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जनक की मंगलकामना और इक्ष्वाकुवंश की गौरवगाथा

 

भोर का सुनहरा प्रकाश मिथिला की धरती पर फैल रहा था। यज्ञ की पवित्र अग्नि धीरे-धीरे शांत हो चुकी थी और वातावरण में अभी भी हवन की सुगंध तैर रही थी। राजा जनक, जिन्होंने महर्षियों के सहयोग से अपना यज्ञ सफलतापूर्वक पूर्ण किया था, मन में गहरी संतुष्टि अनुभव कर रहे थे। उनकी दृष्टि गंभीर थी, पर हृदय में एक और शुभ विचार जन्म ले चुका था। वे अपने पुरोहित शतानंदजी की ओर मुड़े और प्रेम तथा आदर से बोले। उनके स्वर में भाई के प्रति स्नेह और इस शुभ अवसर को साझा करने की तीव्र इच्छा झलक रही थी।

 

जनक ने अपने छोटे भाई कुशध्वज का स्मरण किया—वह वीर, तेजस्वी और धर्मपरायण राजा, जो इक्षुमती नदी के तट पर स्थित सुंदर सांकाश्या नगरी में निवास करता था। जनक ने उस नगर का वर्णन करते हुए बताया कि वह चारों ओर से सुदृढ़ परकोटों से सुरक्षित है। शत्रुओं के आक्रमण से रक्षा करने के लिए वहाँ अनेक यंत्र स्थापित हैं। वह नगरी मानो पुष्पक विमान के समान विस्तृत और स्वर्गलोक की भाँति शोभायमान है। जनक के शब्दों में अपने भाई के राज्य के प्रति गर्व भी था और भाई के प्रति स्नेह भी।

 

उन्होंने कहा कि इस अत्यंत शुभ अवसर—सीता और राम के विवाह की मंगल घड़ी—पर वे अपने प्रिय भाई को अपने पास देखना चाहते हैं। उनके मन में यह भी भाव था कि कुशध्वज इस यज्ञ और विवाह के रक्षक के समान हैं, और उनके बिना यह आनंद अधूरा रहेगा। शतानंदजी ने राजा की भावना को समझा और शांत स्वभाव के कुछ विश्वस्त पुरुषों को बुलाया। जनक ने उन्हें आदेश दिया कि वे तुरंत सांकाश्या जाकर कुशध्वज को आदर सहित बुलाकर लाएँ।

 

राजा की आज्ञा पाकर वे दूत तेज घोड़ों पर सवार होकर निकल पड़े। उनकी गति इतनी तीव्र थी मानो इंद्र के दूत स्वयं भगवान विष्णु को बुलाने जा रहे हों। लंबी यात्रा के बाद वे सांकाश्या पहुँचे और कुशध्वज के समक्ष उपस्थित हुए। उन्होंने मिथिला का सारा समाचार और जनक की विनम्र इच्छा सुनाई। भाई का स्नेहभरा निमंत्रण सुनते ही कुशध्वज का हृदय प्रसन्नता से भर उठा। वे बिना विलंब किए मिथिला के लिए प्रस्थान कर गए।

 

मिथिला पहुँचकर उन्होंने अपने बड़े भाई जनक का दर्शन किया। दोनों भाइयों का मिलन अत्यंत हृदयस्पर्शी था—आदर, प्रेम और आत्मीयता से भरा हुआ। कुशध्वज ने शतानंदजी और जनक को प्रणाम किया और उन्हें योग्य दिव्य सिंहासन पर बैठाया गया। दोनों तेजस्वी भाइयों ने परस्पर विचार किया कि अब विवाह की तैयारी को आगे बढ़ाया जाए। उन्होंने मंत्री सुदामन को बुलाकर आदेश दिया कि वे तुरंत अयोध्या के महाराज दशरथ को उनके पुत्रों और मंत्रियों सहित आमंत्रित करें।

 

सुदामन आज्ञा पाकर दशरथ के शिविर में पहुँचे। उन्होंने विनम्रता से प्रणाम कर जनक की ओर से संदेश दिया कि मिथिलापति अपने उपाध्याय और पुरोहित सहित उनके दर्शन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। यह सुनकर दशरथ अत्यंत प्रसन्न हुए। वे अपने मंत्रियों, ऋषियों और बंधु-बांधवों के साथ जनक के पास पहुँचे।

 

दो महान राजाओं का यह मिलन अत्यंत गरिमामय था। दशरथ ने आदरपूर्वक कहा कि उनके कुल के मार्गदर्शक महर्षि वसिष्ठ हैं, और उनके यहाँ सभी कार्य उन्हीं की आज्ञा से होते हैं। उन्होंने निवेदन किया कि यदि महर्षि विश्वामित्र की अनुमति हो, तो वसिष्ठ पहले उनके कुल का परिचय दें। यह सुनकर वसिष्ठ मुनि आगे बढ़े और शांत, गंभीर स्वर में इक्ष्वाकुवंश की गौरवशाली परंपरा का वर्णन आरंभ किया।

 

उन्होंने सृष्टि के आदिकाल का स्मरण कराया—जब ब्रह्मा से मरीचि उत्पन्न हुए, मरीचि से कश्यप, कश्यप से विवस्वान, और विवस्वान से वैवस्वत मनु का जन्म हुआ। मनु से इक्ष्वाकु उत्पन्न हुए, जो अयोध्या के प्रथम राजा बने। उनके बाद कुक्षि, विकुक्षि, बाण, अनरण्य, पृथु और त्रिशंकु जैसे तेजस्वी राजा हुए। त्रिशंकु के पुत्र धुंधुमार और उनसे युवनाश्व हुए। युवनाश्व के पुत्र मान्धाता हुए, जो समस्त पृथ्वी के स्वामी माने गए।

 

वंश आगे बढ़ता गया—सुसंधि, ध्रुवसंधि, भरत, असित। असित के समय शत्रुओं ने उन्हें घेर लिया, और वे अपनी रानियों सहित हिमालय की ओर चले गए। वहीं उनका देहांत हुआ, और उनकी दोनों रानियाँ गर्भवती थीं। उनमें से एक को दूसरी ने विष देकर गर्भ नष्ट करने का प्रयास किया। किंतु उसी समय भृगुवंशी महर्षि च्यवन वहाँ तपस्या कर रहे थे। विषग्रस्त रानी कालिंदी ने उनसे पुत्र की कामना की।

 

च्यवन मुनि ने दिव्य दृष्टि से कहा कि उसके गर्भ में महान तेजस्वी पुत्र है, जो विष के साथ जन्म लेगा और संसार में प्रसिद्ध होगा। समय आने पर पुत्र जन्मा, और विष के साथ उत्पन्न होने के कारण उसका नाम ‘सगर’ पड़ा। सगर से असमंज, उनसे अंशुमान, उनसे दिलीप और उनसे भगीरथ हुए—वही भगीरथ जिन्होंने गंगा को पृथ्वी पर लाकर अपने पूर्वजों का उद्धार किया।

 

वंश में आगे ककुत्स्थ, रघु, प्रवृद्ध, शंखण, सुदर्शन, अग्निवर्ण, शीघ्रग, मरु, प्रशुश्रुक, अम्बरीष, नहुष, ययाति, नाभाग, अज और फिर दशरथ हुए। दशरथ से ही राम और लक्ष्मण का जन्म हुआ—दोनों तेजस्वी, धर्मपरायण और वीर।

 

वसिष्ठ ने गर्व से कहा कि यह इक्ष्वाकुवंश सदैव पवित्र, सत्यनिष्ठ और धर्मपालक रहा है। इस महान वंश में उत्पन्न राम और लक्ष्मण आपकी कन्याओं के योग्य हैं। उसी प्रकार आपकी कन्याएँ भी इनके योग्य हैं। इसलिए यह विवाह अत्यंत शुभ और समुचित है।

 

उनके शब्दों के साथ वातावरण भावनाओं से भर उठा। दोनों राजवंशों का मिलन केवल दो व्यक्तियों का विवाह नहीं था—यह धर्म, मर्यादा और आदर्शों का पावन संगम बनने जा रहा था। मिथिला और अयोध्या के हृदय एक हो रहे थे, और भविष्य में जन्म लेने वाली राम-सीता की अमर कथा का स्वर्णिम अध्याय आरंभ होने वाला था।