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“ताटकावध: धर्म की प्रथम विजय और दिव्य अस्त्रों की प्राप्ति”
वन की नीरवता में उस दिन एक अनोखा संकल्प जन्म ले रहा था। महर्षि विश्वामित्र के तेज से वातावरण दैदीप्यमान था। उनके वचनों में तप की अग्नि और करुणा की गंभीरता एक साथ झलक रही थी। सामने खड़े थे अयोध्या के राजकुमार—धैर्य, मर्यादा और आज्ञापालन के साक्षात् स्वरूप श्रीराम।
मुनि के उत्साहपूर्ण वचन सुनकर श्रीराम ने दोनों हाथ जोड़ लिये। उनके नेत्रों में विनय थी, मुख पर शांति और हृदय में दृढ़ संकल्प। उन्होंने अत्यंत नम्रता से कहा—
“भगवन्! अयोध्या में मेरे पिता महाराज दशरथ ने मुझे सिखाया है कि गुरु की आज्ञा ही सर्वोपरि है। उन्होंने कहा था—‘बेटा! विश्वामित्र जैसे महात्मा की सेवा और आज्ञा का पालन करना ही तुम्हारा धर्म है। उनके वचनों की अवहेलना कभी मत करना।’”
यह कहते समय उनकी वाणी में पुत्रधर्म की मधुर गूंज थी। वे आगे बोले—
“अतः मैं पिताजी के उस उपदेश को हृदय में धारण करके आपकी आज्ञा से ताटकावध का कार्य अवश्य करूँगा। गौ, ब्राह्मण और समस्त देश के हित के लिए मैं आपके आदेश का पालन करने को पूर्णतः तत्पर हूँ।”
यह केवल शब्द नहीं थे—यह एक राजकुमार का व्रत था, एक पुत्र का धर्म था, और एक भावी आदर्श पुरुष की घोषणा थी।
इतना कहकर श्रीराम ने अपने धनुष को दृढ़ता से पकड़ा। उनकी मुट्ठी में मानो धर्म की शक्ति सिमट आयी हो। जैसे ही उन्होंने प्रत्यंचा पर तीव्र टंकार की, उस ध्वनि से दिशाएँ काँप उठीं। वन का मौन टूट गया। पक्षी उड़ गये, पशु भय से थर्रा उठे। मानो स्वयं प्रकृति जान गई हो कि अधर्म का अंत समीप है।
उस गर्जन-सी ध्वनि ने ताटकावन में रहनेवाली राक्षसी ताटका को भी विचलित कर दिया। पहले तो वह स्तब्ध रह गयी—यह कैसी ध्वनि? कौन है जो उसके वन में ऐसा साहस कर रहा है? पर अगले ही क्षण उसके हृदय में क्रोध की ज्वाला भड़क उठी। उसकी विकराल देह काँपने लगी, नेत्र अंगारों की भाँति दहकने लगे।
वह उसी दिशा में दौड़ी जहाँ से धनुष की टंकार आयी थी।
कुछ ही क्षणों में वह सामने थी—ऊँची, विकृत मुखाकृति वाली, भयंकर रूप धारण किये हुए। उसका दर्शन ही भीरु जनों का हृदय विदीर्ण कर देता। उसे देखकर भी श्रीराम के मुख पर भय का चिह्न तक न था। उन्होंने लक्ष्मण की ओर देखकर शांत स्वर में कहा—
“लक्ष्मण, देखो! इसका रूप कितना दारुण और भयंकर है। मायाबल से यह अत्यंत दुर्जय हो रही है। परंतु यह स्त्री है—इसलिए इसे मारने में मेरा मन सहज नहीं होता। मैं इसका बल और पराक्रम नष्ट कर दूँगा।”
यह करुणा और धर्म का अद्भुत संगम था—वीरता भी, संवेदना भी।
पर ताटका अब विवेक खो चुकी थी। वह गर्जना करती हुई झपटी। उसी समय महर्षि विश्वामित्र ने हुंकार भरकर कहा—
“रघुकुल के इन दोनों राजकुमारों का कल्याण हो! इनकी विजय हो!”
ताटका ने चारों ओर धूल का प्रचंड बवंडर उठा दिया। आकाश ढक गया। दो घड़ी तक सब ओर अंधकार-सा छा गया। फिर वह आकाश में अदृश्य होकर पत्थरों की भीषण वर्षा करने लगी। शिलाएँ वर्षा की तरह बरसने लगीं।
श्रीराम ने तुरंत अपने बाणों की वर्षा से उन पत्थरों को रोक दिया। उनके बाणों की गति बिजली से भी तीव्र थी। एक तीखे सायक से उन्होंने ताटका की दोनों भुजाएँ काट डालीं। घायल होकर भी वह गर्जना करती रही। तब लक्ष्मण ने क्रोध से उसके नाक-कान काट दिये।
पर वह मायाविनी थी। अनेक रूप धरती, अदृश्य हो जाती, फिर पत्थरों की वर्षा करती। अब संध्या समीप थी। महर्षि विश्वामित्र ने गंभीर स्वर में कहा—
“राम! इस पर दया व्यर्थ है। यह यज्ञों में विघ्न डालनेवाली पापिनी है। संध्या के पहले इसे समाप्त कर दो, अन्यथा राक्षसों की शक्ति बढ़ जाती है।”
गुरु की आज्ञा मिलते ही श्रीराम का संकल्प अटल हो गया। उन्होंने शब्दवेधी बाण चढ़ाया। ताटका अदृश्य थी, पर उसकी गर्जना दिशा बता रही थी। श्रीराम ने एकाग्र होकर बाण छोड़ा।
वह बाण वज्र की गति से चला और ताटका की छाती भेद गया।
एक तीव्र चीख के साथ वह पृथ्वी पर गिरी। धरती काँप उठी। वन का आतंक समाप्त हो गया।
क्षणभर के लिए चारों ओर मौन छा गया—फिर आकाश से पुष्पवृष्टि होने लगी। देवराज इन्द्र और अन्य देवताओं ने प्रकट होकर श्रीराम की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि यह कार्य केवल वीरता नहीं, धर्म की विजय है।
देवताओं ने आदरपूर्वक महर्षि विश्वामित्र की ओर देखा। उनके स्वर में कृतज्ञता थी—
“हे कुशिकनन्दन! आपका कल्याण हो। आपने आज इन्द्र सहित समस्त देवताओं को संतुष्ट किया है। आपके कारण ही यह महान कार्य संभव हुआ।”
विश्वामित्र शांत खड़े थे। उनके नेत्रों में तप की गहराई थी, पर भीतर गुरु का गर्व भी था—ऐसा शिष्य पाकर कौन प्रसन्न न होता?
देवता आगे बोले—
“अब समय आ गया है कि आप रघुकुलतिलक श्रीराम पर अपना विशेष स्नेह प्रकट करें। आपके पास जो दिव्य अस्त्र-शस्त्र हैं—जो प्रजापति कृशाश्व के अस्त्रस्वरूप पुत्र माने जाते हैं—उन्हें श्रीराम को प्रदान कीजिए।”
उनकी वाणी में आग्रह था, पर विश्वास भी। वे जानते थे कि यह राजकुमार साधारण नहीं है।
उन्होंने श्रीराम की ओर देखा—विनम्र, शांत, गुरु के पीछे खड़े हुए। न विजय का अभिमान, न पराक्रम का प्रदर्शन। केवल गुरु आज्ञा का पालन करने की संतुष्टि।
देवताओं ने भावभीने स्वर में कहा—
“हे ब्रह्मन्! ये अस्त्रदान के योग्य पात्र हैं। ये आपकी सेवा में सदा तत्पर रहते हैं। भविष्य में देवताओं का महान कार्य इन्हीं के द्वारा सम्पन्न होगा।”
यह केवल प्रशंसा नहीं थी—यह भविष्य की घोषणा थी। मानो आकाश स्वयं साक्षी दे रहा हो कि यह किशोर राजकुमार आगे चलकर अधर्म की जड़ों को उखाड़ देगा।
क्षणभर के लिए वन में दिव्य प्रकाश फैल गया। पुष्पों की वर्षा हुई। देवताओं ने पुनः विश्वामित्र को प्रणाम किया और प्रसन्नतापूर्वक आकाशमार्ग से लौट गए।
देवताओं के चले जाने के बाद संध्या का समय हो गया। महर्षि विश्वामित्र का हृदय संतोष से भर उठा। उन्होंने प्रेम से श्रीराम का मस्तक सूँघा—यह आशीर्वाद का अत्यंत स्नेहमय संकेत था।
उन्होंने कहा—
“राम! आज यहीं विश्राम करें। कल प्रातः आश्रम चलेंगे।”
उस रात ताटकावन बदल चुका था। जो वन भय और शाप से ग्रस्त था, वह अब शांत और रमणीय हो उठा। मानो प्रकृति स्वयं मुस्करा रही हो। चाँदनी में वन की छटा चैत्ररथ वन के समान सुंदर दिख रही थी।
श्रीराम ने उस रात्रि वहीं निवास किया। उनके हृदय में न कोई अहंकार था, न विजय का गर्व—केवल गुरु की आज्ञा पूर्ण करने का संतोष और धर्म की स्थापना का शांत प्रकाश।
ताटकावध केवल एक राक्षसी का अंत नहीं था—वह अधर्म पर धर्म की पहली निर्णायक विजय थी। उसी क्षण से श्रीराम केवल अयोध्या के राजकुमार न रहे—वे देवताओं के भी आशा-दीप बन गये।