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भरत का चित्रकूट में श्रीराम से करुण मिलन
सेना के चित्रकूट के पास पहुँचकर रुक जाने के बाद भरत का मन बिल्कुल बेचैन हो उठा। उनके हृदय में केवल एक ही इच्छा थी—कब वे अपने प्रिय बड़े भाई श्रीराम के दर्शन करेंगे और कब उनके चरणों में गिरकर अपने मन का दुःख कह पाएँगे। वे अपने छोटे भाई शत्रुघ्न को साथ लेकर उस दिशा में चल पड़े, जहाँ महर्षि भरद्वाज ने श्रीराम के आश्रम का संकेत दिया था।
भरत ने महर्षि वसिष्ठ से विनम्रतापूर्वक कहा कि वे उनकी माताओं को साथ लेकर धीरे-धीरे आश्रम की ओर आएँ। स्वयं भरत अब एक क्षण भी रुकना नहीं चाहते थे। उनके मन में श्रीराम से मिलने की इतनी तीव्र उत्कंठा थी कि उनके कदम अपने-आप आगे बढ़ते जा रहे थे।
सुमन्त्र भी भरत और शत्रुघ्न के पीछे-पीछे चल रहे थे। उनके मन में भी श्रीराम के दर्शन की उतनी ही गहरी इच्छा थी। वे भी उस क्षण की प्रतीक्षा कर रहे थे जब प्रिय श्रीराम उनके सामने होंगे।
आगे बढ़ते-बढ़ते भरत को वन में तपस्वियों के आश्रमों जैसी एक पर्णकुटी दिखाई देने लगी। उन्हें विश्वास होने लगा कि यही श्रीराम का निवास होगा। आश्रम के आसपास कई संकेत दिखाई दे रहे थे। वहाँ यज्ञ और हवन के लिए लकड़ियाँ एकत्र करके रखी गई थीं और पूजा के लिए फूल भी सुरक्षित रखे हुए थे।
पेड़ों पर कुश और चीर के छोटे-छोटे टुकड़े बाँधे हुए थे। ये चिह्न श्रीराम और लक्ष्मण ने इसलिए बनाए थे ताकि जंगल में आने-जाने वाले लोगों को रास्ते की पहचान हो सके। भरत ने उन चिह्नों को देखते ही समझ लिया कि वे श्रीराम के आश्रम के बिल्कुल निकट पहुँच चुके हैं।
वन में ठंड से बचने के लिए मृगों की लेंडी और भैंसों के सूखे गोबर के ढेर भी जमा किए गए थे। इन साधारण वस्तुओं को देखकर भरत के मन में एक और विचार आया—राजमहल में सुख-सुविधाओं के बीच रहने वाले उनके भाई आज वन में कितने साधारण जीवन में रह रहे होंगे!
भरत ने शत्रुघ्न और अपने साथ आए मंत्रियों की ओर देखकर प्रसन्नता और उत्सुकता से कहा कि लगता है महर्षि भरद्वाज ने जिस स्थान का संकेत दिया था, वे उसी स्थान पर पहुँच गए हैं। उन्होंने अनुमान लगाया कि पवित्र मन्दाकिनी नदी भी अब अधिक दूर नहीं होगी।
उन्होंने पेड़ों पर ऊँचाई पर बँधे हुए चीरों को देखा और समझाया कि लक्ष्मण ने शायद रास्ते की पहचान के लिए ये चिह्न बनाए होंगे। लक्ष्मण को जब कभी जल या दूसरी आवश्यक वस्तुएँ लेने के लिए बाहर जाना पड़ता होगा, तब वे इन्हीं चिह्नों की सहायता से आश्रम का रास्ता पहचानते होंगे।
आगे पर्वत के पास बड़े-बड़े हाथियों के घूमने और गरजने के चिह्न भी दिखाई दे रहे थे। भरत ने सोचा कि लक्ष्मण ने वन के खतरनाक स्थानों की पहचान कराने के लिए रास्ते में ऐसे संकेत बनाए होंगे।
तभी भरत की दृष्टि दूर उठते हुए घने धुएँ पर पड़ी। उन्होंने पहचान लिया कि यह किसी यज्ञ की अग्नि का धुआँ है। उनके मन में आनंद की लहर दौड़ गई। उन्हें लगा कि अब वह क्षण बहुत निकट है जब वे अपने आराध्य और बड़े भाई श्रीराम को अपनी आँखों से देखेंगे।
भरत ने मन ही मन सोचा कि आज उन्हें अपने पूजनीय भाई श्रीराम के दर्शन होंगे—वही श्रीराम जो गुरुजनों का सम्मान करते हैं, धर्म का पालन करते हैं और सबके प्रिय हैं। यह सोचकर भरत के हृदय की बेचैनी और बढ़ गई।
कुछ ही समय बाद वे मन्दाकिनी नदी के तट के पास स्थित चित्रकूट पहुँच गए। चित्रकूट का सुंदर वन देखकर भी भरत के मन में प्रसन्नता नहीं थी। उनके हृदय में केवल श्रीराम के वनवास का दुःख था।
भरत ने अपने साथ आए लोगों से अत्यन्त दुःखी होकर कहा कि यह सब उनके ही कारण हुआ है। उनके बड़े भाई, जो अयोध्या के राजा बनने योग्य थे और राजमहल के सुखों के अधिकारी थे, आज उनके कारण इस निर्जन वन में खुले आकाश के नीचे रहने को विवश हैं।
भरत अपने आपको दोष देने लगे। वे सोचने लगे कि श्रीराम जैसे महान और धर्मात्मा व्यक्ति को अपने कारण इतना कष्ट क्यों सहना पड़ रहा है। वे स्वयं को ही अपने भाई के दुःख का कारण मान रहे थे।
उनकी आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने कहा कि श्रीराम ने उनके कारण अपनी सभी इच्छाओं और राजसी सुखों का त्याग कर दिया है और वन में रह रहे हैं। इसलिए उन्हें अपने जन्म और जीवन पर ही धिक्कार महसूस हो रहा है।
भरत ने निश्चय किया कि आज वे श्रीराम के चरणों में गिरकर उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास करेंगे। वे श्रीराम से क्षमा माँगेंगे और उनके चरण पकड़ेंगे। वे सीता माता और लक्ष्मण के चरणों में भी गिरकर उनसे क्षमा माँगेंगे।
इसी प्रकार दुःख से भरे हुए भरत आगे बढ़ते रहे। तभी उनकी आँखों के सामने एक सुंदर और पवित्र पर्णशाला दिखाई दी। वह आश्रम अत्यन्त साधारण था, लेकिन उसमें ऐसी पवित्रता और शांति थी कि वह किसी यज्ञशाला के समान प्रतीत हो रहा था।
उस पर्णकुटी की छत शाल, ताल और अश्वकर्ण जैसे वृक्षों के पत्तों से बनी हुई थी। देखने में वह बहुत सुंदर लग रही थी। लेकिन भरत का ध्यान उसकी सुंदरता पर नहीं था। वे तो केवल यह जानना चाहते थे कि उनके राम कहाँ हैं।
अचानक उनकी दृष्टि वहाँ रखे हुए अनेक धनुषों पर पड़ी। वे साधारण धनुष नहीं थे। वे अत्यन्त शक्तिशाली और बड़े-बड़े कार्यों को पूरा करने में सक्षम थे। उनके पीछे का भाग सोने से मढ़ा हुआ था और वे शत्रुओं को परास्त करने में समर्थ थे।
पास ही अनेक तरकस रखे हुए थे, जिनमें चमकदार और शक्तिशाली बाण भरे हुए थे। वे बाण सूर्य की किरणों की तरह चमक रहे थे। उन अस्त्र-शस्त्रों को देखकर ऐसा लगता था मानो यह छोटी-सी पर्णकुटी किसी महान योद्धा का दुर्ग हो।
वहाँ सोने की म्यानों में रखी हुई दो तलवारें भी थीं। साथ ही स्वर्ण से सजाई हुई दो ढालें रखी थीं। गोह के चमड़े से बने हुए और सोने से सजाए गए दस्ताने भी वहाँ टँगे हुए थे।
इन सभी अस्त्र-शस्त्रों को देखकर स्पष्ट था कि श्रीराम और लक्ष्मण भले ही वन में तपस्वियों जैसा जीवन जी रहे हों, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर वे किसी भी शत्रु का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार थे।
पर्णकुटी के पास भरत ने एक विशाल और पवित्र वेदी देखी। उस पर अग्नि प्रज्वलित हो रही थी। वातावरण में एक दिव्य शांति थी। भरत का हृदय तेजी से धड़कने लगा।
अब वे अपने भाई से मिलने वाले थे।
भरत ने कुछ क्षण तक पर्णशाला की ओर देखा। तभी उनकी आँखें उस दृश्य पर ठहर गईं, जिसे देखने के लिए उनका हृदय इतने समय से तड़प रहा था।
उन्होंने श्रीराम को देखा।
श्रीराम सिर पर जटाओं का मुकुट धारण किए हुए थे। शरीर पर मृगचर्म, चीर और वल्कल वस्त्र थे। उनके सामने अग्नि जल रही थी और उनके तेज से पूरा स्थान प्रकाशित हो रहा था।
भरत कुछ क्षण के लिए जैसे स्तब्ध रह गए।
जिस भाई को उन्होंने कभी राजसी वस्त्रों में, राजमहल में, सुख-सुविधाओं के बीच देखा था, वही आज तपस्वी के वेश में उनके सामने बैठा था।
श्रीराम एक वेदी पर बैठे थे। उनके विशाल कंधे सिंह के समान थे, भुजाएँ लंबी और शक्तिशाली थीं और उनकी आँखें खिले हुए कमल के समान सुंदर थीं। उनके पास माता सीता और लक्ष्मण भी बैठे थे।
यह दृश्य देखते ही भरत के भीतर का सारा धैर्य टूट गया।
वे सोच भी नहीं सकते थे कि श्रीराम को इस अवस्था में देखकर वे स्वयं को रोक पाएँगे। उनके हृदय में प्रेम, दुःख, अपराध-बोध और भाई के प्रति सम्मान—सब कुछ एक साथ उमड़ पड़ा।
भरत तेजी से श्रीराम की ओर दौड़े।
उनकी आँखों के सामने बार-बार अयोध्या का राजमहल और उसके विपरीत श्रीराम का यह वनवासी रूप दिखाई दे रहा था। वे रोते हुए कहने लगे कि जो श्रीराम राजसभा में बैठकर राजा की तरह प्रजा और मंत्रियों से सम्मान पाने के योग्य थे, वे आज जंगल में वन्य पशुओं से घिरे हुए बैठे हैं।
भरत का हृदय और भी टूट गया जब उन्होंने देखा कि जो श्रीराम कभी सुंदर और बहुमूल्य वस्त्र पहनते थे, वे अब केवल मृगचर्म धारण किए हुए हैं।
वे सोचने लगे कि जिनके सिर पर कभी सुंदर फूलों की मालाएँ और आभूषण सजते थे, आज उन्हीं के सिर पर जटाओं का भार है। यह सब देखकर भरत की आँखों से आँसू रुक नहीं रहे थे।
भरत को लगा कि श्रीराम को धर्म का पालन करने के लिए यज्ञ और अच्छे कर्म करने चाहिए थे, लेकिन आज वे वन में रहकर अपने शरीर को कष्ट देने वाले तप का जीवन जी रहे हैं।
उन्होंने श्रीराम के शरीर की ओर देखा और उनका हृदय काँप उठा। जिस शरीर पर कभी सुगंधित चंदन लगाया जाता था, आज वही शरीर वनवासी जीवन के कारण धूल और मलिनता से ढका हुआ था।
भरत स्वयं को रोक नहीं पाए। वे रोते हुए बोले कि श्रीराम तो संसार के हर सुख के अधिकारी हैं, फिर भी मेरे कारण उन्हें इतना दुःख सहना पड़ रहा है। मैं कितना दुर्भाग्यशाली और कठोर हूँ! मेरे जीवन को धिक्कार है!
विलाप करते-करते भरत की आँखों से आँसू लगातार बहने लगे। उनके चेहरे पर दुःख और पीड़ा साफ दिखाई दे रही थी। उनका शरीर भी इस भावनात्मक आघात को सहन नहीं कर पा रहा था।
वे श्रीराम के चरणों तक पहुँचने से पहले ही धरती पर गिर पड़े।
उनके मुख से केवल एक शब्द निकला—“आर्य!”
इस एक शब्द में उनका पूरा प्रेम, सम्मान, दुःख और पश्चात्ताप समा गया था।
आँसुओं के कारण उनका गला रुँध गया था। वे कुछ बोल नहीं पा रहे थे। श्रीराम की ओर देखकर वे फिर करुण स्वर में पुकार उठे—“हा! आर्य!”
इसके आगे उनके मुँह से कोई शब्द नहीं निकल सका।
यह दृश्य देखकर शत्रुघ्न भी अपने आँसुओं को रोक नहीं पाए। वे भी रोते हुए श्रीराम के चरणों में गिर पड़े।
श्रीराम ने अपने दोनों छोटे भाइयों को देखा। उनके हृदय में भी प्रेम उमड़ आया। उन्होंने भरत और शत्रुघ्न को उठाया और दोनों को अपने हृदय से लगा लिया।
उस क्षण भाइयों के बीच कोई शब्द आवश्यक नहीं था।
तीनों भाइयों की आँखों से आँसू बह रहे थे। उनके हृदयों में प्रेम, बिछोह और दुःख एक साथ उमड़ पड़ा था।
यह केवल तीन भाइयों का मिलन नहीं था। यह ऐसा मिलन था जिसमें प्रेम था, त्याग था, पश्चात्ताप था और परिवार के बिछड़ने का दर्द था।
इसके बाद श्रीराम और लक्ष्मण की भेंट सुमन्त्र और निषादराज गुह से भी हुई। चारों राजकुमारों को एक साथ देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो आकाश में सूर्य, चन्द्रमा, शुक्र और बृहस्पति एक साथ दिखाई दे रहे हों।
वन में रहने वाले लोगों ने जब इन चारों भाइयों को एक साथ देखा तो वे भी भावुक हो उठे। इतने महान राजकुमारों को इस प्रकार दुःख में देखकर उनका हृदय भर आया और उनकी आँखों से भी आँसू बहने लगे।
इस प्रकार चित्रकूट की उस शांत वनभूमि में भरत और श्रीराम का मिलन हुआ—एक ऐसा मिलन जिसमें भाई के प्रति असीम प्रेम था, श्रीराम के वनवास का दुःख था और भरत के हृदय में अपने भाई के प्रति गहरा सम्मान और पश्चात्ताप था।
प्रश्न–उत्तर
प्रश्न 1. भरत चित्रकूट की ओर क्यों जा रहे थे?
उत्तर: भरत अपने बड़े भाई श्रीराम के दर्शन के लिए अत्यन्त व्याकुल थे। वे उनसे मिलकर उनके दुःख के लिए क्षमा माँगना चाहते थे।
प्रश्न 2. भरत ने शत्रुघ्न को आश्रम का मार्ग कैसे पहचानाया?
उत्तर: भरत ने पेड़ों पर बँधे चीर, कुश और अन्य मार्गदर्शक चिह्न देखकर समझा कि यही श्रीराम के आश्रम की ओर जाने वाला रास्ता है।
प्रश्न 3. आश्रम के आसपास कौन-कौन सी वस्तुएँ दिखाई दे रही थीं?
उत्तर: आश्रम के पास हवन के लिए लकड़ियाँ, पूजा के फूल, मार्गदर्शक चिह्न तथा शीत से बचने के लिए सूखे गोबर के ढेर दिखाई दे रहे थे।
प्रश्न 4. भरत को पेड़ों पर बँधे चीर देखकर क्या अनुमान हुआ?
उत्तर: भरत ने अनुमान लगाया कि लक्ष्मण ने आश्रम का रास्ता पहचानने के लिए पेड़ों पर चीर बाँधकर मार्गदर्शक चिह्न बनाए होंगे।
प्रश्न 5. भरत ने घना धुआँ देखकर क्या समझा?
उत्तर: भरत ने घना धुआँ देखकर समझा कि वन में तपस्वियों द्वारा अग्निहोत्र किया जा रहा है और श्रीराम का आश्रम निकट है।
प्रश्न 6. चित्रकूट पहुँचकर भरत अपने आपको दोषी क्यों मानने लगे?
उत्तर: भरत मानते थे कि उनके कारण श्रीराम को राजसी सुख छोड़कर निर्जन वन में कठिन जीवन बिताना पड़ रहा है।
प्रश्न 7. भरत ने श्रीराम के चरणों में गिरने का निश्चय क्यों किया?
उत्तर: भरत अपने भाई को प्रसन्न करना और उनसे क्षमा माँगना चाहते थे। इसलिए उन्होंने श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के चरणों में गिरने का निश्चय किया।
प्रश्न 8. श्रीराम की पर्णकुटी देखकर भरत को क्या अनुभव हुआ?
उत्तर: पर्णकुटी देखकर भरत को श्रीराम के साधारण वनवासी जीवन का स्मरण हुआ और उनके हृदय में दुःख तथा करुणा उमड़ पड़ी।
प्रश्न 9. श्रीराम की पर्णकुटी में कौन-कौन से अस्त्र-शस्त्र रखे थे?
उत्तर: पर्णकुटी में शक्तिशाली धनुष, चमकदार बाण, सोने की म्यानों में तलवारें, स्वर्णमय ढालें और गोह के चमड़े के दस्ताने रखे थे।
प्रश्न 10. भरत ने श्रीराम को किस अवस्था में देखा?
उत्तर: भरत ने श्रीराम को जटाएँ धारण किए, मृगचर्म और वल्कल पहने तथा अग्नि के पास वेदी पर सीता और लक्ष्मण के साथ बैठे देखा।
प्रश्न 11. श्रीराम को वनवासी रूप में देखकर भरत क्यों दुःखी हो गए?
उत्तर: भरत ने देखा कि राजसी सुखों के अधिकारी श्रीराम मृगचर्म और वल्कल पहनकर वन में कठिन जीवन जी रहे थे, इसलिए वे अत्यन्त दुःखी हुए।
प्रश्न 12. श्रीराम को देखकर भरत ने अपने जीवन को क्यों धिक्कारा?
उत्तर: भरत स्वयं को श्रीराम के वनवास का कारण मानते थे। इसलिए उन्हें लगता था कि उनके कारण उनके पूजनीय भाई को इतना कष्ट सहना पड़ा।
प्रश्न 13. श्रीराम के शरीर को देखकर भरत को क्या दुःख हुआ?
उत्तर: भरत को दुःख हुआ कि जिस शरीर पर कभी चंदन लगाया जाता था, वही शरीर अब वनवासी जीवन के कारण मलिन दिखाई दे रहा था।
प्रश्न 14. श्रीराम को देखकर भरत की क्या दशा हुई?
उत्तर: श्रीराम को देखते ही भरत का धैर्य टूट गया। वे आँसू बहाते हुए दौड़े और उनके चरणों तक पहुँचने से पहले ही धरती पर गिर पड़े।
प्रश्न 15. भरत श्रीराम को पुकारते समय क्या कह सके?
उत्तर: अत्यन्त दुःख के कारण भरत का गला रुँध गया। वे केवल दीन स्वर में “आर्य” और “हा! आर्य” कहकर पुकार सके।
प्रश्न 16. भरत के बाद शत्रुघ्न ने श्रीराम के प्रति अपना प्रेम कैसे प्रकट किया?
उत्तर: शत्रुघ्न भी रोते हुए श्रीराम के चरणों में गिर पड़े। श्रीराम ने उन्हें उठाकर प्रेमपूर्वक अपनी छाती से लगा लिया।
प्रश्न 17. भरत और शत्रुघ्न से मिलकर श्रीराम की क्या प्रतिक्रिया हुई?
उत्तर: श्रीराम ने दोनों भाइयों को उठाकर अपने हृदय से लगा लिया। इस भावुक मिलन में श्रीराम की आँखों से भी आँसू बहने लगे।
प्रश्न 18. भरत और श्रीराम का मिलन इतना भावुक क्यों था?
उत्तर: यह मिलन लंबे बिछोह, भाईचारे के प्रेम, श्रीराम के वनवास के दुःख और भरत के पश्चात्ताप से भरा हुआ था।
प्रश्न 19. वनवासियों की श्रीराम और उनके भाइयों को देखकर क्या प्रतिक्रिया हुई?
उत्तर: चारों राजकुमारों को एक साथ देखकर वनवासी पहले प्रसन्न हुए, लेकिन उनके दुःख को देखकर उनकी आँखों से भी शोक के आँसू बहने लगे।
प्रश्न 20. इस प्रसंग से भरत के चरित्र की कौन-सी विशेषताएँ सामने आती हैं?
उत्तर: इस प्रसंग से भरत का श्रीराम के प्रति प्रेम, विनम्रता, त्याग, भाई के दुःख के प्रति संवेदनशीलता और गहरा पश्चात्ताप स्पष्ट होता है।