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6) शरणागतवत्सल श्रीराम और दण्डकारण्य के ऋषियों की करुण पुकार

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शरणागतवत्सल श्रीराम और दण्डकारण्य के ऋषियों की करुण पुकार

शरभंग मुनि अभी-अभी अपनी तपस्या के तेज से अपने शरीर को अग्नि में समर्पित करके ब्रह्मलोक को चले गए थे। उनके आश्रम की अग्नि अभी भी धधक रही थी, आकाश में अभी भी उस महायोगी के जाने का तेज फैला हुआ था। तभी वन के हर कोने से एक अद्भुत दृश्य दिखाई दिया।

सैकड़ों ऋषि-मुनियों का एक विशाल समूह ककुत्स्थ वंश के सूर्य, प्रज्वलित तेज वाले श्रीरामचन्द्र जी की ओर चला आ रहा था। यह कोई साधारण भीड़ नहीं थी। ये दण्डकारण्य के जीवन थे। उनमें कोई वैखानस थे, जो ब्रह्माजी के नाखून से उत्पन्न हुए थे और वन के कंद-मूल से ही अपना जीवन चलाते थे, तो कोई  ब्रह्माजी के बाल से प्रकट हुए अंगूठे के बराबर आकार वाले बालखिल्य, जो अपनी कठोर तपस्या के लिए प्रसिद्ध थे। कोई सम्प्रक्षाल थे जो हर बार भोजन से पहले अपने सारे बर्तन धो लेते, तो कोई मरीचिप जो केवल सूर्य की किरणों और चाँद की चांदनी पीकर जीते थे।

उनमें ऐसे भी थे जो पत्थरों से अनाज कूटकर खाते थे, ऐसे भी जो केवल पत्ते खाकर तप करते थे। कोई दंतोलूखली थे जो अपने दांतों को ही ओखली बनाकर अन्न पीस लेते, तो कोई उन्मज्जक थे जो दिन-रात कंठ तक पानी में खड़े रहकर तपस्या करते। कोई गात्रशय्या थे जो अपने शरीर को ही बिस्तर बनाकर जमीन पर सो जाते, कोई अशय्य थे जो शय्या के साधनों से रहित थे, और कोई अनवकाशिक थे जिन्हें एक पल का भी अवकाश नहीं था, निरंतर यज्ञ में लगे रहते।

कोई केवल जल पीकर रहने वाले, कोई केवल हवा खाकर जीने वाले वायुभक्ष, कोई खुले आकाश के नीचे रहने वाले, कोई वेदी पर ही सो जाने वाले स्थण्डिलशायी, कोई पेड़ों की सबसे ऊँची डाल पर घर बनाकर रहने वाले ऊर्ध्ववासी, कोई इंद्रियों को जीतने वाले दान्त, कोई हमेशा गीले कपड़े पहने रहने वाले आर्द्रपटवासा, कोई निरंतर जप करने वाले सजप, कोई तपस्या अथवा परमात्मतत्त्व के विचार में स्थित रहने वाले तपोनिष्ठ और कोई पंचाग्नि के बीच बैठकर शरीर को तपाने वाले पञ्चाग्निसेवी। सभी के चेहरे ब्रह्मतेज से चमक रहे थे, पर आँखों में एक गहरा भय और पीड़ा थी। लंबे योगाभ्यास से उनका चित्त तो एकाग्र था, पर आज वह एकाग्रता टूट रही थी। वे सब सीधे शरभंग के आश्रम में श्रीराम के पास आए।

धर्म के ज्ञाता उन ऋषियों ने धर्म के सबसे बड़े रक्षक के सामने हाथ जोड़े। उनका स्वर कांप रहा था, पर उसमें वेदों का तेज था। वे बोले, हे रघुनंदन! आप केवल इक्ष्वाकु वंश के राजकुमार नहीं हैं। आप इस पूरी पृथ्वी के स्वामी हैं। जैसे देवराज इंद्र देवताओं की रक्षा करते हैं, वैसे ही मनुष्यों के लोक में एकमात्र आप ही हमारे रक्षक हैं। आपका यश और पराक्रम तीनों लोकों में गूंजता है। आप में पिता की आज्ञा का पालन, सत्य बोलना और सारा धर्म साक्षात बसता है। हे नाथ, आप महात्मा हैं, धर्म को जानने वाले और धर्म से प्रेम करने वाले हैं। हम प्रार्थी बनकर आपके पास आए हैं। हम स्वार्थ की बात करने जा रहे हैं, हमें क्षमा कर दीजिए।

फिर उन्होंने राजधर्म का मर्म समझाया, हे स्वामी! शास्त्र कहते हैं कि जो राजा प्रजा से उसकी कमाई का छठा हिस्सा कर के रूप में ले लेता है, पर उसकी रक्षा पुत्र की तरह नहीं करता, वह सबसे बड़े अधर्म का भागी बनता है। और इसके विपरीत, हे श्रीराम, जो राजा प्रजा की रक्षा को ही अपना सबसे बड़ा काम मानता है, जो अपने राज्य में रहने वाले हर व्यक्ति को अपने प्राणों के समान, अपने पुत्र से भी अधिक प्रिय मानकर दिन-रात उसकी रक्षा करता है, उसे इस लोक में अक्षय कीर्ति मिलती है जो युगों तक बनी रहती है, और अंत में वह ब्रह्मलोक जाकर भी विशेष सम्मान पाता है।

इतना ही नहीं, हे राम, इस वन में जो मुनि फल-मूल खाकर कठिन तप और धर्म का अनुष्ठान करता है, उस तपस्या के पुण्य का चौथा हिस्सा अपने आप उस राजा को मिल जाता है जो धर्म से प्रजा की रक्षा करता है।

यह कहकर उनका धीरज टूट गया। उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। वे बोले, हे श्रीराम! हम वनवासी, हम वानप्रस्थी, हममें से अधिकांश ब्राह्मण हैं, और आप ही हमारे एकमात्र रक्षक हैं। पर राक्षस हमें अनाथ समझकर मार रहे हैं। हमारा बहुत बड़ा संहार हो रहा है। आइए, देखिए! यहाँ-वहाँ, पूरे वन में पड़े हुए पवित्र आत्मा वाले मुनियों के शव और उनकी हड्डियों के ढेर पड़े हैं। ये उन भयंकर राक्षसों ने बार-बार मारे हैं।

पम्पा सरोवर के किनारे, तुंगभद्रा नदी के तट पर, पवित्र मंदाकिनी के आस-पास और चित्रकूट पर्वत की तलहटी में जहाँ-जहाँ ऋषियों ने अपना छोटा सा आश्रम बनाया था, वहाँ-वहाँ इन क्रूर राक्षसों ने उनका सर्वनाश किया है। इन दुष्टों का यह भयानक अत्याचार अब हमसे सहा नहीं जाता। इसी लिए हे शरणागतवत्सल, हम आपके पास शरण लेने आए हैं। हे वीर राजकुमार, इस पूरी पृथ्वी पर आपके सिवा हमारा कोई सहारा नहीं दिखता। इन निशाचरों से हम सबको बचा लीजिए।

तपस्या में लगे उन तपस्वियों की यह हृदय विदारक, आंसुओं से भरी प्रार्थना सुनकर ककुत्स्थ कुल के भूषण, धर्मात्मा श्रीराम का हृदय करुणा से भर गया। उनका धनुष जैसे अपने आप टंकार उठा। उन्होंने उन सभी ऋषियों को अभय देते हुए कहा।

हे मुनिवरो! आप मुझसे इस प्रकार प्रार्थना मत कीजिए। यह मेरे लिए आदेश है, प्रार्थना नहीं। मैं तो आप जैसे तपस्वी महात्माओं का सेवक हूँ, आपका आज्ञापालक हूँ। वैसे भी मुझे तो अपने पिता की आज्ञा से इस वन में आना ही था, अब आपकी सेवा का यह सौभाग्य भी मिल गया तो मेरा वनवास सच में महान फलदायक हो गया।

आपको जो कष्ट राक्षसों से मिल रहा है, उसे दूर करने के लिए ही तो मैं पिता के वचन का पालन करने इस वन में आया हूँ। यह तो दैवयोग है कि आपके काम के लिए मैं यहाँ सही समय पर पहुँच गया।

हे तपोधनो! मैं उन दुष्ट राक्षसों का, जो आप तपस्वियों से शत्रुता रखते हैं, युद्ध में सर्वनाश करना चाहता हूँ। आप सब भाईसहित मेरे पराक्रम को देखिए। मैं आपको वचन देता हूँ।

इस प्रकार उन रोते हुए तपस्वियों को अभय का वर देकर, धर्म में मन लगाने वाले और सदा श्रेष्ठ दान देने वाले वीर श्रीरामचन्द्र जी ने लक्ष्मण और ऋषियों के उस पूरे समुदाय के साथ सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम की ओर प्रस्थान किया। उनके पीछे चलते हुए मुनियों के मुख पर अब पहली बार महीनों बाद आशा की एक किरण लौट आई थी।

 

*1. शरभंग मुनि के ब्रह्मलोक जाने के बाद श्रीराम के पास कौन आए?*

उत्तर: शरभंग के जाने के बाद ब्रह्मतेज से सम्पन्न, योग में एकाग्रचित्त वाले सैकड़ों वैखानस, वालखिल्य आदि तपस्वी ऋषि-मुनियों का समुदाय श्रीराम के पास आया।

*2. आश्रम पर आए मुनियों में किस प्रकार के तपस्वी शामिल थे?*
उत्तर: उनमें वायुभक्ष, जलाहार, पत्राहार, आकाशनिलय, स्थण्डिलशायी, पञ्चाग्निसेवी, दन्तोलूखली और गात्रशय्या जैसे कठोर तप करने वाले अनेक श्रेणियों के मुनि थे।

*3. मुनियों ने श्रीराम को किस रूप में संबोधित किया?*
उत्तर: मुनियों ने श्रीराम को इक्ष्वाकुवंश और समस्त भूमण्डल का स्वामी, मनुष्यलोक का रक्षक, यशस्वी, पराक्रमी, सत्यवादी और धर्मवत्सल कहकर संबोधित किया।

*4. मुनियों के अनुसार अधर्मी राजा किसे कहा गया है?*
उत्तर: जो राजा प्रजा से आय का छठा भाग कर के रूप में लेता है पर पुत्र की तरह उसकी रक्षा नहीं करता, वह महान अधर्म का भागी होता है।

*5. धर्म से प्रजा की रक्षा करने वाले राजा को क्या फल मिलता है?*
उत्तर: प्रजा को पुत्रवत पालने वाले राजा को वर्षों तक अक्षय कीर्ति मिलती है और अंत में वह ब्रह्मलोक में विशेष सम्मान प्राप्त करता है।

*6. राजा को मुनियों के तप का फल कैसे प्राप्त होता है?*
उत्तर: वन में फल-मूल खाकर मुनि जो उत्तम धर्म और तप करता है, उसका चौथा भाग प्रजा की धर्मपूर्वक रक्षा करने वाले राजा को प्राप्त होता है।

*7. मुनि समुदाय श्रीराम के पास क्यों शरण लेने आया था?*
उत्तर: वानप्रस्थी और ब्राह्मण बहुल मुनि समुदाय का राक्षसों द्वारा अनाथों की तरह भयंकर संहार किया जा रहा था, इसलिए वे रक्षा के लिए शरण लेने आए।

*8. राक्षसों ने किन-किन स्थानों पर ऋषियों का संहार किया था?*
उत्तर: राक्षसों ने पम्पा सरोवर, तुंगभद्रा नदी, मंदाकिनी नदी और चित्रकूट पर्वत के किनारे बसे सभी ऋषि-महर्षियों का भयंकर संहार किया था।

*9. मुनियों की प्रार्थना सुनकर श्रीराम ने क्या उत्तर दिया?*
उत्तर: श्रीराम ने कहा, आप प्रार्थना न करें, मैं तपस्वियों का आज्ञापालक हूँ। राक्षसों के कष्ट को दूर करने के लिए ही मैं पिता की आज्ञा से वन में आया हूँ।

*10. श्रीराम ने मुनियों को क्या वर दिया और फिर कहाँ गए?*
उत्तर: श्रीराम ने युद्ध में राक्षसों के संहार का वर देकर अपने पराक्रम देखने को कहा और फिर लक्ष्मण व मुनियों के साथ सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम की ओर चले गए।