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नागा बाबा और वटवृक्ष की लीला—उलझी जटा और सुलझा जीवन
वृन्दावन की पावन भूमि पर एक महान विरक्त महात्मा का निवास था। लोग उन्हें श्रद्धा से नागा बाबा कहा करते थे।
वे जीवन भर युगल स्वरूप — श्री राधा-कृष्ण की उपासना में लीन रहते थे। संसार से उनका कोई लेना-देना नहीं था; उनकी साधना, उनका प्राण, सब कुछ केवल नित्य-निकुंजबिहारी युगल सरकार ही थे।
एक संध्या, नित्य की भाँति संध्या-वंदन पूर्ण कर नागा बाबा कुंजवन की ओर जा रहे थे। मार्ग में एक विशाल वटवृक्ष के नीचे से गुजरते समय अचानक उनकी जटाएँ उस वटवृक्ष की जटाओं में उलझ गईं। बाबा ने बहुत प्रयास किया—खींचा, सुलझाया, प्रार्थना की—पर जटाएँ जैसे किसी अदृश्य बंधन में बँध गई हों।
अंततः बाबा वहीं भूमि पर आसन जमा कर बैठ गए और दृढ़ स्वर में बोले— “जिसने मेरी जटाएँ उलझाई हैं, वही आकर सुलझाएगा। अन्यथा मैं यहीं बैठा रहूँगा, चाहे प्राण ही क्यों न त्यागने पड़ें।”
तीन दिन बीत गए। न अन्न, न जल, न निद्रा—केवल “गोविन्दाय नमो नमः” का जप।
तीसरे दिन एक साँवला-सलोना ग्वाल बालक, लगभग पाँच-सात वर्ष का, हाथ में लाठी लिए वहाँ आया। उसकी आँखों में शरारत थी और चेहरे पर अपार करुणा।
वह ब्रजभाषा में बड़े प्रेम से बोला— “बाबा! तुम्हारी तो जटा उलझ गई हैं। अरे, मैं सुलझा दऊँ का?”
महात्मा जी चौंक पड़े और डाँटते हुए बोले— “हाथ मत लगाना! पीछे हटो। तुम कौन हो?”
बालक हँसकर बोला— “हमारो जैय गाम है महाराज। गैया चरा रह्यो हूँ। तुम्हारी जटा उलझी देखी तो सोची, सुलझा दऊँ।”
पर बाबा अडिग रहे— “नहीं! जिसने उलझाई है, वही आएगा।”
बालक ने मासूमियत से पूछा— “तो नाम बता देयो महाराज, बुला लाऊँगो।”
बाबा बोले— “नाम नहीं बताते। वह स्वयं आ जाएगा।”
कुछ देर तक बालक समझाता रहा, पर बाबा नहीं माने। तभी वह बालक मंद मुस्कान के साथ तेज से दीप्त हो उठा। अगले ही क्षण ग्वालिया का भेष विलीन हो गया और साक्षात् मुरली बजाते हुए भगवान बाँकेबिहारी प्रकट हो गए।
सांवरिया सरकार बोले— “महात्मन! मैंने जटा उलझाई है। लो, आ गया मैं।”
वे जैसे ही आगे बढ़े, बाबा ने फिर कहा— “हाथ मत लगाना! पहले बताओ—तुम कौन से कृष्ण हो?”
भगवान मुस्कुराए— “कौन से कृष्ण? मतलब?”
महात्मा जी गंभीर स्वर में बोले— “कृष्ण भी अनेक होते हैं—
देवकीनन्दन कृष्ण,
यशोदानन्दन कृष्ण, द्वारकाधीश कृष्ण,
और नित्य-निकुंजबिहारी कृष्ण।
बताओ, तुम कौन से हो?”
भगवान ने विनम्रता से पूछा— “आपको कौन से चाहिए?”
बाबा बोले— “मैं तो केवल नित्य-निकुंजबिहारी कृष्ण का उपासक हूँ।”
भगवान बोले— “वही तो मैं हूँ।”
पर बाबा तुरंत बोले— “नहीं! नित्य-निकुंजबिहारी कृष्ण किशोरी जी के बिना एक क्षण भी नहीं रहते। तुम तो अकेले खड़े हो!”
इतना कहते ही आकाश में बिजली-सी चमकी। भगवान के कंधे पर एक अलौकिक तेज प्रकट हुआ और उसी क्षण वृषभानु नंदिनी, वृन्दावनेश्वरी, रासेश्वरी श्री राधिका जी अपने प्रियतम को आलिंगन किए प्रकट हुईं।
स्वामिनी जी करुण स्वर में बोलीं— “बाबा! क्या मैं अलग हूँ? मैं ही तो कृष्ण हूँ और कृष्ण ही तो मैं हूँ। हम दोनों एक हैं।”
युगल स्वरूप के साक्षात् दर्शन पाकर बाबा भाव-विभोर हो गए। उनकी आँखों से प्रेमाश्रु बहने लगे। वे चरणों में गिर पड़े और बोले— “अब जटा नहीं, हे युगल सरकार! अब तो मेरा जीवन सुलझा दो। मुझे इस संसार से मुक्त कर नित्य-लीला में स्थान प्रदान करो।” इतना कहते-कहते बाबा का शरीर शांत हो गया।
युगल सरकार ने उन्हें अपनी नित्य-लीला में प्रवेश दिया।
आज भी बरसाने से लगभग आठ किलोमीटर दूर ‘कदम खंडी’ गाँव में नागा बाबा की समाधि स्थित है, जो इस अलौकिक लीला की साक्षी है।
कथा की सीख (Moral)
सच्ची भक्ति में परीक्षा होती है, और परीक्षा में खरा उतरने वाला ही ईश्वर को साक्षात् पाता है।
राधा-कृष्ण अलग नहीं, अभिन्न हैं—जो इस रहस्य को जान ले, वही पूर्ण भक्त है।
बाहरी चमत्कार नहीं, अंतर की निष्ठा और प्रेम ईश्वर को प्रकट करता है।
जो अपने आराध्य को पहचान लेता है, उसका जीवन स्वयं सुलझ जाता है।