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अडिग भक्ति का अमर दीप — भक्त प्रह्लाद और भगवान् नरसिंह की दिव्य लीला
“जब संसार साथ छोड़ दे, तब भी जो भगवान् का हाथ न छोड़े, वही प्रह्लाद कहलाता है।”
“भक्ति की शक्ति तलवार से नहीं कटती, अग्नि से नहीं जलती, जल में नहीं डूबती और मृत्यु भी जिसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती।”
संसार के इतिहास में अनेक भक्त हुए हैं, परन्तु यदि बालभक्तों का नाम लिया जाए तो सबसे पहले जिस दिव्य व्यक्तित्व का स्मरण होता है, वह हैं भक्तशिरोमणि प्रह्लाद। वे केवल एक भक्त नहीं थे, बल्कि यह सिद्ध करने वाले थे कि यदि हृदय में भगवान् के प्रति निष्काम प्रेम हो, तो सम्पूर्ण संसार की विरोधी शक्तियाँ भी उस भक्त का कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं।
दैत्यराज हिरण्यकशिपु के चार पुत्र थे, किन्तु उनमें सबसे छोटे प्रह्लाद ही आध्यात्मिक दृष्टि से सबसे महान बने। उनका जीवन यह संदेश देता है कि भक्ति का सम्बन्ध न आयु से है, न परिस्थिति से और न ही परिवार से। भक्ति तो आत्मा की पुकार है।
गर्भ में ही मिला भगवद्भक्ति का अमृत
जब हिरण्यकशिपु देवताओं को पराजित करने के लिए घोर तपस्या में लीन था, तब उसकी पत्नी कयाधू गर्भवती थीं। इसी समय देवताओं ने असुरों पर आक्रमण कर दिया।
देवराज इन्द्र ने असुरों को पराजित किया और कयाधू को बंदी बनाकर ले जाने लगे। गर्भवती कयाधू असहाय होकर रो रही थीं। उनका हृदय भय और चिंता से भर गया था। उन्हें अपने प्राणों की नहीं, अपने गर्भस्थ शिशु की चिंता थी।
उसी समय करुणा के सागर देवर्षि नारद वहाँ पहुँचे।
उन्होंने इन्द्र से पूछा—
“एक असहाय स्त्री को क्यों ले जा रहे हो?”
इन्द्र ने उत्तर दिया—
“इसके गर्भ में हिरण्यकशिपु का पुत्र है। जन्म लेते ही मैं उसका वध कर दूँगा।”
देवर्षि नारद ने दिव्य दृष्टि से देखा और मुस्कुराते हुए बोले—
“तुम भूल कर रहे हो। इस गर्भ में कोई साधारण बालक नहीं, भगवान् का परम भक्त विराजमान है। इससे किसी को भय नहीं है।”
नारदजी के वचनों को सुनकर इन्द्र ने कयाधू को मुक्त कर दिया।
नारदजी उन्हें अपने आश्रम ले आए। वहाँ वे प्रतिदिन भगवान् की कथाएँ, उनके गुण, उनकी लीलाएँ और भक्ति का रहस्य सुनाते थे।
कयाधू तो कभी सुनतीं, कभी भूल जातीं; किन्तु गर्भ में स्थित बालक प्रह्लाद एक-एक शब्द को आत्मसात कर रहा था।
यहीं से आरम्भ हुई उस अद्भुत भक्त की यात्रा।
“जिसने जन्म लेने से पहले ही भगवान् को अपना लिया हो, संसार उसे भगवान् से कैसे दूर कर सकता है?”
बाल्यकाल में ही भक्ति का प्रचार
प्रह्लाद का जन्म हुआ। जैसे-जैसे वे बड़े होने लगे, उनके मुख से केवल भगवान् का नाम निकलता था।
दूसरे बच्चे खिलौनों में आनन्द ढूँढ़ते थे, पर प्रह्लाद हरिनाम में आनन्द पाते थे।
वे बच्चों को इकट्ठा करते और कहते—
“आओ, हम भगवान् का कीर्तन करें। यही जीवन का सबसे बड़ा खेल है।”
बालकों के समूह में हरिनाम गूँजने लगता।
कभी प्रह्लाद नाचने लगते, कभी प्रेम में रोने लगते, कभी भगवान् का नाम लेते-लेते भावविभोर होकर भूमि पर गिर पड़ते।
उनकी आँखों से बहते आँसू किसी दुःख के नहीं, भगवान् के प्रेम के थे।
पाठशाला में भी भक्ति का ही पाठ
जब प्रह्लाद पाँच वर्ष के हुए, तब हिरण्यकशिपु ने उन्हें गुरु शण्ड और अमर्क के आश्रम में भेजा।
गुरु राजनीति, दैत्यनीति और संसार की शिक्षा देते थे; परन्तु प्रह्लाद के हृदय में तो पहले से ही भगवान् का सिंहासन स्थापित था।
एक दिन हिरण्यकशिपु ने बड़े प्रेम से पुत्र को गोद में बैठाकर पूछा—
“बेटा! तुमने अब तक जो सबसे श्रेष्ठ शिक्षा सीखी है, वह क्या है?”
प्रह्लाद ने निडर होकर उत्तर दिया—
“पिताजी! सबसे श्रेष्ठ शिक्षा यही है कि मनुष्य इस नश्वर संसार के मोह को छोड़कर भगवान् की भक्ति में लग जाए।”
यह सुनते ही हिरण्यकशिपु का चेहरा क्रोध से लाल हो गया।
उसे लगा जैसे उसके अपने घर में उसका सबसे बड़ा शत्रु पैदा हो गया हो।
पिता का क्रोध और पुत्र की अडिग भक्ति
हिरण्यकशिपु ने समझाया, डाँटा, धमकाया; परन्तु प्रह्लाद ने भगवान् का नाम छोड़ना स्वीकार नहीं किया।
तब अत्याचारी पिता ने उन्हें मार डालने का निश्चय किया।
सूली पर चढ़ाया गया।
मदमस्त हाथियों के पैरों तले डाला गया।
गले में पत्थर बाँधकर समुद्र में फेंका गया।
विष का प्याला पिलाया गया।
धधकती अग्नि में बैठाया गया।
ऊँचे पर्वत से गिराया गया।
किन्तु हर बार एक अदृश्य शक्ति अपने भक्त की रक्षा करती रही।
सूली फूलों की शय्या बन गई।
हाथी सेवक बन गए।
समुद्र ने गोद में उठा लिया।
विष अमृत बन गया।
अग्नि शीतल हो गई।
पर्वत की ऊँचाई भी उनका कुछ न बिगाड़ सकी।
“जहाँ भगवान् रक्षक हों, वहाँ मृत्यु भी प्रवेश करने से पहले अनुमति माँगती है।”
क्षमा की ऐसी मिसाल, जो युगों तक अमर रहेगी
जब शण्ड और अमर्क ने क्रोध में भयानक कृत्या उत्पन्न की, तब भी भगवान् की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे।
कृत्या उलटी पड़ गई और स्वयं उन्हीं गुरुओं को मार बैठी।
यह देखकर प्रह्लाद का हृदय द्रवित हो उठा।
जिन्होंने उन्हें कष्ट दिया था, उनके लिए भी उनके मन में कोई द्वेष नहीं था।
वे रोते हुए भगवान् से प्रार्थना करने लगे—
“यदि मेरे मन में किसी के प्रति शत्रुता नहीं है, यदि मैं सबको अपना मित्र मानता हूँ, तो मेरे गुरु जीवित हो जाएँ।”
भगवान् ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की।
गुरु पुनः जीवित हो उठे।
यह घटना संसार को बता गई कि सच्चा भक्त केवल अपने मित्रों का नहीं, अपने विरोधियों का भी कल्याण चाहता है।
“सन्त का हृदय वृक्ष के समान होता है—पत्थर मारने वाले को भी फल देता है।”
खम्भे से प्रकट हुए भगवान् नरसिंह
जब हिरण्यकशिपु की सारी योजनाएँ विफल हो गईं, तब उसका क्रोध चरम सीमा पर पहुँच गया।
उसने प्रह्लाद को एक खम्भे से बाँध दिया और हाथ में तलवार लेकर गरजा—
“कहाँ है तेरा भगवान्?”
प्रह्लाद शांत थे।
उनके चेहरे पर भय का नाम भी नहीं था।
उन्होंने उत्तर दिया—
“भगवान् सर्वत्र हैं। मुझमें, आपमें, इस तलवार में और इस खम्भे में भी।”
हिरण्यकशिपु हँसा।
उसने क्रोध में खम्भे पर प्रहार किया।
अचानक भयंकर गर्जना हुई।
संपूर्ण ब्रह्माण्ड काँप उठा।
खम्भा फट गया।
और उसमें से प्रकट हुए भगवान् नरसिंह— आधे मनुष्य, आधे सिंह; दोनों का अद्भुत संगम।
उनकी ज्वलंत आँखें, विशाल अयाल और प्रचंड स्वरूप देखकर देवता भी विस्मित हो गए।
क्षणभर में उन्होंने हिरण्यकशिपु को पकड़ लिया, अपनी जाँघों पर बैठाया और उसका अंत कर दिया।
अधर्म पर धर्म की विजय हो गई।
भक्त का सबसे बड़ा वरदान
भगवान् नरसिंह का क्रोध शांत नहीं हो रहा था।
देवता भी उनके समीप जाने का साहस नहीं कर रहे थे।
तब छोटा-सा बालक प्रह्लाद आगे बढ़ा।
भगवान् ने उसे अपनी गोद में उठा लिया।
उनकी आँखों में प्रेम छलक पड़ा।
उन्होंने कहा—
“वत्स! कोई वरदान माँगो।”
प्रह्लाद ने अपने लिए कुछ नहीं माँगा।
उन्होंने कहा—
“प्रभो! मेरे पिता ने आपका विरोध किया था। कृपा करके उनका कल्याण कर दीजिए।”
भगवान् मुस्कुराए।
उन्होंने कहा—
“जिस कुल में तुम्हारे जैसा भक्त जन्म लेता है, उसकी अनेक पीढ़ियाँ स्वतः पवित्र हो जाती हैं। तुम्हारे पिता का भी उद्धार हो चुका है।”
इसके बाद प्रह्लाद ने केवल एक वरदान माँगा—
“हे प्रभु! मुझे आपकी निष्काम और अखण्ड भक्ति प्राप्त हो।”
भगवान् ने प्रसन्न होकर यही वरदान प्रदान किया।
प्रह्लाद का अंतिम जीवन
भगवान् के आदेश से प्रह्लाद ने लंबे समय तक राज्य किया।
वे न्याय, धर्म और भक्ति के आदर्श राजा बने।
किन्तु उनके हृदय का वास्तविक सिंहासन तो सदैव भगवान् के लिए सुरक्षित था।
अन्ततः उन्होंने अपने पुत्र विरोचन को राज्य सौंप दिया और पूर्णतः भगवान् की भक्ति में लीन हो गए।
कथा का संदेश
भक्त प्रह्लाद की कथा केवल एक चमत्कारिक कहानी नहीं है; यह अटल विश्वास, क्षमा, निडरता और निष्काम भक्ति का दिव्य आदर्श है।
प्रह्लाद हमें सिखाते हैं—
“अत्याचार का साम्राज्य चाहे कितना भी विशाल क्यों न हो, एक बालक की सच्ची भक्ति उसे पराजित कर सकती है।”
“प्रह्लाद केवल एक भक्त नहीं, बल्कि यह प्रमाण हैं कि भगवान् से प्रेम करने वाला कभी अकेला नहीं होता।”
भक्त प्रह्लाद — अडिग भक्ति की अमर गाथा
(काव्य रूपांतरण)
जब-जब भक्ति की चर्चा होगी, जग में नाम प्रह्लाद का होगा,
बाल हृदय में प्रेम समाया, हरि-स्मरण ही उनका योगा।
दैत्यकुल में जन्म लिया पर, मन था हरि के चरणों में,
कमल समान खिले रहते थे, प्रभु-प्रेम की किरणों में॥
गर्भ में थे तब देवर्षि ने, हरि की कथा सुनाई थी,
माता ने जो सुनी कहानी, आत्मा ने अपनाई थी।
जन्म लिया जब जगत के भीतर, हरि-गुण ही गाया करते थे,
खेल-खेल में बाल सखाओं को, हरिनाम सिखाया करते थे॥
कभी नाचते प्रेम-मगन हो, कभी अश्रु बह जाते थे,
हरि का स्मरण करते-करते, सुध-बुध अपनी खो जाते थे।
बालक तन में भक्त महान् का, दिव्य प्रकाश समाया था,
जग के सारे सुख से बढ़कर, हरि-चरणों में पाया था॥
पिता बने थे असुर अधिपति, नाम हिरण्यकशिपु भारी,
जिनकी इच्छा थी संसार में, केवल उनकी हो जयकारी।
जब पुत्र से पूछा प्रेम सहित—
“बेटा! सबसे उत्तम क्या है?”
प्रह्लाद बोले सरल वचन में—
“हरि-भक्ति ही जीवन की राह है।”
सुनते ही वह क्रोध से भरकर, अग्नि समान धधकने लगा,
अपने ही घर में विष्णुभक्त को, शत्रु समझ भड़कने लगा।
कहा—“न लेना नाम विष्णु का, यह मेरा आदेश रहे!”
प्रह्लाद बोले—“हरि ही मेरे, जीवन का संदेश रहे।”
सूली पर जब उन्हें चढ़ाया, फूलों जैसी बन गई,
मदमत्त हाथी चरणों में आ, सेवा में तत्पर हो गई।
विष का प्याला अमृत बनकर, भक्त अधर पर मुस्काया था,
अग्नि शीतल बनकर आई, हरि ने अपना वचन निभाया था॥
सागर में पत्थर बाँध फेंका, जल ने गोदी में बिठलाया,
ऊँचे पर्वत से गिरवाया, हरि ने फिर भी बचवाया।
होलिका अपनी ज्वाला में ही, जलकर राख हो गई,
भक्ति की ज्योति अमर बनी और, दुष्टता वहीं खो गई॥
जिन्होंने केवल दुःख पहुँचाया, उनसे भी न बैर किया,
अपने गुरुओं के जीवन हेतु, हरि से करुणा भरा नीर दिया।
सन्त हृदय की यही महिमा, सबको अपना मानता है,
पत्थर मारने वाले को भी, फूलों का उपहार देता है॥
जब सब उपाय विफल हो गये, क्रोध शिखर पर चढ़ आया,
खम्भे से बाँध पुत्र को उसने, हाथों में खड्ग उठाया।
गरजकर बोला—“कहाँ है विष्णु? अब तो मुझे दिखाओ तुम!”
प्रह्लाद बोले—“हरि सर्वत्र हैं, जहाँ देखो पाओ तुम।”
“क्या इस खम्भे में भी हैं तेरे?”
असुर ने हँसकर वार किया।
क्षणभर में ब्रह्माण्ड काँप उठा, खम्भे ने हुंकार किया।
फटकर बीचों-बीच अचानक, अद्भुत रूप दिखाई दिया,
नर भी थे और सिंह भी थे, नरसिंह अवतार लिया॥
ज्वालाओं-सी आँखें उनकी, केसर गर्जन करता था,
अधर्म काँपता था जिनसे, धर्म वहीं मुस्काता था।
जाँघों पर रख दैत्यराज को, नखों से उसका अंत किया,
भक्त-रक्षा के लिये प्रभु ने, अपना अद्भुत रूप लिया॥
देवों ने तब जय-जय गाई, पुष्पों की वर्षा होने लगी,
प्रह्लाद प्रभु की गोद में बैठे, प्रेमधारा बहने लगी।
प्रभु बोले—“वत्स! वर माँगो, आज तुम्हारी जीत हुई।”
प्रह्लाद बोले—“पिता का उद्धार हो, बस इतनी प्रीत हुई।”
हँसकर बोले नरहरि तब—
“भक्त जहाँ जन्मे मेरे,
इक्कीस पीढ़ियाँ तर जातीं,
पावन होते कुल के डेरे।”
फिर माँगा न धन, न वैभव, न स्वर्ग, न कोई सम्मान,
केवल माँगी हरि-चरणों में, निष्काम भक्ति की पहचान।
प्रभु ने वह वरदान दिया और, सिर पर अपना हाथ रखा,
भक्त प्रह्लाद का यश जग में, अमर-अटल सौगात रखा॥
आज भी जब संकट घिरता है, मन जब भय से भर जाता है,
भक्त प्रह्लाद का नाम स्मरण कर, साहस फिर जग जाता है।
जो हरि पर विश्वास रखे और, प्रेम-भक्ति का दीप जलाए,
उसकी रक्षा स्वयं भगवान्, हर युग में करने आ जाएँ॥
भक्ति जहाँ निष्काम रहेगी, वहाँ प्रह्लाद अमर कहलाएँगे।
हरि-नाम जहाँ गूँजेगा जग में, वहाँ नरसिंह अवश्य आएँगे॥