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“सिद्धाश्रम से मिथिला की ओर — धनुषरत्न की ओर बढ़ते चरण”

 

विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा का महान कार्य पूर्ण हो चुका था। अनेक विघ्नों और राक्षसी बाधाओं के बाद जब यज्ञ निर्विघ्न संपन्न हुआ, तब श्रीराम और लक्ष्मण के हृदय में एक अद्भुत संतोष का भाव उमड़ पड़ा। वे केवल विजयी योद्धा ही नहीं थे, बल्कि अपने गुरु के कार्य को सफल करनेवाले कृतार्थ शिष्य भी थे। उसी यज्ञशाला में उन्होंने वह रात्रि विश्राम किया। वातावरण में शांति थी, अग्निकुंड की मंद लपटें आकाश को छूती प्रतीत होती थीं, और दोनों भाइयों के मुखमंडल पर परिश्रम के बाद की दिव्य प्रसन्नता झलक रही थी। उनका हृदय हर्ष और कृतज्ञता से परिपूर्ण था।

 

प्रभात होते ही प्रकृति ने मानो उनका अभिनंदन किया। पक्षियों का कलरव, मंद समीर और उगते सूर्य की सुनहरी किरणें — सब मिलकर एक नवीन आरंभ का संकेत दे रहे थे। दोनों भाई नित्यकर्म से निवृत्त होकर विनम्रता के साथ विश्वामित्र और अन्य ऋषियों के समीप पहुँचे। वहाँ पहुँचकर उन्होंने मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र को, जो प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी प्रतीत हो रहे थे, साष्टांग प्रणाम किया।

 

उनकी वाणी में मधुरता थी, किन्तु उससे भी अधिक गहन था उनका समर्पण। उन्होंने अत्यंत विनीत भाव से कहा कि वे दोनों उनके सेवक हैं, उनकी आज्ञा की प्रतीक्षा में उपस्थित हैं। उनके लिए सेवा ही जीवन का सर्वोच्च धर्म था। यह केवल शब्द नहीं थे, यह एक शिष्य के हृदय की सच्ची अभिव्यक्ति थी।

 

ऋषिमंडली ने विश्वामित्र को आगे कर श्रीराम से कहा कि मिथिला के राजा जनक एक महान और धर्ममय यज्ञ का आयोजन कर रहे हैं। वहाँ जाना सभी के लिए मंगलमय होगा। उन्होंने बताया कि वहाँ एक अद्भुत धनुषरत्न है, जिसे देखना अत्यंत दुर्लभ अवसर है। वह कोई साधारण धनुष नहीं, बल्कि देवताओं द्वारा प्रदत्त एक दिव्य अस्त्र है।

 

ऋषियों ने उसके गौरव का वर्णन करते हुए कहा कि यह धनुष अत्यंत प्रबल और भारी है, उसकी शक्ति का अनुमान लगाना असंभव है। वह तेजस्वी है, मानो भीतर से प्रकाश निकल रहा हो। उसकी भव्यता में एक दिव्य भय भी छिपा है — ऐसा भय जो उसकी अपार शक्ति का संकेत देता है।

 

उन्होंने यह भी बताया कि मनुष्यों की तो बात ही क्या, देवता, गंधर्व, असुर और राक्षस तक उसकी प्रत्यंचा चढ़ाने में असमर्थ रहे हैं। अनेक महाबली राजा और राजकुमार केवल उसकी परीक्षा लेने आए, परंतु कोई भी उसे उठा या चढ़ा न सका। वह धनुष मानो अपने योग्य धारक की प्रतीक्षा कर रहा था।

 

ऋषियों ने प्रेमपूर्वक श्रीराम से कहा कि मिथिला जाकर वे न केवल उस अद्भुत धनुष को देखेंगे, बल्कि जनक के यज्ञ की दिव्यता का भी अनुभव करेंगे। यह निमंत्रण केवल यात्रा का नहीं, बल्कि एक महान नियति की ओर अग्रसर होने का संकेत था।

 

उन्होंने यह भी बताया कि जनक ने अपने यज्ञ के फलस्वरूप उसी धनुष की याचना की थी, और सम्पूर्ण देवताओं तथा स्वयं भगवान शंकर ने उन्हें वह धनुष प्रदान किया। उसका मध्यभाग, जिसे हाथ से पकड़ा जाता है, अत्यंत सुंदर और सुगढ़ है। वह केवल शक्ति का प्रतीक नहीं, बल्कि सौंदर्य और दिव्यता का संगम है।

 

मिथिला के महल में वह धनुष पूजनीय देवता की भाँति प्रतिष्ठित है। उसकी नित्य पूजा होती है, सुगंधित धूप, अगुरु और विविध पुष्पों से उसका सम्मान किया जाता है। वह केवल अस्त्र नहीं, श्रद्धा और आस्था का केंद्र है।

 

विश्वामित्र ने वनदेवताओं से आज्ञा ली और यज्ञभूमि से प्रस्थान का निर्णय किया। उन्होंने वनदेवताओं से कहा कि उनका यज्ञकार्य सिद्ध हो चुका है और अब वे गंगा के उत्तर तट होते हुए हिमालय की उपत्यका की ओर प्रस्थान करेंगे। उनके शब्दों में आशीर्वाद था, और उनके प्रस्थान में एक तपस्वी की गंभीरता।

 

जब वे उत्तर दिशा की ओर बढ़े, तो उनके पीछे ब्रह्मवादी महर्षियों की सौ गाड़ियाँ चलीं। वह दृश्य अत्यंत भव्य था — जैसे तप और ज्ञान की एक महान धारा आगे बढ़ रही हो। सिद्धाश्रम के मृग और पक्षी भी मानो स्नेहवश उनके पीछे चल पड़े। यह केवल मनुष्यों का ही नहीं, प्रकृति का भी प्रेम था।

 

कुछ दूरी पर पहुँचकर विश्वामित्र ने उन पशु-पक्षियों को स्नेहपूर्वक लौटा दिया। यात्रा आगे बढ़ी। जब सूर्य अस्त होने लगा और आकाश के रंग बदलने लगे, तब वे शोणभद्र के तट पर रुके। स्नान के पश्चात् उन्होंने सावधानीपूर्वक अग्निहोत्र संपन्न किया। संध्या का वह समय अत्यंत पवित्र और शांत था।

 

फिर सभी ऋषि विश्वामित्र को आगे कर बैठे। श्रीराम और लक्ष्मण ने भी अत्यंत आदर के साथ उनके समक्ष स्थान ग्रहण किया। वहाँ गुरु-शिष्य का एक सुंदर चित्र उपस्थित था — जहाँ ज्ञान देनेवाला तपस्वी और उसे ग्रहण करनेवाले विनीत शिष्य आमने-सामने बैठे थे।

 

उसी समय श्रीराम के मन में जिज्ञासा जगी। उन्होंने विनम्रतापूर्वक पूछा कि यह हरे-भरे वन से सुशोभित प्रदेश कौन-सा है। वे उसका इतिहास और रहस्य जानना चाहते थे। उनके प्रश्न में केवल उत्सुकता ही नहीं, बल्कि ज्ञान-पिपासा थी।

 

उनके इस प्रश्न से प्रेरित होकर महातपस्वी विश्वामित्र ने ऋषिमंडली के मध्य उस प्रदेश का विस्तार से परिचय देना प्रारंभ किया। यह केवल भौगोलिक विवरण नहीं था, बल्कि इतिहास, परंपरा और तप की गाथा का उद्घाटन था।

 

इस प्रकार सिद्धाश्रम से मिथिला की ओर बढ़ती यह यात्रा केवल स्थान परिवर्तन नहीं थी। यह एक दिव्य लीला की प्रस्तावना थी, जहाँ नियति श्रीराम को उस धनुष के सम्मुख ले जानेवाली थी, जो युगों से अपने योग्य स्वामी की प्रतीक्षा कर रहा था।