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3) विराध का अहंकार और श्रीराम का अद्भुत पराक्रम

(3)
विराध का अहंकार और श्रीराम का अद्भुत पराक्रम

दण्डकवन का वह घना और रहस्यमय वन चारों ओर से भयानक दिखाई देता था। ऊँचे-ऊँचे वृक्षों के कारण सूर्य का प्रकाश भी धरती तक बड़ी कठिनाई से पहुँचता था। कहीं हिंसक पशुओं की गर्जना सुनाई देती, तो कहीं पक्षियों की विचित्र आवाजें वातावरण को और भी रहस्यमय बना देतीं। इसी वन में श्रीराम, लक्ष्मण और सीता आगे बढ़ रहे थे।

अचानक उनके सामने एक विशाल और भयंकर राक्षस आ खड़ा हुआ। उसका शरीर अत्यन्त विकराल था और उसकी गर्जना से पूरा वन गूँज उठा। वह क्रोध से श्रीराम और लक्ष्मण को देखते हुए गरजा—

“मैं तुमसे पूछ रहा हूँ—तुम दोनों कौन हो? इस भयंकर वन में कहाँ जा रहे हो? अपना परिचय दो!”

उसकी आवाज में अहंकार और धमकी दोनों स्पष्ट दिखाई दे रहे थे। लेकिन श्रीराम तनिक भी विचलित नहीं हुए। उनके चेहरे पर गंभीर शान्ति थी। उन्होंने उस राक्षस की ओर देखते हुए दृढ़ स्वर में कहा—

“तुम्हें मालूम होना चाहिए कि हम इक्ष्वाकुवंशी महाराज के कुल से हैं। हम दोनों भाई क्षत्रिय हैं और सदाचार का पालन करते हैं। परिस्थितिवश इस समय वन में निवास कर रहे हैं। लेकिन अब हम तुम्हारा परिचय जानना चाहते हैं। तुम कौन हो, जो इस दण्डकवन में बिना किसी भय के घूम रहे हो?”

श्रीराम के शांत लेकिन प्रभावशाली शब्दों को सुनकर राक्षस ने अपना परिचय देना आरम्भ किया। उसके भीतर अपने बल और वरदान का इतना अधिक गर्व था कि उसे किसी से भय नहीं लगता था।

वह बोला—

“रघुवंशी नरेश! मैं प्रसन्न होकर तुम्हें अपने विषय में बताता हूँ। मैं ‘जव’ नामक राक्षस का पुत्र हूँ और मेरी माता का नाम शतह्रदा है। संसार के सभी राक्षस मुझे ‘विराध’ के नाम से जानते हैं।”

इतना कहकर विराध और भी गर्व से भर उठा। उसे अपने बल और प्राप्त वरदान पर अत्यन्त अभिमान था। उसने आगे कहा—

“मैंने कठोर तपस्या करके ब्रह्माजी को प्रसन्न किया था। मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर उन्होंने मुझे वरदान दिया कि किसी भी शस्त्र से मेरी मृत्यु नहीं होगी। मेरा शरीर इतना शक्तिशाली और अभेद्य है कि कोई भी अस्त्र-शस्त्र उसे काट या छेद नहीं सकता।”

अपने वरदान का वर्णन करते समय उसके स्वर में घमण्ड साफ दिखाई दे रहा था। उसे विश्वास था कि संसार में कोई भी उसका सामना नहीं कर सकता।

फिर उसकी दृष्टि सीता पर पड़ी। उसके मन में एक अनुचित इच्छा उत्पन्न हुई। वह श्रीराम और लक्ष्मण को धमकाते हुए बोला—

“अब तुम दोनों इस युवती स्त्री को यहीं छोड़ दो। इसे अपने साथ ले जाने की इच्छा मत रखना। जैसे यहाँ आए हो, वैसे ही तुरंत यहाँ से चले जाओ। यदि तुम ऐसा करोगे तो मैं तुम्हारे प्राण नहीं लूँगा।”

विराध की यह बात सुनते ही श्रीराम के भीतर का क्रोध जाग उठा। उनकी आँखें क्रोध से लाल हो गईं। जिस राक्षस ने उनकी पत्नी सीता के प्रति ऐसी अनुचित इच्छा प्रकट की थी, उसके प्रति श्रीराम का धैर्य अब समाप्त हो गया।

उन्होंने कठोर और तेजस्वी स्वर में कहा—

“नीच! तुम्हारा विचार अत्यन्त पापपूर्ण है। तुम अपने लिए स्वयं मृत्यु को बुला रहे हो। तुम्हें लगता है कि तुम्हें कोई नहीं मार सकता, इसलिए तुम इतना अहंकार कर रहे हो। लेकिन अब तुम्हारा अंत निश्चित है। युद्ध में तुम्हें अपने कर्मों का फल मिलेगा। अब तुम मेरे हाथों से जीवित नहीं बच सकते।”

श्रीराम ने इतना कहा और उसी क्षण अपने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा ली। उनका रूप उस समय अत्यन्त तेजस्वी और भयंकर प्रतीत हो रहा था। उन्होंने तरकश से तीखे बाण निकाले और एक के बाद एक विराध पर छोड़ने लगे।

श्रीराम ने लगातार सात तीव्रगामी बाण छोड़े। वे बाण इतने वेग से जा रहे थे मानो गरुड़ आकाश में उड़ रहे हों या तेज हवा सब कुछ चीरती हुई आगे बढ़ रही हो। उनके सुनहरे पंख सूर्य के प्रकाश में चमक रहे थे।

वे अग्नि के समान तेजस्वी बाण विराध के विशाल शरीर को भेदते हुए निकल गए। उनके प्रहार से राक्षस घायल हो गया और बाण रक्त से रंजित होकर धरती पर गिर पड़े।

विराध को पहली बार श्रीराम की शक्ति का अनुभव हुआ। वह घायल तो हो गया, लेकिन उसके भीतर का अहंकार अभी समाप्त नहीं हुआ था। उसने सीता को एक ओर कर दिया और अत्यन्त क्रोधित होकर अपने हाथ में विशाल शूल उठा लिया। अब वह पूरी शक्ति से श्रीराम और लक्ष्मण पर टूट पड़ा।

वह भयंकर गर्जना कर रहा था। उसके हाथ में उठा हुआ विशाल शूल आकाश में इन्द्र के वज्र और अग्नि की तरह चमक रहा था। उसका मुँह खुला हुआ था और उसका विकराल रूप ऐसा लग रहा था मानो स्वयं काल सामने खड़ा हो।

श्रीराम और लक्ष्मण ने उस भयंकर राक्षस को अपनी ओर आते देखा, लेकिन दोनों भाइयों के मन में भय का कोई चिन्ह नहीं था। दोनों ने एक साथ अपने धनुष उठाए और उस पर बाणों की वर्षा करने लगे।

लेकिन तभी एक अद्भुत घटना हुई।

विराध ने अट्टहास किया। उसके चेहरे पर विजय का अहंकार दिखाई देने लगा। वह ऐसे खड़ा हो गया जैसे श्रीराम के बाण उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते। वह जँभाई लेने और अँगड़ाई लेने लगा। उसके ऐसा करते ही श्रीराम और लक्ष्मण द्वारा चलाए गए बाण उसके शरीर से बाहर निकलकर धरती पर गिर गए।

विराध को अपने वरदान पर और भी अधिक गर्व हो गया। उसे लगा कि वह वास्तव में अजेय है। उसने अपने प्राणों को रोक लिया और फिर से अपना विशाल शूल उठाकर दोनों भाइयों पर आक्रमण करने के लिए आगे बढ़ा।

उसका शूल आकाश में बिजली और अग्नि की तरह चमक रहा था। वह पूरी शक्ति से उसे श्रीराम की ओर लेकर बढ़ा।

लेकिन शस्त्र चलाने में श्रेष्ठ श्रीराम ने बिना घबराए तुरंत दो बाण छोड़े। दोनों बाण इतनी तीव्र गति से गए कि उन्होंने विराध के विशाल शूल को बीच से काट डाला।

कटा हुआ शूल धरती पर जा गिरा। वह दृश्य ऐसा लग रहा था मानो वज्र के प्रहार से मेरु पर्वत का कोई विशाल पत्थर टूटकर धरती पर गिर पड़ा हो।

अब विराध के हाथ से उसका सबसे बड़ा हथियार भी छिन चुका था।

श्रीराम और लक्ष्मण ने अवसर को पहचान लिया। दोनों भाइयों ने अपनी तलवारें निकाल लीं और काले सर्पों की तरह तीव्र गति से उस राक्षस पर टूट पड़े। उनकी तलवारों के प्रहार से विराध का विशाल शरीर घायल होने लगा।

लेकिन विराध भी असाधारण बलवान था। उसने अपनी दोनों विशाल भुजाएँ फैलाकर श्रीराम और लक्ष्मण को पकड़ लिया। दोनों वीरों को अपनी भुजाओं में दबोचकर वह उन्हें कहीं और ले जाने लगा।

विराध को लगा कि उसने दोनों भाइयों को परास्त कर दिया है। लेकिन श्रीराम उसके मन का उद्देश्य समझ चुके थे। उन्होंने लक्ष्मण से शांत भाव से कहा—

“सुमित्रानन्दन! देखो, यह राक्षस हमें अपनी इच्छा से उठाकर जिस दिशा में ले जा रहा है, उसे जाने दो। हमें इसका विरोध करने की आवश्यकता नहीं है। सम्भव है, यही मार्ग हमारे आगे जाने के लिए उपयोगी हो। अभी यह स्वयं हमारा वाहन बनकर हमें आगे ले जा रहा है।”

श्रीराम की दूरदर्शिता देखकर लक्ष्मण समझ गए कि उनके मन में कोई योजना है। दोनों भाई शांत रहे और विराध को अपने अनुसार उन्हें ले जाने दिया।

अपने बल के घमण्ड में चूर विराध ने श्रीराम और लक्ष्मण को ऐसे उठा लिया जैसे वे छोटे बालक हों। उसने दोनों को अपने विशाल कंधों पर बैठा लिया और भयंकर गर्जना करता हुआ वन के भीतर आगे बढ़ने लगा।

लेकिन उसे यह पता नहीं था कि जिन दो वीरों को वह अपनी शक्ति के बल पर उठाकर ले जा रहा है, वही उसके अहंकार का अंत करने वाले हैं।

विराध आगे बढ़ता गया और कुछ समय बाद वह एक अत्यन्त घने और रहस्यमय वन में प्रवेश कर गया। वह वन मानो विशाल काले मेघों से ढका हुआ दिखाई देता था। चारों ओर ऊँचे-ऊँचे और विशाल वृक्ष खड़े थे। उनकी घनी शाखाओं और पत्तों के कारण वन के भीतर अंधकार-सा छाया हुआ था।

वहाँ अनेक प्रकार के पक्षी विचित्र आवाजें निकाल रहे थे। चारों ओर गीदड़ घूम रहे थे और हिंसक पशु उस वन को और भी भयावह बना रहे थे। वातावरण में एक अनजाना भय और रहस्य व्याप्त था।

विराध अपने कंधों पर श्रीराम और लक्ष्मण को लेकर उसी घने वन के भीतर आगे बढ़ता चला गया। उसे तनिक भी अनुमान नहीं था कि उसका यह घमण्ड और दुस्साहस उसे स्वयं उसके अंत की ओर ले जा रहा है।

श्रीराम सब कुछ शांत भाव से देख रहे थे। उनके मन में न भय था, न जल्दबाजी। वे परिस्थिति को समझ रहे थे और सही अवसर की प्रतीक्षा कर रहे थे। दूसरी ओर विराध अपने वरदान और शक्ति के मद में चूर था।

यहीं से विराध के अहंकार और श्रीराम की धैर्यपूर्ण रणनीति के बीच निर्णायक संघर्ष की भूमिका तैयार होती है।

 

प्रश्न–उत्तर

प्रश्न 1. विराध ने श्रीराम और लक्ष्मण से क्या पूछा?
उत्तर: विराध ने श्रीराम और लक्ष्मण से उनका परिचय पूछा और जानना चाहा कि वे दोनों कौन हैं तथा दण्डकवन में कहाँ जा रहे हैं।

प्रश्न 2. श्रीराम ने विराध को अपना परिचय किस प्रकार दिया?
उत्तर: श्रीराम ने बताया कि वे इक्ष्वाकुवंशी हैं, क्षत्रिय हैं और सदाचार का पालन करते हैं। परिस्थितिवश वे दोनों भाई वन में निवास कर रहे हैं।

प्रश्न 3. विराध ने श्रीराम और लक्ष्मण को अपना क्या परिचय दिया?
उत्तर: विराध ने बताया कि वह जव नामक राक्षस का पुत्र और शतह्रदा का पुत्र है। भूमण्डल के सभी राक्षस उसे विराध नाम से जानते हैं।

प्रश्न 4. विराध को ब्रह्माजी से कौन-सा वरदान प्राप्त था?
उत्तर: विराध ने कठोर तपस्या करके ब्रह्माजी को प्रसन्न किया था। उन्हें प्रसन्न करने पर उसे वरदान मिला कि किसी भी शस्त्र से उसकी मृत्यु नहीं होगी।

प्रश्न 5. विराध ने सीता के विषय में श्रीराम और लक्ष्मण से क्या कहा?
उत्तर: विराध ने श्रीराम और लक्ष्मण को सीता को वहीं छोड़कर तुरंत चले जाने के लिए कहा और आश्वासन दिया कि वह उनके प्राण नहीं लेगा।

प्रश्न 6. विराध की बात सुनकर श्रीराम को क्रोध क्यों आया?
उत्तर: विराध ने सीता को अपने साथ रखने की अनुचित इच्छा प्रकट की थी। उसकी पापपूर्ण बात सुनकर श्रीराम की आँखें क्रोध से लाल हो गईं।

प्रश्न 7. श्रीराम ने विराध को क्या चेतावनी दी?
उत्तर: श्रीराम ने विराध को धिक्कारते हुए कहा कि उसका उद्देश्य पापपूर्ण है। वह अपनी मृत्यु स्वयं खोज रहा है और युद्ध में उनके हाथों मारा जाएगा।

प्रश्न 8. श्रीराम ने विराध पर कितने बाण चलाए और उनका प्रभाव क्या हुआ?
उत्तर: श्रीराम ने विराध पर लगातार सात तीव्रगामी बाण चलाए। वे उसके शरीर को भेदकर रक्तरंजित हुए और धरती पर गिर पड़े।

प्रश्न 9. घायल होने के बाद विराध ने क्या किया?
उत्तर: घायल होने के बाद विराध ने सीता को एक ओर कर दिया और हाथ में विशाल शूल लेकर अत्यन्त क्रोधित होकर श्रीराम और लक्ष्मण पर आक्रमण किया।

प्रश्न 10. विराध के शरीर पर श्रीराम के बाणों का क्या प्रभाव हुआ?
उत्तर: विराध के वरदान के कारण श्रीराम के बाण उसके शरीर में टिक नहीं सके। वह अट्टहास और अँगड़ाई लेकर उन्हें शरीर से बाहर निकाल देता था।

प्रश्न 11. श्रीराम ने विराध के शूल को किस प्रकार नष्ट किया?
उत्तर: जब विराध ने शूल उठाकर दोनों भाइयों पर आक्रमण किया, तब श्रीराम ने दो तीव्र बाण चलाकर उसके शूल को काट डाला।

प्रश्न 12. श्रीराम और लक्ष्मण ने शूल नष्ट होने के बाद क्या किया?
उत्तर: शूल नष्ट होने के बाद श्रीराम और लक्ष्मण ने अपनी तलवारें निकाल लीं और काले सर्पों के समान तीव्रता से विराध पर प्रहार करने लगे।

प्रश्न 13. विराध ने श्रीराम और लक्ष्मण को किस प्रकार पकड़ लिया?
उत्तर: दोनों भाइयों के प्रहारों से घायल होने के बावजूद विराध ने अपनी विशाल दोनों भुजाओं से उन्हें पकड़ लिया और दूसरी जगह ले जाने लगा।

प्रश्न 14. श्रीराम ने लक्ष्मण को विराध के विषय में क्या समझाया?
उत्तर: श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा कि विराध जिस मार्ग पर उन्हें ले जा रहा है, उसे जाने दें, क्योंकि वही मार्ग उनके आगे जाने में उपयोगी हो सकता है।

प्रश्न 15. विराध ने श्रीराम और लक्ष्मण के साथ क्या किया?
उत्तर: विराध ने अपने अत्यधिक बल के घमण्ड में दोनों भाइयों को बालकों की तरह उठाकर अपने दोनों कंधों पर बैठा लिया और वन की ओर चल पड़ा।

प्रश्न 16. विराध जिस वन में पहुँचा, उसका वर्णन कीजिए।
उत्तर: वह वन अत्यन्त घना और रहस्यमय था। वहाँ बड़े-बड़े वृक्ष, अनेक पक्षी, गीदड़ और हिंसक पशु चारों ओर फैले हुए थे।

प्रश्न 17. विराध के चरित्र की कौन-सी विशेषताएँ इस प्रसंग में दिखाई देती हैं?
उत्तर: विराध अत्यन्त शक्तिशाली, अहंकारी, उद्दण्ड और पापपूर्ण विचारों वाला राक्षस था। अपने वरदान के कारण उसे अपनी शक्ति पर अत्यधिक घमण्ड था।

प्रश्न 18. इस प्रसंग में श्रीराम के चरित्र की कौन-सी विशेषताएँ दिखाई देती हैं?
उत्तर: इस प्रसंग में श्रीराम के साहस, धैर्य, विवेक, पराक्रम और दूरदर्शिता का परिचय मिलता है। वे संकट में भी शांत रहकर उचित निर्णय लेते हैं।