार हैं?
हाँ, ये वही हैं कहा मन ने?”
😭 मिल गए उसके राम
“महाराज के पुत्र हैं हम,”
बालकों ने मुस्काकर कहा,
गुह का हृदय पुकार उठा—
“यही तो मेरा राम रहा!”
आँखों से आँसू बह निकले,
हाथ जुड़ गए अपने आप,
राम के चरणों में गिरने से पहले,
राम ने थाम लिया उसका हाथ।
लक्ष्मण ने भी हाथ थामा,
भरत-शत्रुघ्न साथ,
चारों भाई लेकर चले,
गुह को अपने साथ।
गुह सोच रहा—“जिस राम के लिए,
मैं वर्षों से तरसा था,
आज वही मेरा हाथ पकड़कर,
मुझे अपने संग ले चला!”
निषाद था वह, राम राजकुमार,
फिर भी मिट गया भेद,
राम की आँखों में गुह था केवल,
एक प्रिय सखा—न कोई खेद।
👑 दशरथ का प्रेम
राम ने जब गुह को मिलवाया,
दशरथ ने अपनाया,
पुत्र समान उसे गले लगाकर,
हृदय से प्रेम जताया।
राम के संग रहो तुम गुह,
वन-क्रीड़ा तुम सिखलाना,
राजकुमारों के प्रिय सखा बन,
सदा प्रेम निभाना।
गुह का जीवन धन्य हुआ,
मिल गया प्रेम महान,
राजमहल से बढ़कर उसको,
मिल गया राम का मान।
🏹 मित्र के लिए सिंह से युद्ध
एक दिवस वन में राम गए थे,
भाइयों के संग-साथ,
अचानक एक सिंह आ पहुँचा,
लेकर मृत्यु की घात।
राम ने धनुष उठाया था,
सबको रुकने को कहा,
पर गुह का हृदय पुकार उठा—
“मित्र को कैसे संकट में छोड़ दूँ भला?”
भाला लेकर गुह दौड़ा,
सिंह पर वार किया,
राम की रक्षा के लिए उसने,
अपना भय त्याग दिया।
आज्ञा भले ही टूट गई थी,
प्रेम नहीं टूटा था,
मित्र की रक्षा के आगे,
उसका सब कुछ छोटा था।
दशरथ ने जब बात सुनी तो,
गुह पर हुए निहाल,
शृंगवेरपुर का राजा बनाकर,
किया उसे खुशहाल।
🌳 वनवास में राम और गुह
समय बदला, वनवास मिला,
राम चले वन ओर,
सीता और लक्ष्मण संग थे,
हृदय में था घनघोर।
शृंगवेरपुर जब राम पहुँचे,
गुह दौड़ा लेने,
राजकुमार को वनवासी देख,
आँसू लगे बहने।
बोला—“राम! यहीं रह जाओ,
मेरा राज्य तुम्हारा,
तुम्हारे चरणों में रख दूँ,
सब कुछ आज हमारा।”
राम बोले—“पिता का वचन है,
कैसे उसे मैं छोड़ूँ?
चौदह वर्ष की प्रतिज्ञा लेकर,
कैसे पीछे मुड़ूँ?”
गुह का मन रोया भीतर,
फिर भी शीश झुकाया,
मित्र के वचन का सम्मान किया,
राम को आगे बढ़ाया।
🏹 भरत की सेना आई
जब भरत सेना लेकर आए,
गुह हुआ हैरान,
“इतनी सेना क्यों आई है?
कहीं न हो राम को नुकसान!”
राम की खातिर युद्ध करने को,
गुह हुआ तैयार,
मित्र की रक्षा के आगे,
छोटा था संसार।
लेकिन जब भरत का प्रेम समझा,
हृदय हुआ प्रसन्न,
“राम को लेने आए हैं भरत,”
जानकर हुआ मग्न।
राम के प्रिय जो भी होते,
गुह उन्हें अपनाता,
राम से प्रेम करने वाला,
उसे राम-सा मानता।
❤️ चौदह वर्ष बाद
चौदह वर्ष बीत गए थे,
वनवास हुआ समाप्त,
राम अयोध्या लौट रहे थे,
खुशियों का था वक्त।
शृंगवेरपुर में खबर पहुँची—
“राम लौटकर आए!”
गुह बोला—“क्या सच है?
क्या मेरे राम सचमुच आए?”
वियोग ने ऐसा तोड़ा था,
विश्वास नहीं होता,
राम बिना उसका जीवन जैसे,
जीवन ही नहीं होता।
तभी सामने राम खड़े थे,
चेहरे पर मुस्कान—
“गुह! मैं आ गया हूँ मित्र,
देखो अपना राम!”
गुह ने राम को छूकर देखा,
आँखों से आँसू आए,
चौदह वर्षों के सारे आँसू,
एक साथ बह जाएँ।
राम से लिपट गया गुह फिर,
भर आया उसका मन,
जैसे सूखे वृक्ष को मिल जाए,
वर्षा का पहला जल।
🌺 सखा-भक्ति का अमर संदेश
निषाद था गुह, राम थे राजा,
फिर भी एक समान,
राम ने उसको सखा कहा,
गुह ने दिए प्राण।
राज मिला तो राम के संग था,
वन मिला तो राम,
संकट आया तो ढाल बना वह,
वियोग में भी राम।
न जाति देखी, न धन देखा,
न देखा ऊँचा-नीच,
सच्चे प्रेम की एक ही भाषा—
हृदय से हृदय की खींच।
भगवान मिले तो भक्त कहे—
“मुझे चाहिए क्या और?”
गुह को राम मिले जब सखा बन,
भर गया जीवन का भंडार।
राम के लिए गुह केवल,
निषादराज नहीं था,
वह तो उनका प्रिय सखा था,
जिससे कोई भेद नहीं था।
और गुह के लिए राम केवल,
अयोध्या के राजा नहीं—
राम उसके प्राण थे,
राम से बढ़कर कोई दूजा नहीं। ❤️
यही सखा-भक्ति का सुंदर सार,
यही प्रेम की पहचान—
जिस हृदय में राम बस जाएँ,
वहीं बन जाता है भगवान। 🌸
जय श्रीराम। 🙏
🌸 प्रश्न–उत्तर
1. गुह के पूर्वजन्म का नाम क्या था और वह क्या काम करता था?
उत्तर: गुह के पूर्वजन्म का नाम गुरुद्रुह था। वह जंगल में रहता था और शिकार करके अपने परिवार का पालन-पोषण करता था।
2. गुरुद्रुह से अनजाने में शिवजी की पूजा कैसे हुई?
उत्तर: बेल के पेड़ पर बैठे गुरुद्रुह की तूँबी से पानी और बेलपत्र शिवलिंग पर गिरते रहे, जिससे अनजाने में शिवजी की पूजा हुई।
3. पहली हिरणी ने गुरुद्रुह से क्या प्रार्थना की?
उत्तर: पहली हिरणी ने अपने बच्चों को सुरक्षित करने के लिए जाने की अनुमति माँगी और उन्हें सौंपकर वापस लौटने का वचन दिया।
4. हिरण परिवार की कौन-सी विशेषता देखकर गुरुद्रुह का हृदय बदल गया?
उत्तर: गुरुद्रुह ने देखा कि हिरण परिवार अपने वचन को निभाने के लिए मृत्यु का भय छोड़कर वापस आया। इससे उसके हृदय में करुणा जागी।
5. भगवान शिव ने गुरुद्रुह को क्या आशीर्वाद दिया?
उत्तर: भगवान शिव ने गुरुद्रुह को आशीर्वाद दिया कि भविष्य में श्रीराम स्वयं उसके घर आएँगे और उससे मित्रता करेंगे।
6. गुह के पिता और महाराज दशरथ के बीच कैसा संबंध था?
उत्तर: गुह के पिता और महाराज दशरथ में बहुत अच्छी मित्रता थी। इसी कारण गुह को अयोध्या जाकर राजकुमारों से मिलने का अवसर मिला।
7. गुह श्रीराम के लिए अयोध्या क्या लेकर गया था?
उत्तर: गुह श्रीराम और उनके भाइयों के लिए वन से प्राप्त कंद-मूल, फल और चार जोड़ी सुंदर पनहियाँ लेकर अयोध्या पहुँचा।
8. गुह ने श्रीराम को पहली बार कैसे पहचाना?
उत्तर: जब बालकों ने बताया कि वे महाराज दशरथ के पुत्र हैं, तब गुह समझ गया कि उनमें सबसे बड़े बालक श्रीराम हैं।
9. श्रीराम और उनके भाइयों ने गुह के साथ कैसा व्यवहार किया?
उत्तर: चारों भाइयों ने गुह को प्रेम से अपना सखा माना, उसका हाथ पकड़ा और उसे अपने साथ महल ले गए।
10. महाराज दशरथ ने गुह को क्या सम्मान दिया?
उत्तर: महाराज दशरथ ने गुह को पुत्र जैसा प्रेम दिया और राजकुमारों के साथ रहने तथा उनके साथ वन-क्रीड़ा करने की अनुमति दी।
11. सिंह वाली घटना में गुह ने श्रीराम की रक्षा कैसे की?
उत्तर: जब सिंह श्रीराम पर झपटने वाला था, तब गुह ने बिना देर किए भाला चलाकर सिंह को मार दिया।
12. गुह को शृंगवेरपुर का राजा कैसे बनाया गया?
उत्तर: गुह की मित्रता, साहस और श्रीराम के प्रति निष्ठा से प्रसन्न होकर महाराज दशरथ ने उसे अपने हाथ का आभूषण पहनाकर राजा बनाया।
13. श्रीराम के वनवास के समय गुह ने क्या इच्छा व्यक्त की?
उत्तर: गुह ने श्रीराम से शृंगवेरपुर में रुकने और राज्य संभालने का आग्रह किया, लेकिन श्रीराम ने माता-पिता की आज्ञा को सर्वोपरि माना।
14. भरत की सेना देखकर गुह को क्या शंका हुई?
उत्तर: बड़ी सेना देखकर गुह को शंका हुई कि शायद भरत श्रीराम को नुकसान पहुँचाने आए हैं, इसलिए वह उनकी रक्षा के लिए युद्ध को तैयार हुआ।
15. भरत के प्रति गुह का दृष्टिकोण बाद में कैसे बदला?
उत्तर: जब गुह को भरत के श्रीराम के प्रति सच्चे प्रेम का पता चला, तब उसने भरत का भी प्रेमपूर्वक स्वागत और सम्मान किया।
16. चौदह वर्ष बाद श्रीराम के लौटने पर गुह की क्या स्थिति हुई?
उत्तर: श्रीराम को देखकर गुह को पहले विश्वास नहीं हुआ। स्पर्श से सत्य जानकर वह भावुक हो गया और प्रेम से उनसे लिपट गया।
17. गुह की भक्ति को सख्य-भक्ति क्यों कहा जाता है?
उत्तर: गुह ने श्रीराम को केवल भगवान या राजा नहीं, बल्कि अपना सच्चा मित्र और जीवन का सर्वस्व माना। इसलिए उसकी भक्ति सख्य-भक्ति कहलाती है।
18. गुह और श्रीराम की मित्रता से हमें क्या संदेश मिलता है?
उत्तर: उनकी मित्रता सिखाती है कि सच्चा प्रेम जाति, पद, धन और ऊँच-नीच नहीं देखता; वह केवल प्रेम, विश्वास और निष्ठा पर आधारित होता है।
🌸 श्रीगुह निषादराज और श्रीराम की प्रेममयी मित्रता — MCQs
1. गुह के लिए श्रीराम केवल क्या नहीं थे?
A. अयोध्या के राजकुमार
B. उसके प्रिय मित्र
C. उसके जीवन का सबसे बड़ा धन
D. उसके हृदय के स्वामी
उत्तर: A. अयोध्या के राजकुमार
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2. गुह के पूर्वजन्म में उसका नाम क्या बताया गया है?
A. गुरुद्रुह
B. निषाद
C. शृंग
D. व्याधराज
उत्तर: A. गुरुद्रुह
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3. गुरुद्रुह किस कार्य से अपने परिवार का पालन करता था?
A. खेती करके
B. व्यापार करके
C. शिकार करके
D. मछली बेचकर
उत्तर: C. शिकार करके
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4. गुरुद्रुह किस दिन शिकार करने जंगल गया था?
A. जन्माष्टमी
B. महाशिवरात्रि
C. रामनवमी
D. दीपावली
उत्तर: B. महाशिवरात्रि
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5. गुरुद्रुह बेल के पेड़ पर क्यों चढ़कर बैठा था?
A. आराम करने के लिए
B. फल तोड़ने के लिए
C. रात में आने वाले जानवर का शिकार करने के लिए
D. रास्ता देखने के लिए
उत्तर: C. रात में आने वाले जानवर का शिकार करने के लिए
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6. बेल के पेड़ के नीचे क्या था?
A. भगवान विष्णु की मूर्ति
B. भगवान शिव का शिवलिंग
C. देवी की प्रतिमा
D. एक मंदिर
उत्तर: B. भगवान शिव का शिवलिंग
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7. गुरुद्रुह के कंधे पर क्या लटका हुआ था?
A. फल की टोकरी
B. जल से भरी तूँबी
C. लकड़ी की पोटली
D. भोजन की थैली
उत्तर: B. जल से भरी तूँबी
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8. पहली हिरणी को देखकर गुरुद्रुह ने क्या उठाया?
A. तलवार
B. भाला
C. धनुष-बाण
D. गदा
उत्तर: C. धनुष-बाण
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9. पहली हिरणी ने गुरुद्रुह से क्या वचन दिया?
A. वह उसे भोजन देगी
B. वह अपने बच्चों को सुरक्षित करके वापस आएगी
C. वह जंगल छोड़ देगी
D. वह अपने परिवार को लेकर कहीं और चली जाएगी
उत्तर: B. वह अपने बच्चों को सुरक्षित करके वापस आएगी
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10. हिरण और हिरणियों की कौन-सी विशेषता देखकर गुरुद्रुह प्रभावित हुआ?
A. उनकी शक्ति
B. उनकी गति
C. उनके सत्य और वचन पालन से
D. उनकी सुंदरता
उत्तर: C. उनके सत्य और वचन पालन से
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11. पूरा हिरण परिवार वापस क्यों आया?
A. उन्हें भोजन चाहिए था
B. उन्होंने शिकारी से किया हुआ वचन निभाना था
C. वे रास्ता भूल गए थे
D. वे दूसरे जंगल जाना चाहते थे
उत्तर: B. उन्होंने शिकारी से किया हुआ वचन निभाना था
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12. हिरण परिवार को देखकर गुरुद्रुह के मन में क्या भावना उत्पन्न हुई?
A. क्रोध
B. लोभ
C. करुणा और आत्मग्लानि
D. भय
उत्तर: C. करुणा और आत्मग्लानि
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13. गुरुद्रुह ने अंत में हिरण परिवार के साथ क्या किया?
A. उन्हें पकड़ लिया
B. उन्हें मार दिया
C. उन्हें सुरक्षित जाने दिया
D. उन्हें अपने घर ले गया
उत्तर: C. उन्हें सुरक्षित जाने दिया
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14. गुरुद्रुह के हृदय में परिवर्तन देखकर कौन प्रसन्न हुए?
A. भगवान विष्णु
B. भगवान शिव
C. भगवान ब्रह्मा
D. महाराज दशरथ
उत्तर: B. भगवान शिव
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15. भगवान शिव ने गुरुद्रुह को क्या आशीर्वाद दिया?
A. वह अयोध्या का राजा बनेगा
B. श्रीराम उसके घर आएँगे और उससे मित्रता करेंगे
C. वह बहुत धनवान बनेगा
D. उसे अमरत्व प्राप्त होगा
उत्तर: B. श्रीराम उसके घर आएँगे और उससे मित्रता करेंगे
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16. गुरुद्रुह आगे चलकर किस नाम से प्रसिद्ध हुआ?
A. निषादराज गुह
B. राजा जनक
C. शृंगराज
D. व्याधराज
उत्तर: A. निषादराज गुह
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17. गुह के पिता की किससे अच्छी मित्रता थी?
A. महाराज जनक से
B. महाराज दशरथ से
C. भरत से
D. विश्वामित्र से
उत्तर: B. महाराज दशरथ से
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18. गुह श्रीराम को पहली बार देखने के लिए कहाँ गया?
A. चित्रकूट
B. शृंगवेरपुर
C. अयोध्या
D. वन
उत्तर: C. अयोध्या
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19. गुह श्रीराम और उनके भाइयों के लिए क्या लेकर गया था?
A. सोने के आभूषण
B. कंद-मूल, फल और पनहियाँ
C. धनुष और तलवार
D. वस्त्र और मुकुट
उत्तर: B. कंद-मूल, फल और पनहियाँ
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20. गुह ने अपनी पोटली कहाँ रखी थी?
A. राजमहल में
B. जंगल में
C. सरयू के किनारे
D. दशरथजी के कक्ष में
उत्तर: C. सरयू के किनारे
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21. गुह के सरयू में स्नान करने के दौरान उसकी पोटली किसने खोल ली?
A. सैनिकों ने
B. चार बालकों ने
C. सेवकों ने
D. वनवासियों ने
उत्तर: B. चार बालकों ने
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22. चारों बालकों ने पोटली से क्या निकाला?
A. धनुष और बाण
B. पनहियाँ और फल
C. वस्त्र और आभूषण
D. जल और भोजन
उत्तर: B. पनहियाँ और फल
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23. गुह को कब पता चला कि वे चार बालक महाराज दशरथ के पुत्र हैं?
A. जब उसने उन्हें राजमहल में देखा
B. जब उन्होंने स्वयं बताया
C. जब दशरथजी वहाँ आए
D. जब एक सैनिक ने बताया
उत्तर: B. जब उन्होंने स्वयं बताया
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24. चारों राजकुमारों ने गुह को किस भाव से अपने साथ लिया?
A. सेवक के रूप में
B. अतिथि के रूप में
C. सखा के रूप में
D. सैनिक के रूप में
उत्तर: C. सखा के रूप में
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25. गुह को श्रीराम के प्रति अपनी भावना व्यक्त करते समय कैसी अनुभूति हुई?
A. भय
B. ईर्ष्या
C. अत्यंत भावुकता और आनंद
D. क्रोध
उत्तर: C. अत्यंत भावुकता और आनंद
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26. महाराज दशरथ ने गुह के साथ कैसा व्यवहार किया?
A. उसे दूर कर दिया
B. उसे पुत्र जैसा प्रेम दिया
C. उसे दंड दिया
D. उसे अयोध्या से बाहर भेज दिया
उत्तर: B. उसे पुत्र जैसा प्रेम दिया
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27. दशरथजी ने गुह को राजकुमारों के साथ क्या करने के लिए कहा?
A. केवल महल में रहने के लिए
B. उन्हें जंगल में शिकार और वन-क्रीड़ा सिखाने के लिए
C. उन्हें पढ़ाने के लिए
D. उन्हें युद्ध से दूर रखने के लिए
उत्तर: B. उन्हें जंगल में शिकार और वन-क्रीड़ा सिखाने के लिए
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28. वन में अचानक श्रीराम के सामने कौन-सा जानवर आ गया?
A. बाघ
B. हाथी
C. सिंह
D. भालू
उत्तर: C. सिंह
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29. सिंह को देखकर गुह ने क्या किया?
A. वहाँ से भाग गया
B. श्रीराम के पीछे छिप गया
C. भाला चलाकर सिंह को मार दिया
D. श्रीराम को रोक दिया
उत्तर: C. भाला चलाकर सिंह को मार दिया
⸻
30. गुह ने श्रीराम की आज्ञा का उल्लंघन क्यों किया?
A. वह स्वयं शिकार करना चाहता था
B. वह श्रीराम की रक्षा करना चाहता था
C. उसे श्रीराम की आज्ञा सुनाई नहीं दी
D. उसे सिंह से डर नहीं लगता था
उत्तर: B. वह श्रीराम की रक्षा करना चाहता था
⸻
31. गुह के साहस और निष्ठा से प्रसन्न होकर दशरथजी ने उसे क्या बनाया?
A. सेनापति
B. मंत्री
C. शृंगवेरपुर का राजा
D. अयोध्या का सैनिक
उत्तर: C. शृंगवेरपुर का राजा
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32. वनवास के समय श्रीराम, सीता और लक्ष्मण कहाँ पहुँचे?
A. मिथिला
B. शृंगवेरपुर
C. लंका
D. हस्तिनापुर
उत्तर: B. शृंगवेरपुर
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33. श्रीराम को वनवासी रूप में देखकर गुह की क्या इच्छा थी?
A. उन्हें युद्ध के लिए बुलाना
B. उन्हें शृंगवेरपुर में रोक लेना
C. उनसे दूर चले जाना
D. उन्हें अयोध्या भेज देना
उत्तर: B. उन्हें शृंगवेरपुर में रोक लेना
⸻
34. गुह ने भरत की सेना को देखकर क्या सोचा?
A. भरत श्रीराम को वापस लेने आए हैं
B. भरत श्रीराम को नुकसान पहुँचाने आए हैं
C. भरत शिकार करने आए हैं
D. भरत अयोध्या छोड़ रहे हैं
उत्तर: B. भरत श्रीराम को नुकसान पहुँचाने आए हैं
⸻
35. भरत के वास्तविक उद्देश्य का पता चलने पर गुह ने क्या किया?
A. भरत से युद्ध किया
B. भरत का स्वागत किया
C. वहाँ से भाग गया
D. श्रीराम को छिपा दिया
उत्तर: B. भरत का स्वागत किया
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36. श्रीराम का वनवास कितने वर्षों का था?
A. 10 वर्ष
B. 12 वर्ष
C. 14 वर्ष
D. 16 वर्ष
उत्तर: C. 14 वर्ष
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37. श्रीराम की वापसी का समाचार सुनकर गुह को पहले क्या लगा?
A. उसे तुरंत विश्वास हो गया
B. उसे विश्वास नहीं हुआ
C. वह क्रोधित हो गया
D. वह डर गया
उत्तर: B. उसे विश्वास नहीं हुआ
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38. श्रीराम ने गुह को वापस आने पर क्या कहा?
A. “गुह, तुम कहाँ थे?”
B. “गुह! मैं आ गया हूँ। मुझे देखो।”
C. “गुह, अयोध्या चलो।”
D. “गुह, मुझे पहचानो।”
उत्तर: B. “गुह! मैं आ गया हूँ। मुझे देखो।”
⸻
39. गुह को श्रीराम के लौटने का पूरा विश्वास किससे हुआ?
A. लोगों के कहने से
B. श्रीराम के मुकुट को देखकर
C. श्रीराम के स्पर्श से
D. पुष्पक विमान को देखकर
उत्तर: C. श्रीराम के स्पर्श से
⸻
40. गुह की श्रीराम के प्रति भक्ति को किस प्रकार की भक्ति कहा गया है?
A. दास्य-भक्ति
B. वात्सल्य-भक्ति
C. सख्य-भक्ति
D. शांत-भक्ति
उत्तर: C. सख्य-भक्ति
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41. सख्य-भक्ति का अर्थ क्या है?
A. भगवान को गुरु मानकर प्रेम करना
B. भगवान को अपना सच्चा मित्र मानकर प्रेम करना
C. भगवान को राजा मानकर डरना
D. भगवान से केवल प्रार्थना करना
उत्तर: B. भगवान को अपना सच्चा मित्र मानकर प्रेम करना
⸻
42. गुह और श्रीराम की मित्रता का सबसे प्रमुख संदेश क्या है?
A. धन ही सबसे महत्वपूर्ण है
B. मित्रता केवल समान पद वालों में होती है
C. सच्चा प्रेम जाति, पद, धन और ऊँच-नीच नहीं देखता
D. राजा केवल राजाओं से मित्रता करता है
उत्तर: C. सच्चा प्रेम जाति, पद, धन और ऊँच-नीच नहीं देखता